रायपुर – कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस के उपलक्ष्य में मंगलवार को कार्यक्रम आजोजित किया गया।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सुशील त्रिवेदी उपस्थित थे।इस अवसर पर जनसंपर्क के सूक्ष्मतम रूपों व तत्वों के बारे में विद्यार्थियों को बताते हुए उन्होंने कहा कि जनसंपर्क में हितकारी संबंध विश्वासों पर आधारित होता है। विश्वास तभी कायम होता है, जब वायदों की पूर्ति होती है।तकनीक, रचना व मैदानी स्तर पर उपयोग की जाने वाली संरचना की रणनीति को प्रयुक्त करके श्रद्धा और विश्वास को बनाए रखा जा सकता है।

सुशील त्रिवेदी ने अपने संबोधन में आगे कहा कि जनसंपर्क में रोज अनेकानेक छोटे-छोटे कार्य करने होते हैं जबकि सिर्फ एक दो बड़े कार्य ही करने होते हैं।ये काम तीन बातों पर निर्भर करता है, कॉमन सेंस, कॉमन कर्टसी और शालीनतापूर्ण व्यवहार, प्रभावी जनसंपर्क के लिए समाज व समूह के सामाजिक व्यवहार को समझना अति आवश्यक है।यही परस्पर संतोषजनक संचार की प्रक्रिया होती है।जनसंपर्क से ही मजबूत रिश्ता बनता है।जिसका जनसंपर्क अच्छा होगा तो उसका जनसंबंध मजबूत होगा।

जनसंपर्क मतलब रिलेशनशिप, किंतु आजकल इसमें थोड़ी कमी आ गई है।जिससे जनसंपर्क की परिभाषा थोड़ी बदल गई है।उन्होंने आगे कहा कि जनसंपर्क लोगों को प्रभावित करने के लिए विज्ञापन जारी करता है।

सामाजिक कार्यों के बढ़ जाने के बावजूद भी सामाजिक मूल्यों को समाहित नहीं करने, पारिवारिक, सामुदायिक हितों की अनदेखी नहीं किया जा सकता है।वर्तमान दौर में राष्ट्रीय हित सर्वोपरी हो गया है।डिजिटलीकरण के दौर में हर व्यक्ति स्वयं में समाचार माध्यम, समाचार ग्राहता, प्रेषक और संपादक हो गया है।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंश अब हर तरह के फैसले करने लगा है, अगर हर फैसले वो स्वयं करने लगेगा तो जनसंपर्क अधिकारी क्या करेगा?

सुशील त्रिवेदी ने कहा कि पिछले दो वर्षों में सब ऑनलाइन हो गया है।हमारे अपने संबंध कम हो गए हैं. पिछले कुछ वर्षों में वैश्विकरण के विपरीत स्थिति बन रही है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत आचरण किया जा रहा है।हमारी टेक्नॉलॉजी जो एनालॉग थी वो अब डिजिटल हो गई है।इंटरनेट की एक अदृश्य शक्ति हमारे मन-मस्तिष्क को संचालित कर रही है।ये बातें दुनिया को युद्ध की ओर धकेल रही है।शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार को लेकर पूरी दुनिया का विश्वास डगमगा गया है।हमें रिलेशनशिप में आना होगा।सिर्फ व्यवहार से विश्वास नहीं बनाया जा सकता।विश्वास का कोई विकल्प नहीं है।विश्वास अंतर्वैक्तिक होता है।

डॉ. सुशील त्रिवेदी ने बताया कि एक जनसंपर्क अधिकारी एंटिना की तरह भी होता है व रिसीवर की तरह भी और उसे ही सूचना को प्रसारित भी करना होता है। हमें विचार करना होगा कि विश्वास कैसे आएगा।आभाषीय संसार में भौतिक दूरियां कम हो गयी है।आभाषीय नजदीकियां भी बढ़ी है और भौतिक दूरियां भी जनसंपर्क का आधार ही विश्वास है, आज जनसंपर्क से विश्वास कम हो रहा है।हमें जनसंपर्क के तीन मूल मंत्र को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।अच्छा कार्य, संद्भावना व दोनों पक्षों को जोड़ने वाला संतोषजनक कार्य, इससे लोगों में विश्वास बढ़ेगा।

कुलपति प्रो. बल्देव भाई शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि जनसंपर्क केवल एक विषय नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से एक कनेक्टिविटी का माध्यम है। इस क्षेत्र में विद्यार्थियों के लिए अवसरों की असीम संभावना है बशर्ते वे अपनी गुणवत्ता निखारें और फिल्ड की भाषा और संस्कृति को समझें।बाजार के अनुरूप पारंगत होंगे तो उस क्षेत्र को अच्छे से कनेक्ट कर पाएंगे। पढ़ाई के साथ-साथ बाहरी ज्ञान का होना भी जरूरी है।केवल सूचना देने भर से जनसंपर्क नहीं हो जाता है।

उन्होंने कहा, बाजार भावनात्मक रूप से बहुत तेज हो गया है। आधुनिकता के साथ परंपराओं का उल्लेख व समावेश उनके विज्ञापनों में होता है।मानवीय व सामाजिक गुणों व भावनाओं को वे अपने प्रचार के तंत्र में सम्मिलित कर रहे हैं।इससे संचार के अनेक उपक्रम के द्वार खुलता है।इस क्षेत्र के बेहतर जानकार बनने के लिए भाषा की अच्छी समझ हो, परंपराओं, इतिहास व क्षेत्र विशेष की संस्कृति को समझकर हम बेहतर काम कर सकते हैं।लोगों के साथ भावनात्मक रूप से न जुड़ पाएं तो ये महज किताबी ज्ञान ही रह जाएगा।

कार्यक्रम का संयोजन विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डॉ. आशुतोष मंडावी, आभार प्रदर्शन कुलसचिव डॉ. आनंद शंकर बहादुर व मंच संचालन चैताली पांडे ने किया. इस अवसर पर विज्ञापन व जनसंपर्क विभाग के एसो. प्रो. शैलेन्द्र खंडेलवाल, पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष पंकज नयन पांडेय, डॉ. नृपेन्द्र शर्मा, जनसंचार विभाग के सहा. प्राध्यापक डॉ. राजेन्द्र मोहंती, अतिथि प्राध्यापक, कर्मचारीगण सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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