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रायपुर-सनातन संस्कृति के अनुरुप शास्त्रीय परंपराओं को मानने वालों के लिए अब मात्र पांच मुहूर्त ही श्रेष्ठ बचे हैं।जून माह में मात्र एक मुहूर्त और जुलाई में चार मुहूर्त हैं।यदि इन पांच मुहूर्तों में विवाह योग्य संतानों का ब्याह नहीं किया गया तो फिर युवाओं को सात फेरे लेने के लिए चार माह का लंबा इंतजार करना पड़ेगा।इसका कारण यह है कि 12 जुलाई को देवशयनी एकादशी पड़ रही है।

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इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करने चले जाएंगे।वे चार महीने पश्चात देवउठनी एकादशी को जागेंगे।ऐसी मान्यता है कि जब भगवान विष्णु का शयनकाल होता है तो उस दौरान किसी भी तरह का शुभ संस्कार संपन्न नहीं किया जाता।इसे चातुर्मास काल भी कहा जाता है।

देवउठनी एकादशी के बाद शुरू होंगे मुहूर्त

पं.मनोज शुक्ला के अनुसार जून माह में 25 जून को आषाढ़ कृष्ण अष्टमी तिथि विवाह के लिए शुभ है।इसके बाद अगले माह जुलाई में चार मुहूर्त 7,8,10 और 11 जुलाई को है।इसके पश्चात अगले चार माह तक विवाह के लिए कोई मुहूर्त नहीं है।

नवंबर माह में 8 तारीख को देवउठनी एकादशी पर तुलसी-शालिग्राम का ब्याह की परंपरा निभाने के बाद मुहूर्त शुरू होंगे।नवंबर में 19,20 और 23 तथा दिसंबर में एक और 10 तारीख को फेरे लिए जा सकेंगे।14 दिसंबर से मलमास शुरू हो जाएगा।

चातुर्मास काल पूजा-पाठ,कथा के लिए श्रेष्ठ

ऐसा माना जाता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान की पूजा-पाठ, कथा सुनने से जीवन में किए गए पाप कटते हैं और मोक्ष का द्वार खुलता है। इस दौरान भगवान विष्णु पाताल लोक में पत्नी लक्ष्मी के साथ विश्राम करते हैं, जिसके कारण शास्त्रों में किसी भी तरह के शुभ कार्यों को करने की मनाही है।

भगवान विष्णु के अलावा सभी देवगण चार माह तक विश्राम करते हैं। इस दौरान साधु, संत एक ही जगह रहकर भगवान की आराधना करते हैं। चातुर्मास का काल पूजा, पाठ, भजन, कीर्तन, सत्संग, श्रीरामकथा, श्रीमद्भागवत कथा, शिव पुराण कथा, देवी भागवत कथा सहित अन्य कथाओं का श्रवण करने के लिए श्रेष्ठ समय माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान की पूजा-पाठ,कथा सुनने से जीवन में किए गए पाप कटते हैं और मोक्ष का द्वार खुलता है।इस दौरान भगवान विष्णु पाताल लोक में पत्नी लक्ष्मी के साथ विश्राम करते हैं,जिसके कारण शास्त्रों में किसी भी तरह के शुभ कार्यों को करने की मनाही है।

भगवान विष्णु के अलावा सभी देवगण चार माह तक विश्राम करते हैं।इस दौरान साधु,संत एक ही जगह रहकर भगवान की आराधना करते हैं।चातुर्मास का काल पूजा, पाठ,भजन,कीर्तन,सत्संग, श्रीरामकथा,श्रीमद्भागवत कथा,शिव पुराण कथा,देवी भागवत कथा सहित अन्य कथाओं का श्रवण करने के लिए श्रेष्ठ समय माना जाता है।

तीर्थों की मनाही लेकिन बृज क्षेत्र पर रोक नहीं

शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में तीर्थ यात्रा करने की भी मनाही है।भारत के सभी तीर्थों में सिर्फ बृज क्षेत्र की यात्रा की जा सकती है।माना जाता है कि सभी देवगण चातुर्मास काल में भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली बृज क्षेत्र के मथुरा,वृंदावन,गोकुल,बरसाना,नंदगांव आदि क्षेत्रों में निवास करते हैं।इस मान्यता के चलते श्रद्धालु राधे-कृष्ण के दर्शन करने जाते हैं।

नहीं होंगे ये संस्कार

विवाह संस्कार

मुंडन संस्कार

जनेऊ संस्कार

गृह प्रवेश

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