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सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक न्याय के सिद्धांत लांघते हुए एस.सी.-एस.टी. प्रवर्ग के खिलाफ़ कोई फ़ैसला नहीं दिया

इस श्रृंखला के पहले भाग में दिखाया जा चुका है कि नौकरी में आरक्षण एक ऐसा दुर्लभ मुद्दा है जिस पर 1950 से आज तक सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक न्याय के सिद्धांत लांघते हुए एस.सी.-एस.टी. प्रवर्ग के खिलाफ़ कोई फ़ैसला नहीं दिया। कई बार कुछ संकुचित स्वार्थ समूहों को धक्का पहुंचा है लेकिन ऐसा एक भी फ़ैसला नहीं आया है जो कि सामाजिक न्याय और एस.सी.-एस.टी. प्रवर्ग के व्यापक हित के खिलाफ़ हो| हड़बड़ की वजह से संविधान में आरक्षण के प्रावधानों में स्पष्टता की जो कमियां रह गयीं और जिन्हे सुधारने के लिए संसद ने कभी कुछ नहीं किया, उनका हल भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने कार्य-क्षेत्र से बाहर जा कर निकाला| रंगाचारी (1961) से बी.के. पवित्रा द्वितीय (2019) प्रकरण तक जब भी कभी इन फ़ैसलों में संवैधानिक सिद्धांतों या कानूनी तर्क की कोई गलती हुई है, वह फ़ैसला हमेशा एस.सी.-एस.टी. प्रवर्ग के पक्ष में ही रहा है। एन.वी. थॉमस (1975) फ़ैसले में अगर अनुच्छेद 335 की गड़बड़ छुपाने की रंगाचारी फ़ैसले की पहल को न बढाया गया होता तो आरक्षण की यह उन्नत स्थिति कभी न होती| इस तथ्यात्मक सच से अन्जान होकर/रह-कर कुछ स्वार्थी तत्व आरक्षण को सामाजिक न्याय की छतरी से बाहर घसीटने के लिए सुप्रीम कोर्ट को निशाना बनाते हुए दो उपाय दे रहे हैं- नवीं अनुसूची का संरक्षण और उच्च न्यायपालिका में अखिल भारतीय परीक्षा के माध्यम से भर्ती| जिस बिहार राज्य से मौर्य सत्ता और भारतीय गणतंत्र के पहले दलित मुख्यमंत्री आए जब उस राज्य के 22 विधायकों ने सतही प्रदर्शन किया तो दुख गहरा हो जाता है और बिहार की महान बौद्धिक परंपरा का अपमान रोकने के लिए दुष्प्रचार का जवाब देना जरूरी है|

आरक्षण के प्रावधानों को अधिनियम या विनियम बना कर संविधान की नवीं अनुसूची में डालने की मांग ऐसी ही एक कुचर्चा का उदाहरण है| चूंकि इससे आरक्षित वर्ग की बौद्धिक क्षमता की छवि खराब होती है और भावी रणनीति-कार्ययोजना पर दुष्प्रभाव पड़ता है, इसलिए छत्तीसगढ के अनुसूचित जाति-जनजाति के कुछ जागरुक अधिवक्ताओं द्वारा जन-हित में कानूनी स्पष्टता के लिए एक बयान जारी किया गया||

उच्च न्यायपालिका द्वारा सामाजिक सुधार संबंधी कानूनों की न्यायपालिक समीक्षा से बचने के लिए पहले संविधान संशोधन अधिनियम 1951 द्वारा नवीं अनुसूची शामिल की गई थी| अनुच्छेद 31ख के अनुसार नवीं अनुसूची में शामिल किसी अधिनियम या विनियम को इस आधार पर न्यायपालिका द्वारा खारिज नहीं किया जा सकेगा कि वे भाग तीन के मूलभूत अधिकारों से असंगत हैं| 24 अपैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट की सबसे व्यापक पीठ ने केशवानंद भारती बनाम केरल फ़ैसले में “संविधान का मूल ढांचा” सिद्धांत दिया| 11 जनवरी 2007 को 9-जजों की एक पीठ ने एकमत से आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु फ़ैसले में इसी मूल-ढांचा आधार पर न्यायिक-समीक्षा के माध्यम से कानूनी प्रावधानों को चुनौती दिए जा सकने पर सफ़ाई दी| यह कहा गया है कि अनुच्छेदों 14, 19 और 21 में झलकने वाले संविधान के मूल ढांचे से असंगत होने का आरोप होने पर नवीं अनुसूची में शामिल किसी भी कानूनी प्रावधान को चुनौती दी जा सकेगी| अगर “अधिकार-टेस्ट” और “अधिकार का प्रभाव-टेस्ट” पूरा होता है तो असंगत प्रावधान खारिज किया जा सकेगा| दूसरे शब्दों में संसदीय बहुमत का दुरुपयोग करते हुए कोई कानूनी मनमानी अब नहीं की जा सकेगी| चूंकि “समता” को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा ठहराया जा चुका है इसलिए आरक्षण के किसी प्रावधान को नवीं अनुसूची में रख देने पर भी इस आधार पर चुनौती दी जा सकेगी| सामाजिक न्याय के लिए ज्यादा स्पष्ट और प्रभावी उपाय खोजने के बजाए उच्च न्यायपालिका को दुश्मन दिखाने की ऐसी कोशिशें बेमानी हैं और मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली हैं|

स्वार्थी तत्वों ने दूसरा उपाय सुझाया है कि कॉलेजियम सिस्टम को खत्म कर उच्च न्यायपालिका में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की खुली परीक्षा द्वारा नियुक्ति की जाए| ध्यान रहे कि इस विचार का भारत देश में कोई विरोध नहीं रहा है कि उच्च न्यायपालिका खास कर सुप्रीम कोर्ट में वंचित वर्गों का कुछ न कुछ प्रतिनिधित्व रहे| भारत के तीन पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति अलग अलग अवसरों पर इस विचार की वकालत कर चुके हैं| इस विचार को अमली जामा कैसे पहनाया जाए यह एक उलझन है| कॉलेजियम सिस्टम के खिलाफ़ राजनैतिक दलों की चिढन का फ़ायदा उठा कर चालाकी से यह मांग उठायी जा रही है| लेकिन जब कि इस बात से देश के सभी प्रमुख राजनैतिक दल सहमत हैं और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग प्रावधानित करने वाला निन्यानवेवां संशोधन अधिनियम 2014 संविधान पीठ द्वारा खारिज कर दिया गया तब खोखली मांग करने भर से काम नहीं चलेगा| बौद्धिक श्रम कर के वह उपाय और तर्क सुझाने होंगे जिससे कॉलेजियम सिस्टम को खत्म कर के निष्पक्ष-नियुक्ति की कोई प्रभावी व्यवस्था लाने को सुप्रीम कोर्ट राजी हो जाए|

ध्यान रहे कि सरदार पटेल के समय से ही उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति में भेदभाव को लेकर तीखे सवाल संसद में उठाए जाते रहे हैं| जब चार गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी इस इस आलोचना के जवाब में कोई प्रभावी हल नहीं दे सके तब सुप्रीम कोर्ट को 1993 में कॉलेजियम सिस्टम स्थापित करना पड़ा| यह सिस्टम पिछली व्यवस्था से तुलनात्मक तौर पर बेहतर ही काम कर रहा है| कॉलेजियम सिस्टम में भी पारदर्शिता की कमी को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं और इसके इलाज के लिए वेबसाईट पर कॉलेजियम बैठकों की रिपोर्ट जारी करने की नई पहल से आगे बढ कर भी कदम उठाने होंगे| जहां तक वंशवाद फ़ैलाने का आरोप है ध्यान रहे कि काणिया और भगवती परिवार के पिता-पुत्र की नियुक्ति साफ़ दिखाती है कि यह बीमारी कॉलेजियम सिस्टम से कहीं पुरानी है| फ़िल्म-व्यवसाय और चुनावी राजनीति की तरह अधिवक्ताओं के व्यवसाय में भी खानदानी नाम का अनुचित लाभ मिलता ही है| इसका इलाज भी वांछित है लेकिन वह भी कॉलेजियम सिस्टम पर दोष लगाने और उसे हटाने भर से तो नहीं होगा| उच्च न्यायपालिका का सुधार एक गहरी समस्या है जिसके लिए सर्जरी ही करनी पड़ेगी, सिर्फ़ दवा-दारू और खान-पान के परहेज जैसे उपायों से यह काम होने वाला नहीं|

यह ठीक है कि विश्व के किसी भी बड़े लोकतंत्र में उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति वरिष्ठ जजों द्वारा नहीं की जाती लेकिन फ़िर परीक्षा द्वारा भी नहीं की जाती है| फ़िर से कार्यपालिका के हाथों में तो यह जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती, और न ही सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में विचारण कर सकने की विशेष योग्यता को नजर अंदाज किया जा सकता है| जिन व्यक्तियों ने उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में अभिवचन करते हुए या फ़िर रिट कोर्ट के फ़ैसलों और विधिक सिद्धांतों पर शोध-अध्यापन न किया हो वे उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए सुपात्र नहीं हो सकते| इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल के दौरान बयालीसवें संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 312 के भीतर यह प्रावधान किया था| जाहिर है ओरिजिनल अनुच्छेद 124 और 217 के होते हुए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा से उच्च न्यायपालिका में तो नियुक्तियां हो नहीं सकतीं लेकिन इसकी स्थापना से उच्च न्यायालयों में वंचित वर्गों के जजों के नियुक्त होने की संभावना जरूर बढ सकती है| क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान रख़ते हुए अधीनस्थ न्यायालयों के आधे या दो तिहाई पदों को ही अखिल भारतीय स्तर पर भरा जाना चाहिए, सारे पदों को नहीं|

एक पहलू यह भी है कि क्या दलित दर्शन और आदिवासी दर्शन की संविधान-सम्यक व्याख्या किए बगैर और गैर-वंचित वर्गों के जजों में इसके लिए उदासीनता साबित किए बगैर उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व की मांग करना सार्थक है? हम वंचित वर्गों के लिए न्याय चाहते हैं सिर्फ़ दिखावा तो नहीं| यह एक लंबी परियोजना है जिसमें सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध सभी लोगों को भिड़ कर काम करना होगा| पूर्व न्यायमूर्ति के. रामास्वामी के सिवा ऐसा कोई उदाहरण मौजूद नहीं है कि वंचित वर्ग के किसी जज की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति से सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों की धारा में कोई गुणात्मक फ़र्क आया हो| अगर तर्क के लिए यह मान भी लिया जाए कि सुप्रीम कोर्ट के ढेर सारे फ़ैसले वंचित वर्ग के खिलाफ़ जाते रहे हैं तब भी उच्च न्यायपालिका की गहरी समझ रखने वाले विद्वान बताते हैं कि इसके लिए प्रक्रियागत नियम जिम्मेदार हैं न कि तथाकथित जातिवादी बनावट| आरक्षण के पक्षधर दो बड़े जुझारू वरिष्ठ अधिवक्ताओं के.के. वेणुगोपाल और इंदिरा जयसिंह ने क्रमश: नेशनल कोर्ट ऑफ़ अपील और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता की मान्यता को लेकर जो संघर्ष किया है उसमें वंचित वर्ग के संगठनों का कोई सहयोग नहीं मिला| यह कैसी विडंबना है कि दलितों के विरुद्ध अपराधों पर काफ़ी कुछ लिखा जाता है लेकिन भारत की जेलों में वंचित वर्ग की गैर-तुलनात्मक संख्या पर कोई चर्चा नहीं होती| वंचित वर्गों के खिलाफ़ असली अन्याय तो दंड प्रक्रिया संहिता 1973, विविध हाई कोर्ट रूल्स और सुप्रीम कोर्ट रूल्स 2013 में निहित है लेकिन इनकी आलोचना नहीं होती क्योंकि यह रोमांचक काम नहीं है।

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