कोरोना वायरस संक्रमण के बीच विश्वविद्यालयों में अंतिम वर्ष की परीक्षा के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (युजीसी) ने विस्तृत व्योरा जारी कर दिया है। यूजीसी के अनुसार सितंबर तक स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा अनिवार्य है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। इस मुद्दे पर राज्य और केंद्र सरकार आमने-सामने है। वहीं, महाराष्ट्र के करीब पौने नौ लाख छात्रों में भ्रम की स्थिति है।  

महाराष्ट्र सरकार चाहती है कि बिना परीक्षा के ही छात्रों को उत्तीर्ण घोषित कर दिया जाए जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने स्पष्ट तौर पर सितंबर महीने में परीक्षा कराने का फैसला किया है। राज्य सरकार पहले से ही अंतिम वर्ष की परीक्षा के बिना छात्रों को उत्तीर्ण करने की नीति पर कायम है जिसका राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी भी विरोध कर चुके हैं।

इस बीच यूजीसी की नई गाईडलाईन जारी हो गई जिसके तहत सभी कालेजों और विश्वविद्यालयों के लिए 30 सितंबर तक यूजी और पीजी कोर्सेस के लिए अंतिम वर्ष-सेमेस्टर की परीक्षा कराना अनिवार्य है। इस गाईडलाइन के जारी होने के बाद राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री उदय सामंत ने एक बार फिर यूजीसी को पत्र भेजकर इस पर पुनर्विचार के लिए कहा है।

वहीं, राज्य के पर्यटन मंत्री आदित्य ठाकरे का कहना है कि यूजीसी को इस छोटे से मुद्दे को ईगो नहीं बनाना चाहिए और लाखों छात्रों, टीचर्स और नॉन टीचिंग स्टाफ की जान को खतरे में नहीं डालना चाहिए। उन्होंने कहा कि एचआरडी मंत्रालय और यूजीसी के प्रमुख छात्रों की जान की गारंटी लें। उनकी सुरक्षा की गारंटी ले जो छात्र परीक्षा में बैठेंगे। क्या इनको देश में बढ़ रहे कोरोना वायरस की खबर नहीं है।

राजनीतिक फायदे के लिए हो रहा है परीक्षा का विरोध- शेलार

स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा को लेकर जारी गतिरोध पर पूर्व शिक्षा मंत्री विधायक आशीष शेलार ने कहा कि 29 अप्रैल को राज्य सरकार ने स्नातक प्रथम और द्वितीय वर्ष की परीक्षा रद्द की थी। इसके साथ ही अंतिम वर्ष के 8 लाख 74 हजार 890 छात्रों की परीक्षा ऑनलाईन या ऑफलाईन कराने की बात कही थी। लेकिन, महाराष्ट्र के युवराज (आदित्य ठाकरे) के हठ और राजनीतिक फायदे के लिए छात्रों शैक्षणिक कैरियर के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

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