जीवनसाथी की तलाश : शादी से पहले ज़रूर जाने यह बात…..मिलेगा खुशियां अपार

Seeking a life partner

यदि आप स्वयं के लिए अथवा अपने संतान के लिए जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं तो यह लेख आपका मार्गदर्शन कर सकता है।सबसे पहले आपको यह जानना आवश्यक है कि “लड़की – लड़का विवाह योग्य है कि नहीं? योग्यता किसी में कम या अधिक तो नहीं? बस किसी भी लड़के या लड़की के लिए उसके टाइप का, उसके समानांतर जीवनसाथी चाहिए होता है।” यह बात आपको पचने वाला नहीं है मगर यही सत्य है, मगर जो आपको देखने-समझने में कुछ कम ज्यादा लग रहा है वह केवल अवसर की असमानता के कारण है।

हो सकता है आप बैचलर हों, मास्टर हों, एडवोकेट हों, सीए हों, इंजीनियर हों, डॉक्टरेट किये हों और सामने जिसे देख रहे हैं वह साक्षर भी न हों, तो इसका मतलब यह नहीं कि सामने वाले योग्य नहीं है।बस अवसर की असमानता जिसमें आपको अच्छा अवसर मिला और उन्हें अच्छे अवसर या माहौल ही नहीं मिल पाया हो। हो सकता है आप आईएएस हों, आईपीएस हों, मजिस्ट्रेट हों, वैज्ञानिक हों, प्रोफेसर हों, बड़े व्यवसायी हों या आप किसी विशालकाय सीमा में राजनीति के प्रमुख शक्तिकेन्द्र हों, तो इसका एक मात्र कारण “अवसर” हो सकता है।

आपसे अनुरोध है कि आप अपने हिसाब से सामान अवसर मिलने वाले से ही नही बल्कि सदैव कम अवसर मिलने वाले से विवाह करिए, सम्भव है ऐसे जीवनसाथी आपको ईश्वर से अधिक महान जान सकेंगे। जबकि समांतर जीवन साथी के नजर में आप योग्य दिखेंगे मगर इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वे आपका अच्छा खासा सम्मान करेंगे।

अक्सर देखने मे आता है कि पुरूष वर्ग जब लड़की देखने जाते हैं तो सामने वाली लड़की की सुंदरता और शिक्षा को देखते हैं कुछ लोग जो स्वयं अच्छे पद में रहते हैं वे भी समांतर पद की लड़की ही खोजते हैं या अपने से अधिक शैक्षणिक योग्यता वाली लड़की देखते हैं ताकि वे उनसे रोज़गार करवा सकें, प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से बराबर या अपने स्वयं से अधिक उचे दर्जे का पदवी पा सके। अधिक हद तक ऐसे विचार सबके भीतर है, न्यायसंगत भी प्रतीत होता है।मगर आप सार्वभौमिक रूप से सोचेंगे तो पाएंगे कि समाज मे असमानता का सबसे प्रमुख कारण यही सोच है। एक वर्ग अधिक शक्तिशाली हो रहा है, एक वर्ग अधिक धनवान हो रहा है,एक वर्ग अधिक दिमाक वाला हो रहा है।जिसके कारण शक्ति और धन आबादी की 70% से अधिक जनसंख्या के हिस्से कुछ नहीं है। यही असमानता किसी भी सीमाक्षेत्र में वर्गसंघर्ष को जन्म देती है।यह संघर्ष ही समानता और आत्मीयता का दुश्मन है।इसके कारण ही अधिकतर लोग बराबर अवसर अर्थात बराबर शिक्षा, सम्मान, ओहदा, धन से परे रहकर जीवन जीने को मजबूर हैं। एक हिस्सा बड़े मजे से बहुसंख्यक समुदाय के हिस्से में मजा ले रहा है तो,बहुसंख्यक समुदाय अपने मूलभूत जरूरत से वंचित अस्थिरता पूर्ण जीवन जीने को मजबूर है।

मनकी, अब मुंगेली जिला का एक गाँव है यहाँ एक मंडल हुआ करते थे संभु मंडल, पुरा नाम था संभुदास जांगड़े। आसपास के बुद्धजीवी लोगों में उनका ओहदा बड़ा था।आसपास के लोग उनसे सलाह मशविरा करने आते थे और सामाजिक, गैर सामाजिक मामलों के बैठकों में उनके तर्क और पक्ष का तोड़ कम ही मिलता था। मेरा बचपन खासकर गर्मी का दिन उन्ही के सानिध्य में गुजरता था, उनके द्वारा लगाए गस्ती और पीपल का वृक्ष ही गाँव का सबसे बड़ा सभास्थल हुआ करता था। वे अपने जीवन की 50% से अधिक समय इसी गस्ती के छांव में व्यतीत किए, एक बार की बात है मेरे एक मित्र के बड़े भैया की विवाह के लिए लड़की खोजने की बात चल रही थी उस दौरान उन्होंने कहा था “यदि आप सुंदरता का मतलब गोरी चमड़ी को मानते हैं तो आपसे अधिक अमानवीय सोच वाला इंसान पूरे विश्व में कोई और नहीं होगा।”

उन्होंने आगे कहा था हमारे समय मे तो गर्भ के भीतर ही वैवाहिक अथवा मैत्री संबंधों की नींव रख दी जाती थी और ऐसे संबंध अधिक सफल रहे। आज हम लोकतंत्र के नागरिक हैं हमारे लाखों अधिकार हैं एक अच्छा खासा सिस्टम हमारे लिए हमारे अच्छे जीवन के लिए काम कर रहा है। अब लड़के और लड़की के लिए निर्धारित आयुसीमा तय है मतलब दोनो ही परिवार चलाने में सक्षम हैं ऐसे में तो विवाह को और भी अधिक सफल होना चाहिए मगर नहीं! पता है इसका कारण? इसका कारण है तीव्र इच्छाशक्ति, ऐला चाकंव कि ओला चाकंव वाले मन। अकेले आप मन, दिल या दिमाक से काम लेंगे या इनके योग से भी निर्णय लेंगे तो वह अमानवीय अथवा असफलता का कारक ही होगा।इसलिये मनुष्य को अपनी आत्मा की सुनना चाहिए अंतरात्मा की बात सुनिए, अंतरात्मा से लिए निर्णय भी कतिपय मामलों में गलत हो सकते हैं यदि गलत है और सुधारने योग्य तो सुधारिए।

मैंने इतिहास से लेकर अपने जीवन के शुरुआती दिनों तक राजपाठ के लिए हिंसा होते देखा, आज छोटी मोटी बातों के लिए लोग खून के प्यासे हो चले हैं। हिंसा और हत्या किसी भी शर्त में अच्छा या मानवीय नहीं हो सकता, चाहे इंसान की हो या अमुक पशु पक्षियों की। मैंने लगभग सभी धर्मों का धार्मिक पुस्तक पढ़ा है, रामायण के उस प्रसंग की बात बताना चाहता हूं जिसमें राजा राम और काल की वार्तालाप के समय शर्त उल्लंघन होने पर शर्त के अनुसार लक्ष्मण की हत्या करना था। विकल्प निकाला गया “मारने से अच्छा त्यागना” यदि किसी कारण से वैवाहिक जीवन सुखमय न रहा तो उसे सुखमय और सफल बनाया जा सकता है। इसके बावजूद लोग एकाकी परिवार की ओर बढ़ने के कारण इस विकल्प से वंचित होते जा रहे हैं।यही वजह है पति-पत्नी में आपसी विवाद और हिंसा, ये हिंसा और प्रताड़ना घोर अमानवीय और अव्यवहारिक है। यदि आप अपने जीवन सुखमय नहीं बना सकते हैं तो आपको विवाह विच्छेद का रास्ता अपनाना चाहिए।यदि आप हिंसा या आत्महत्या कर रहे हैं तो आपसे बड़ा दुष्ट कंश भी नहीं रहा होगा। आप रामायण से सीखिए “मारने अथवा मरने से अच्छा त्यागना”

एक दिन की बात है दोपहर में मैं अपने अनन्य मित्र बीरेंद्र,बीरेंद्र कुमार कुर्रे के साथ गस्ती के पास गए, खेल रहे थे और भी कुछ लोग थे मगर संभु मंडल वहां नही थे। कोई कुछ उल्टा सीधा बोल रहा था मगर उसके घर जाकर देखने की हिम्मत किसी में नही था। लोगों का कहना था उसे पिछले दिन 2-3 बार खार बाहिर जाते देखे हैं कहीं मंडल टपक तो नही गया? वे लगभग 115 साल के रहे होंगे, इसलिये उनके मृत्यु के बारे में सोचना सहज था। संभु मंडल नहीं मरेंगे यह मेरा विश्वास था, क्योंकि वे अमर हैं। मेरा पूरा परिवार उन्हें अमर जानते हैं, वह किसी धर्मगुरु अथवा महात्मा से कम नहीं थे, फर्जी और ढोंगी नहीं बल्कि सच्चे वाले महात्मा, सचमुच का धर्मगुरु। संभु मंडल का विश्वास था जब तक उनका रुपया लोगों के पास है लोग उनके कर्जदार रहेंगे तब तक वे जिंदा रहेंगे। इसलिए वे लोगों से उनके खेत, घर, सायकल, गाय- भैस या अन्य स्वर्ण आभूषण या बर्तन को गहना लिखवाकर रुपये दे दिया करते थे। ख्याल रखिए वे इन धरोहर की चीजों को अपने पास नही रखते बल्कि मूल मालिक के पास ही छोड़ देते थे। ब्याज नहीं बल्कि पिलारि लेते थे, पिलारि मतलब महीने के ब्याज को हर महीने मांग लेता जब तक वे जिंदा हैं तभी तक आप उनके कर्जदार हैं यदि उनकी मृत्यु हो गई तो कर्ज माफ, उनके वारिस को कर्ज वशूलने या मांगने का कोई अधिकार नही होगा। आप किसी महीने पिलारि नहीं दे पाते तब भी कोई बात नहीं, अगले महीने दे दीजिए अगले महीने भी नही देंगे तो कोई बात नहीं अपने दुःख या कारण बता दीजिए। जब वे पिलारि लेने आएं तो आदर से आसन दे दीजिए, चाय पानी या भोजन के लिए पूछ लीजिए फिर वे हलि भली पूछकर चले जायेंगे, पिलारि भी नहीं मांगेंगे, यदि आपका प्रेम और सम्मान सच्चा नही है तो वे न तो आपके घर पानी पियेंगे न बैठेंगे, बल्कि तगादा करके चले जायेंगे आप अगली संभावित तिथि बता दीजिए या इस महीने के पिलारि के लिए माफी मांग लीजिये। आप उनके सामने बेईमान हूँ कहकर भी उनके कर्ज के बोझ से मुक्त हो सकते हैं। मनकी के 40% से अधिक गरीब परिवार उधारी लेते थे, उधारी देने की शुरुआत उन्होंने अपने 50 या 70 वर्ष के उम्र होने के साथ ही कर दिया था।

मैं और बीरेंद्र संभु मंडल के घर गए, वे दरवाजा बंद किये हुए थे, बीरेंद्र ने दरवाजा खटखटाया उन्होंने आवाज दी, कौन झमलु? मैंने आवाज दी हव बबा। खोल रहा हूँ बेटा… उन्होंने दरवाजा खोलकर बोला खाना खाए हो कि नहीं? हमने कहा खा लिए हैं। पुनः कहा बासी बचे हे, तय खा ले बीरेंद्र। बीरेंद्र ने बताया कि वह जब अभी कुछ समय पहले खा रहा था तभी मैं उनके घर आया था। बीरेंद्र अधिक सीधा सच्चा आदमी था, बबा आपको तो अनपढ़ हैं बोलते हैं फिर ये इतने सारे पुस्तक आपके पास? आप अंग्रेजी के किताब को खोलकर क्या कर रहे हैं? वे हँसने लगे, और बोले बेटा बीरेंद्र, ये सारे पुस्तक अलग अलग धर्मों के धार्मिक पुस्तक हैं जिसके माध्यम से कुछ कुछ समझने और जानने में सहायता मिलती है। उनके पास हिन्दू, मुश्लिम, ईसाई और फारसी के धार्मिक पुस्तक थे। बीरेंद्र ने पूछा सबसे उच्च जाति के कौन है? जवाब आया – कोई नहीं, ये जाति धर्म का विभाजन केवल फुट डालो और राजकरो का सिद्धांत है। तब उन्होंने जाति धर्म के सिद्धांत का विरोध करते हुए कहा था बेटा यदि आप इसके विभाजनकारी सिद्धांतों के झांसे में आओगे तो मनुष्य नहीं बन पाओगे। सभी मनुष्य को गुरु घासीदास बाबा के बताए बात “मनखे मनखे एक समान” को जानने और उसके अनुसार जीवन जीने की जरूरत है। आप सतनामी हैं या सतनामी नहीं हैं फिर भी आपको गुरु घासीदास बाबा के बताए अनुसार जीवन के विकल्प का चुनाव करना चाहिए।

यदि आप गुरु घासीदास बाबा के रास्ते नहीं चलेंगे तो आप भी केवल सतनामी होकर रह जाओगे, मनुष्य नहीं बन पाओगे। मनुष्य को किसी जाति या धर्म का होने की नही बल्कि मनुष्य होने की जरूरत है, मेरा मानना है कोई भी सामाजिक धार्मिक सिद्धांत अपने आप में पूर्ण और श्रेष्ठ नही हो सकता। मानवता को जानने के लिए, धर्म को समझने के लिए केवल आप “मनखे मनखे एक समान” और “सत्य ही मानव का आभूषण है” यह जानकर जीवन जिएं, यदि आप इससे अपरिचित हैं आप मेरे बातों से सहमत नही हैं तो आपको चाहिए कि आप मेरी तरह सभी धर्म के पुस्तकें पढ़कर समझें फिर जान पाएंगे कि कौन से धर्म के कौन से बात सही है और कौन से बात झूठ हैं। अपना दीपक खुद जलाओ अपने अंदर के अंधेरे को मिटाओ। मैं जब से अपना होश संभाला हूँ तब से धार्मिक विभाजन के खिलाफ हूँ परंतु जातिगत व्यवस्था के पक्षधर रहा हूँ अब भारत के आजाद होने के साथ ही जातिव्यवस्था को समाप्त करने योग्य जान चुका हूं।

प्रिय पाठक, अब तक आप संभुमण्डल की जाति धर्म के संबंध में विचार को समझ चुके होंगे, सम्भव है आप इस लेख को पढ़ने के पहले ही जाति और धर्म के सिद्धान्तों को समझ चुके होंगे। यदि नहीं तो अब समझने का प्रयास करिए, जाति और धर्म के विभाजनकारी सिद्धांत को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है सभी जाति धर्म के बीच रोटी बेटी का सहज संबंध स्थापित करना। अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करिए अपने संतान के लिए जाति धर्म के भेद मिटाकर लड़का या लड़की खोजिए। सम्भव है कुंठा से ग्रसित कुछ लोग आपसे दुर्व्यवहार भी कर दें मगर आप अपना काम करिए, मानवता के अनुकूल जीवनसाथी की खोज करिए। जिस दिन हम समाज को जाति धर्म के बंधन से मुक्त कर लेंगे, जिस दिन हम असमान को समाप्त कर पाएंगे उसी दिन यह धरती उस काल्पनिक स्वर्ग का वास्तविक आकार ले लेगा।वैवाहिक जीवन की अग्रिम शुभकामनाएं…..

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