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मोटरसाइकिल पर तेजी से गुजरते हुए
रास्ते पर मिले…
जानवरों के हुजूम का अभिवादन कर
अदा करता हूं शुक्रिया
“बढ़िया लगता है तुम लोगों को यहां देखकर,तो तुम अब भी यहां हो!”
‘हां हम हैं, कि कहां जाएं ?
मगर तुम्हारी गति से कुछ शर्मिंदा रहते हैं।
जाओ, आगे बढ़ जाओ, सनाक से निकल लो!
वे हड़बड़ा कर रास्ता देने की कोशिश करते हैं।
“नहीं, हमने सड़क बिछा ली तो क्या?
यह रास्ता हमसे बहुत पहले से तुम्हारा है!”
वे पूंछ की फटकार से मक्खियां उड़ाते हुए
असहज आवाज में पूछते हैं
‘तुम्हें खराब तो नहीं लगता
हमारा इस तरह बेढंगे तरीके से चलना?
और लद से यहां-वहां गोबर कर देना?
क्या करें, चलने और गोबर करने पर
हमारा अपना वश ही नहीं है!”
मगर हवा की एक मीठी मुस्कान
उनकी पीठ थपथपाती है
झुंड के सड़क पार करने की
सहृदयता से प्रतीक्षा करता हूं
देता हूं धन्यवाद
कि बेतरतीब बढ़ी सड़कों को
बनाया है उन्होंने बेहतर
दी है उन्हें नई दिशाएं
और मंजिलों की नहीं पहचानें
कि इन सड़कों का इस्तेमाल
वे कोलकाता या कुदीकोल्लम जाने के लिए नहीं कर रहे….
उन्हें तो जाना है (उनकी अपनी भाषा में)– लेपचुआकेढेपकचुवाकचन्नी–
जिसके लिए वे कई सड़कों
पहाड़ों, जंगलों और पगडंडियों के
टेढ़े मेढ़े टुकड़ों को मथ कर
एक नया मानचित्र गढ़ने की कोशिश में हैं
“शुक्रिया, कि तुम इतने सृजनशील हो!”
मैं चिल्ला उठता हूं उत्साह के अतिरेक में
“तुम पुरस्कार, या पैसे या यश के लिए
नहीं कर रहे यह सब
तुम्हें सचमुच पहुंचना है– लेपचुआकेढेपकचुवाकचन्नी–
कितना जरूरी है तुम्हारा वहां पहुंचना
इसे कोई राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री कभी नहीं समझ सकता
जिसकी समझ ही इतनी विकसित नहीं
कि पहुंच पाए गमागमन कि इस अर्थवत्ता तक!”
जानवर कातर होकर मुझे देखते हैं
‘शुक्रिया,’ वे कहते हैं
मगर हमारी दुर्गंध से कहीं तुम्हें
भयंकर असुविधा तो नहीं हो रही?
तुम्हारी दुनिया में हम बेहद भद्दे से
धब्बों जैसे लग रहे होंगे!’
असहज भाव से अपने खुरों को
टेढ़ीमेढ़ी सड़क की कोलतार सनी गिट्टियों पर
खटपटाते चलते चले जाते हैं वे
उन्हें रोककर और भी बहुत कुछ
बोलने बतियाने का करता है मन!

कविता – डॉ.आनन्द शंकर बहादुर
कुलसचिव, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय- रायपुर (छत्तीसगढ़)

MyNews36 के प्रधान संपादक ने कुलसचिव डॉ. आनंद शंकर बहादुर से इस कविता के बारे में बातचीत की तो उन्होंने कहा कि- यह कविता में मैं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पशुधन को लेकर उठाए गए क्रान्तिकारी कदमों से बहुत प्रभावित हुआ हूं और पशु मेरी सोच के केन्द्र में आए हैं। मैं मनुष्य और पशु के आपसी रिश्ते को पुनर्परिभाषित करना चाहता हूं।

कविता मेरे लिए अपने समय और समाज से बातचीत करने का माध्यम हैं। वे अपने आप आती हैं। भीतर ही भीतर एक गुफ्तगू चलती रहती है। और एक छटपटाहट रहती है उसे अभिव्यक्त करने की।पशु कोई काम यश के लिए नहीं करते, और इस बात में वे हम मनुष्यों से श्रेष्ठ हैं।हम उनसे सीख सकते हैं।

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