बीते कुछ वर्षों में सफेद चावल के बारे में बहुत सी बातें ऐसी सामने आई हैं, जिन्हें स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना गया है। सफेद चावल न केवल वजन बढ़ाने बल्कि हाई ब्लड शुगर लेवल से भी जुड़ा हुआ है। हालांकि कई अध्ययन ऐसे भी हैं, जो ये बताते हैं कि सफेद चावल उतना भी बुरा नहीं है जितना इसे वर्षों से बताया जाता रहा है। 21 देशों में 10 वर्षों से ज्यादा समय तक 1,30,000 वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में भी सफेद चावल के बारे में कुछ अनुकूल परिणाम सामने नहीं आए हैं। अध्ययन के परिणाम के अनुसार, सफेद चावल का सेवन डायबिटीज के उच्च जोखिम से जुड़ा हुआ है। और यह जोखिम दक्षिण एशियाई आबादी के बीच अधिक सामान्य पाया गया है।

ये अध्ययन बड़े पैमाने पर किया गया था और चीन, ब्राजील, भारत, उत्तर और दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका सहित विभिन्न देशों के शोधकर्ताओं के बीच एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ हुआ हरै। इस अध्ययन का नेतृत्व जनसंख्या स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान, हैमिल्टन हेल्थ साइंसेज मैकमास्टर विश्वविद्यालय, कनाडा के भवधारिणी बालाजी ने किया है। साथ ही ये अध्ययन डायबिटीज केयर जर्नल में भी प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में सामने आया है कि सफेद चावल की पिसाई और चमकाने की प्रक्रिया इसमें से पोषक तत्वों को निकाल देती है जैसे विटामिन बी और इसके उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स से ब्लड शुगर के स्तर में वृद्धि होती है।

2012 में किए गए एक पुराने अध्ययन में ये पाया गया था कि चावल को जितनी बार भी आप परोसेंगे तो उससे डायबिटीज का खतरा 11 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। हालांकि, जिन देशों में यह अध्ययन किया गया, उनके आधार पर निष्कर्षों में बदलाव हुआ है। 45,000 प्रतिभागियों, जिन्होंने सफेद चावल का सेवन किया उनपर किए गए अध्ययन में डायबिटीज में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं पाई गई। इसी अंतर को पाटने के लिए नए अध्ययन के लेखकों ने इस अध्ययन में 21 देशों को शामिल किया।

द स्टडी

दक्षिण एशियाई लोगों को जीवनशैली और जैविक कारणों दोनों के कारण आनुवंशिक रूप से डायबिटीज का शिकार होना पाया गया है। इस डेटा को समझने के लिए, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के निष्कर्षों की तुलना की गई।

क्या कहते हैं अध्ययन के निष्कर्ष

अध्ययन में भाग लेने वाले लोगों की आयु 35-70 के बीच थी। 1,32,372 लोगों में से, 6,129 लोगों में साढ़े नौ साल के दौरान डायबिटीज का विकास किया। इन्होंने प्रतिदिन 128 मिलीग्राम चावल का औसत सेवन किया था। हालांकि, सफेद चावल की सबसे अधिक खपत दक्षिण एशिया में देखी गई, जहां एक दिन में इन लोगों ने 630 ग्राम चावल का सेवन किया, इसके बाद क्रमशः दक्षिण पूर्व एशिया और चीन में 238 ग्राम और 200 ग्राम प्रति दिन खाया गया है।

अध्ययन में ये भी कहा गया है कि चावल की अधिक खपत को अन्य खाद्य पदार्थों जैसे फाइबर, डेयरी उत्पादों और मांस की कम खपत के साथ जोड़ा गया था। यह भी पाया गया कि कई दक्षिण एशियाई देशों में लगभग 80 प्रतिशत कैलोरी के लिए कार्बोहाइड्रेट बनता है। लेकिन समय के साथ कार्ब्स तेजी से पॉलिश और परिष्कृत हो गए हैं, जो प्रक्रिया उनमें से पोषण खो देती है। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि हर कोई जो सफेद चावल खाता है उसे डायबिटीज होने का खतरा होता है। यह केवल सेवन पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि चावल की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है और इसके सेवन से क्या फर्क पड़ता है।

चीन और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े देश हैं जहां सफेद चावल प्रधान भोजन है। लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया है कि चीन में सफेद चावल की खपत और मधुमेह के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं है। यह उनके अन्य जीवन शैली कारकों के कारण हो सकता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि चीनी खाने में चिपचिपा चावल भी इस अंतर का कारण हो सकता है।

क्या कर सकते हैं आप ?

अध्ययनों से पता चला है कि सफेद चावल की जगह अनपॉलिश ब्राउन राइस को बदलने से अधिक वजन वाले एशियाई भारतीयों में ग्लाइसेमिक इंडेक्स 23 फीसदी और इंसुलिन की प्रतिक्रिया में 57 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। जो लोग सफेद चावल का सेवन कभी-कभार करते हैं वे सफेद चावल को फलियां, दालों और हरी सब्जियों के साथ लेकर इसे स्वस्थ विकल्प के रूप में चुन सकते हैं, जिससे डायबिटीज का खतरा कम हो जाता है।

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