MyNews36 “पुरुष और स्त्री का भेद” के अंतर्गत आज की कविता – ” मधुशाल्य के इस ओर से देखूं ,वैश्यालय के उस ओर तक… “

मैं मधुशाल्य पुरुषों में कोई भेद नहीं करती,
मैं वैश्यालय पुरुषों में कोई भेद नहीं करती,
मधुशाल्य में बैठ कर खुद को शेर समझता है,
वैश्यालय में लेट कर खुद को ताकतवर समझता है,
मधुशाल्य ना जात पूछती है,
वैश्यालय ना उम्र जानती है,
मधुशाल्य ना समय पहचानती है,
वैश्यालय ना दिन,रात देखती है,
मधुशाल्य दुःख में,सुख में साथ देते है,
वैश्यालय हर मर्द का राज़ जानती है,
मधुशाल्य पढ़े लिखे और अनपढ़ के साथ बैठती है,
वैश्यालय हर वर्ग के साथ सोती है,
मधुशाल्य में जाना सब को अपनी शान लगती है,
वैश्यालय में सब को मुह छुपा कर आना पड़ता है,
मधुशाल्य में ना रंग रूप का रोना है,
वैश्यालय में ना कद काठी का झमेला है,
मधुशाल्य चार दोस्तों के जाम में है,
वैश्यालय चार पहियों के बिस्तर में है,
मधुशाल्य कभी किसी के घर भी जाती है,
वैश्यालय कभी किसी के कमरे के बाहर भी नहीं आती है,
मधुशाल्य कभी दिन के उजाले में भी बिक़ती है,
वैश्यालय कभी दिन के उजाले में नहीं दिखती है,
मधुशाल्य की हर वक़्त होती चर्चा पुरुषों के बीच,
वैश्यालय की हर वक़्त होती इक्छा मर्दों के बीच,
मधुशाल्य बिक़ती है खुले आम बाजारों में,
वैश्यालय बिक़ती है बंद दीवारों में,
मधुशाल्य में पी कर माँ,बहन की गाली देता, औरत को प्रताड़ित करता है,
वैश्यालय में पी कर आता और इज़त रौंदता है,
शराब भी स्त्रीलिंग कहलाती है,
शबाब भी नारी की ही जाती है,
“मधुशाल्य हो या वैश्यालय हो”
कोई फर्क नहीं दोनों में,
रोज नए पाठ पढ़ाती है,
ये भी तो एक शाल्य कहलाती है ।

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