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आज ही के दिन नाथूराम गोडसे को हुई थी फांसी,पढ़िए पूरी कहानी

NathuRam Godse

नाथूराम गोडसे (NathuRam Godse) को आज ही के दिन वर्ष 1949 में महात्मा गांधी की हत्या करने का दोष साबित होने के बाद दी गई थीं फांसी।इसके बाद जेल की चारदीवारी के भीतर ही उसका दाह संस्कार कर दिया गया।इसके बाद जेल में उस जगह को खोद दिया गया था।गांधीजी हत्या का मुकदमा 27 मई 1948 को लालकिले में नाथूराम गोडसे (NathuRam Godse) और अन्य सात आरोपियों के खिलाफ शुरू हुआ था।यहीं पर आजाद हिंद फौज के अफसरों पर मुकदमा चला था।इस मुकदमे को रेक्स बनाम नाथूराम और अन्य के नाम से जाना गया।ये कार्यवाही किले के मैदान पर बनी आलीशान विक्टोरियाई इमारत की ऊपरी मंजिल में चली।मुकदमे के जज आत्माचरण थे।मुकदमे में कोई ज्यूरी नहीं थी।

अदालत में कैसे चला मुकदमा

महात्मा गांधी की जीवनी ‘द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी’ में लेखक राबर्ट पेन ने इस मुकदमे और गोडसे की फांसी के बारे में विस्तार से लिखा है।किताब के अनुसार,लालकिले की जिस अदालत में ये मुकदमा चल रहा था,उस कक्ष के बाहर एक लंबे-चौड़े सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था।अदालत के अंदर जाने के लिए मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षरित एक पास लेना जरूरी था।जो केवल एक दिन के लिए वैध होता था। अगले दिन नया पास बनवाना होता था।

चाहे वो वकील हो या फिर अदालतकर्मी सभी को तलाशी के बाद ही अंदर जाने दिया जाता था।ये मुकदमा सबसे अधिक लंबा मुकदमा था,जो अगले साल तक चलता रहा।अभियोजन पक्ष के कुल मिलाकर 149 गवाह थे।गवाहों के बयान और सबूतों को इकट्ठा करने की प्रक्रिया नवंबर तक चलती रही।हर सवाल और जवाब का तर्जुमा हिंदुस्तानी,मराठी और तेलुगु में भी दर्ज किया जाता था।कभी कभी पूरे दिन में एक ही गवाह का बयान दर्ज हो पाता था और शाम तक चारों भाषाओं के एक या दो पन्ने ही तैयार हो पाते थे।

गोडसे ने अदालत को बताया -क्यों झुका था वो

जैसे जैसे मुकदमा आगे बढ़ा,ये साफ होने लगा कि नाथूराम के अलावा किसी साजिशकर्जा को ये अंदाज ही नहीं था कि वे क्या कर रहे हैं।जब नाथूराम ने अदालत में बोलना शुरू किया तो ऐसा लगा कि संपूर्ण देवमंडल उसे वहां सुनने के लिए इकट्ठा हो।उसने पूरी बात को धर्मयुद्ध से जोड़ा।उसने कई बार भगवतगीता को उद्धृत किया।

लोगों को अचरज था कि वो गांधी को मारने से पहले उनके आगे झुका क्यों था।गोडसे ने इसका जवाब यों दिया,जैसे अर्जुन ने पहले द्रोणाचार्य के चरणों में बाण मारकर उन्हें प्रणाम किया और फिर अगले बाण से उनका वध किया,वैसे ही उसने भी पहले गांधीजी को प्रणाम किया और फिर उन्हें मारा।

गोडसे ने कभी खुद को अर्जुन तो कभी कृष्ण माना

गोडसे ने अपने भाषण में महाभारत के सभी योद्धाओं के नामों को बार बार दोहराया। वो खुद को पौराणिक कथाओं से बाहर नहीं निकाल पा रहा था।विभाजन के बाद त्रासद खूनी खेल को भी वो एक काल्पनिक कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध के रूप में देख रहा था,जिसमें वो खुद अर्जुन था।एक ऐसा नायक-जिसकी जिम्मेदारी थी कि इस युद्ध को परिणति तक पहुंचाया जाए।हालांकि उस वक्त ऐसी कल्पना करने वाला वो कोई अकेला भारतीय नहीं था।अनगिनत लोग ये सोच रहे थे कि भारत खूनी नदी से निकलकर नए युग में जा रहा है।

बचने की कोई कोशिश नहीं की

नाथूराम का बयान बचने की कोई कोशिश नहीं थी बल्कि जीत की घोषणा थी।हालांकि ज्यादातर लोगों की नजर में उसका बयान बिल्कुल अतार्किक था।कई जगह वो खुद को इस तरह निरुपित करता मानो वो कृष्ण ही हो।

गोडसे के भाषण के बाद पूरा मुकदमा ही निरर्थक लग रहा था।एक दिसंबर से 30 दिसंबर तक पूरे महीने वकील बहस करते रहे।हालांकि बहस करने के लिए कुछ रह नहीं गया था।सावरकर ये सिद्ध करने में सफल हो गए थे कि हत्या,षडयंत्र और षडयंत्रकारियों से उनका कोई संबंध नहीं था।सबूतों के आधार पर वो खुद को लगातार निर्दोष साबित कर रहे थे।

गोडसे और आप्टे को मृत्युदंड

10 फरवरी 1949 को फैसला सुनाया गया।नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड दिया गया।सावरकर को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया।अन्य आरोपियों को जीवनपर्यंत देशनिकाला (कालापानी की सजा) दिया गया।साथ ही विभिन्न स्तरों पर कठोर सजा।जस्टिस आत्माराम ने अपने निर्णय में ही गांधी की रक्षा करने में नाकाम पुलिस की उसकी अक्षमता के लिए कड़ी निंदा भी की।

शिमला में बनी विशेष अदालत

पूरे बचाव पक्ष ने फैसले के खिलाफ अपील की।इसलिए एक विशेष अपीलीय अदालत बनाई गई।ये अदालत शिमला में स्थापित हुई।शिमला में वाइसराय के बंगले की ऊपरी मंजिल को तुरत फुरत अदालत कक्ष में बदल दिया गया।अगले छह हफ्तों तक तीन जज सबूत,गवाहों के बयानों आदि का फिर से निरीक्षण करते रहे।

गांधीजी के बेटे ने लिखा खत

इस अदालत ने गोडसे की अपील खारिज कर दी।उसे आप्टे के साथ अंबाला की केंद्रीय जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।अब उसे कोई आशा नहीं थी।इसके बाद उसने गांधीजी के बेटे रामदास को एक खत भी लिखा,जो जवाबी खत था।उसने इच्छा जाहिर की कि वो उनसे मिलना चाहता है।दोनों के बीच लंबा पत्र व्यवहार चला,जो एक रूखे और आकस्मिक मोड़ पर आकर खत्म हो गया।

जेल में किताबें पढते रहते थे

जेल में गोडसे और आप्टे आदर्श कैदियों की तरह थे। गोडसे पढता रहता था। आप्टे ने भारतीय चिंतन पर एक टीका लिखी। दोनों पढ़ने लिखने में मशगूल रहते थे। कभी कभी उनके वकील उनसे मिलने आते थे पर वो दोनों उनकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।नवंबर आते आते साफ हो गया था कि बचाव की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। जल्द ही दोनों को फांसी दे दी जाएगी। 15 नवंबर 1949 की सुबह गांधीजी की हत्या के करीब दो साल बाद उन दोनों को जेल के अहाते में लाया गया।

फांसी के बाद जेल में अंतिम संस्कार

गोडसे पहले निकला था और फांसी को देखकर एक बारगी कांप गया था। आप्टे शांत और अपने आप में मगन था। दोनों का साथ फांसियां लगाई गईं। आप्टे की तत्काल मौत हो गई जबकि गोडसे के शरीर से जान निकलने में 15 मिनटों का समय लगा।

दोनों के शरीरों को जेल की चारदीवारी के भीतर ही जला दिया गया और उनके दाह संस्कार की जगह को अच्छी तरह जोत दिया गया ताकि उनकी कोई राख इकट्ठी नहीं हो सके। उसी रात को गोडसे और आप्टे के शरीर के अवशेषों को घग्घर नदी में एक गोपनीय स्थल पर बहा दिया गया।

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