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Vijay Dashmi Special: गुरु दर्शन विजय दशमी मेला पर विशेष

सतनामी राजा गुरू गोसाई बालकदास

Vijay Dashmi Special

Vijay Dashmi Special: परमपूज्य गुरू घासीदास बाबा जी के द्वतीय सुपूत्र गुरू बालकदास जी का जन्म,जन्माष्मी के दिन हुआ था।इसलिये सतनामी लोग पहले जैतखाम में जन्माष्टमी (Vijay Dashmi Special) के दिन झंडा चढ़ाते थे जिसे पालो चढ़ाना कहा जाता था।गुरू बालकदास जी,गुरू घासीदास जी के साथ सामाजिक बुराइयों को दुर कर समाज को दिशा देने में लगे थे जिसके लिये महंत,राजमहंत,दीवान,भंडारी,साटीदार आदि बनाकर सतमार्ग पर चलने के लिये नियम बनाये और उस नियम पर चलने के लिये प्रेरित करते रहे ।

गुरू बालकदास जी,अपने पिता,गुरू घासीदास जी के अनुयायीयों को सतनाम धर्म पालन करने के लिये,अमृत वाणियों का प्रचार कर कट्टरता से पालन करने के लिये आचार संहिता बनाकर समाज सुधार में लगे थे परिणाम स्वरूप समाज में गुरू बालकदासजी, गुरू बंशावली की गरिमा को बनाये रखते हुये गुरूजी के अनुयायियों को एकजुट करने में सफल हुये ।

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गुरू बालकदास जी रामत के रूप में गाड़ी,घोड़ा,हाथी के साथ अपने महंतो, दीवानो को लेकर निकलते थे।समाज सुधार के साथ सामाजिक न्याय भी करते थे और अभियुक्त को दंड भी दिया करते थे।

गुरू बालकदास जी कुँआ बोड़सरा को अपना कार्य स्थल चुने,गुरूजी का बहुतायत समय रामत घुमने में ब्यतित हुये।

गुरूजी का विवाह ढारा नवलपुर (बेमेतरा) के निवासी मोतीलाल की सुपुत्री नीरा माता के साथ हुआ।नीरामाता,भूजबल महंत के बहिनी थी।उसी वर्ष गुरूजी ने चितेर सिलवट के बेटी राधा संग भी ब्याह किये।गुरूजी और राधा माता से साहेबदास जी का जन्म हुआ ।

भंडारपुरी में गुरूजी ने चौखण्डा महल बनवाया जिसमें तलघर,राजदरबार, मुसािफर खाना,पूजा स्थल,उपचार गृह, दीक्षा गृह बनवाये।महल में स्वर्ण कलश और अंगना में जोड़ा जैतखाम का स्थापना किये,एक जैतखाम को चांद और दुसरे को सुरूज नाम दिये।शीला सोत तो आज भी विद्यमान है जहाँ गुरू घासीदास जी ने अपने प्रथम पुत्र गुरू अमरदास जी को सृष्टि रचना का ज्ञान चऊका पोतकर सुनाये थे और जोड़ा जैतखाम का स्थान भी सुरक्षित है।उस समय गुरू जी के साथ रहने वाले संत जनो द्वारा यह साखी बहुतायत प्रयोग में लाया जाता था ।

पाठ पिढ़ुली दो जोड़ी खंभा,अधर जोत जलाइये।

शीला सोत म चऊका पोते,धन सतनाम कहाइये।

गुरूजी रात घुमते समय संतो को उपदेश के साथ साथ सतनाम की दीक्षा भी देते थे,जनेऊ पहिनाये,कंठी बांधे इस तरह समाज को सतनाम धर्म के सच्चे अनुयायी बनाते गये ।

सतनामी एवं सतनाम धर्म

सत से तात्पर्य मुख्य कार्य और नामी से तात्पर्य पहचान।जिस तरह लोहे के कार्य करने वाले को लुहार,कपड़ा धोने के कार्य करने वाले को धोबी,रखवाली करने वाला को रखवाला,गाना गाने वाले को गायक, नृत्य करने वाले को नृतक,नशा करने वाले को नशेड़ी,शराब पिने वाले को शराबी, पोथी पुराण के ज्ञानी को पंडित,राज करने वाले को राजा,सेवा करने वाले को सेवक, तपस्या करने वाले को तपस्वी,ठीक उसी तरह “सतकर्म” करने वाले को “सतनामी” कहते हैं।

सतनामी नही तो जाति है और नही कोई धर्म,वह तो सतनाम के मानने वालो की पहचान है जिसे आज सतनामी जाति के नाम से जाना जाता है।सतनामी वह है जिसका कर्म सत्य पर आधारित हो और जो सतनाम धर्म को मानता हो ।

सतनाम धर्म में छोटा-बड़ा, ऊँच-नीच, छुआ-छुत का कोई स्थान नही है । सतनाम धर्म मानवता वाद पर आधारित है ।बाबा गुरू घासीदास जी ने सतनाम धर्म का ब्याख्या इस रूप में किये हैं :

“मानव-मानव एक समान”
मनखे मनखे एक ये,
नइये कछु के भेद ।
जउन धरम ह मनखे ल एक मानीस,
उही धरम ह नेक ।।

धर्म

सच्चा धर्म वही है जिसमें सबका कल्याण हो,जो किसी को किसी भी तरह से छोटा-बड़ा,ऊँच-नीच न समझे।जिस धर्म में मानव को मानव नही समझा जाता, उसके साथ अपनत्व का व्यवहार नही किया जाता वह धर्म,धर्म नही बल्कि धर्म के नाम पर अपने स्वार्थ पूर्ती के लिये रचा गया साजिस है ।

सतनाम धर्म में ऐसा किसी भी प्रकार की खामियाँ नही दिखती जो हमारे मन में प्रश्न पैदा करे।सतनाम धर्म का संक्षिप्त में मुख्य विशेषतायें निम्न है-

सतनाम् धर्म में निम्न बातों पर विशेष बल दिया जाता है :

  • सतनाम् पर विश्वास रखना ।
  • जीव हत्या नही करना ।
  • मांसाहार नही करना ।
  • चोरी, जुआ से दुर रहना ।
  • नशा सेवन नही करना ।
  • जाति-पाति के प्रपंच में नही पड़ना ।
  • ब्यभीचार नही करना ।

Note:- “नियम और संस्कार को संक्षिप्त में बताया गया है, परन्तु इतने से ही ज्ञानी जन विस्तृत में समझ सकते हैं” कुछ त्रुटी हो तो क्षमा प्रार्थी

परम् पूज्य बाबा गुरू घासीदास जी के द्वितीय पुत्र राजा गुरू बालकदास जी के सतनाम आंदोलन का असर इतना अधिक हुआ कि अंग्रेजो ने सन् 1825 में पहली बार शिक्षा का द्वार हिन्दु धर्म में शुद्र कहे जाने वालो के लिये खोले । गुरू बालकदास जी के एकता और समरसता के आंदोलन से अंग्रेज प्रभावित होकर उन्हे राजा घोषित कर हांथी भेंट किये साथ ही अंग रक्षक रखने कि अनुमति भी दिये।
शिक्षा के क्षेत्र में हुये इस परिवर्तन कानून जिसका पुरोधा हमारे गुरू जी रहे हैं।साथीयो धन्य हैं जो हम ऐसे महान गुरू के अनुयायी है….!
आज भी अंग्रेजो द्वारा, गुरू बालकदास जी को दिये उपहार स्वरूप अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र……भंडारपुरी में जहाँ राजा गुरू निवास करते थे, वहाँ सुरक्षित रखा हुआ है, गुरू वंशज, गुरू बालदास जी के संरक्षण में…….!
यह वही वस्त्र और शस्त्र है, जिसे अंग्रेजो ने सतनामी राजा गुरू बालकदास जी को उपहार में प्रदान किये थे , जिसे गुरू वंशज ….प्रत्येक वर्ष में एक बार…..धारण करके संतो के सामने उपस्थित होते हैं ताकि संत समाज को राजा गुरू बालकदास जी द्वारा किये अदम्य और अनुकरणीय कार्य को याद दिलाया जा सके !
जिससे समाज में नई जोश और नई चेतना का संचार होते रहे……!

28 मार्च 1860 को सतनामी समाज के राजा गुरू बालकदास जी का घूर्त, पाखण्डी, अकुलीन ब्यक्तिो द्वारा औंराबांधा में कपट पूर्वक सतनाम आंदोलन को दबाने के लिये गुरू बालकदास जी को समाज के खातिर बलिदान कर दिये। और समाज का विकास जो तिव्र गति से हो रहा था वह अचानक रुक सा गया, लेकिन गुरू बालकदास जी के अनुयायी उग्र रूप से असमाजिक तत्वो के लोगो के साथ संघर्ष करने लगे,जहां भी सतनामी समाज के उपर कुछ भी अन्याय अत्याचार होता तो एकजुटता के साथ मिलकर वे लोग मुकाबला करते थे।फिर कुछ समय पश्चात राजा गुरू बालकदास जी के छोटे भाई आगरदास दास जी ने समाज को एक सुत्र में बांधने का कार्य तिव्र गति से प्रारम्भ कर दिये, गुरू बालकदास जी के मौत से समाज में रोष ब्याप्त था जब गुरू आगरदास जी ने गुरू का सत्ता संभाले तो समाज के लोग उनका साथ देने के लिये तन मन धन से आगे आने लगे।गुरूओ ने रामत प्रथा को आधार मानते हुये अपना अभियान को गाँव गाँव तक पँहुचाने लगे जिससे समाज आगे बढ़ते ही रहा । परन्तु उसी समय कोर्ट कचेहरी के चक्कर में सतनामी समाज के लोगो को अभियुक्त बनाकर परेशान करने का भी साजिश रचने लगे,इससे यह हुआ कि समाज के धनी लोगो का पैसा कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने में बर्बाद होते गये और समाज कमजोर होने लगा।आज भी आप लोगो ने देखा व सुना होगा कि छत्तीसगढ़ के जेलो में सतनामीयो की संख्या ज्यादा है । इन्ही सबको देखते हुये गुरू परिवार के लोगो ने राजनिती का सहारा लेकर समाज को आगे बढ़ाने का सोचा और राजनिती में प्रवेश कर गये । जगत गुरू अगमदास जी, गुरू माता ममतामयी मिनीमाता ने वह सब कुछ जो समाज खो चुका था उसे पुनः पटरी पर लाने का कार्य किये अपनी कुशलता के दम पर मिनीमाता ने बहुत से अनुकरणीय कार्य समाज के लिये किये जिनको समाज कभी भी भूल नही सकता ।

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