anand bhadur

तुम ही बोलो नये साल पर
कैसा तोफा तुमको भेजें
गए साल हम तुम जैसे थे
उससे अच्छे हो सकते हैं?
उससे बेहतर हम जागें क्या
उससे बेहतर सो सकते हैं?

क्या कहते हो, उठ कर चल दें
नदी किनारे? जैसे बचपन
में चलते थे, हाथ थाम कर?
प्रेम करोगे फिर राधा से?
जिसने देखा था मुस्का के
पहली पहली बार चुरा के?

मुझको लगता हम तुम दोनों
बीते कल से बड़े हो गए,
चल पाएंगे फिर से वैसे
पैरों पर यूँ खड़े हो गए?

आओ, फिर छोड़ें अतीत का
झूठा-सच्चा ताना बाना
देखें आगे, क्या होना है,
क्या है पाना क्या है खोना
कैसा नियति का है होना
भय लगता है उससे, है ना?
वर्तमान ही सबसे अच्छा
अपना ठीया और ठिकाना।

चलते चलते रुक मत जाना
इतना करना, भाई मेरे
हार न जाना, मत घबराना
चाहे कुछ भी चाहो मानो
जोर जोर से मत चिल्लाना
लाठी लेकर भाला लेकर
चाकू लेकर कूद न जाना।

ये जंजीरें मानवता की
यही बेड़ियाँ हैं हम सबकी
सारे जग की जुल्मत हैं ये
हम सब के पैरों में पड़ी हैं
कानों में, आँखों में धसी हैं
हो पाए तो जोर लगाना
अपने को आजाद बनाना
इतिहासों की, उन राहों से,
क्रूर अंधेरी घोर घनेरी
जो मंजिल तक नहीं पहुँचतीं,
चाहे जितना भ्रम फैलाएं
नफरत के वहशी सौदागर,
तुम उनसे बच कर के रहना
बचा के रखना मेरा-तेरा
इसका-उसका ठौर ठिकाना

ईश्वर अल्ला का जीसस का
औ नानक का भेद एक है
एक छोटा सा दिया प्रेम का
जला के लाना सजा के रखना
लीपा पोती, झाड़ू पोंछा
घर-आंगन, अपनी देहरी की
जैसे कल करते थे वैसे
करते रहना जैसे कल
रहते थे वैसे रहते रहना
वही तुम्हारा रहना-सहना
अच्छा लगता था हम सबको

क्या बीते कल और आज पर
या आगत की खोज-खाज पर
नीरवता पर भीड़भाड़ पर
इतना ज्यादा मगज खपाना?

✍🏻 गीत – आनंद बहादुर

Leave a Reply

Your email address will not be published.