आज यानि 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी का जन्म 1869 में गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में  भी मनाया जाता है। देशभर में इस साल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 151वीं जयंती मनाई जा रही है। गांधी जी को अलग- अलग नामों से बुलाया जाता है। कोई उन्हें राष्ट्रपिता कहता है कोई उन्हें बापू कहता है तो कोई महात्मा कहता है, लेकिन बापू के ये अलग- अलग नाम दिए किसने। इसके पीछे की क्या कहानियां है और नाम पड़ने के पीछे का क्या कारण है। चलिए आज पढ़ते हैं इनके बारे में-

कैसे मिली महात्मा पद की उपाधि ?

महात्मा शब्द संस्कृत से लिया गया है। इस शब्द का मतलब होता है महान आत्मा। गांधी जी को पहली बार कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने महात्मा शब्द से संबोधित किया था।हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गांधी जी को सबसे पहली बार 1915 में राजवैद्य जीवन राम कालिदास ने उन्हें महात्मा कहकर संबोधित किया था।लेकिन इतिहास की ज्यादातर किताबों में यही पढ़ने को मिलता है कि सबसे पहले रविंद्रनाथ टैगोर ने ही उन्हें महात्मा शब्द से संबोधित किया था।मार्च 1915 गांधी जी और टैगोर की पहली मुलाकात शांति निकेतन में हुई थी।इसके बाद से इन दोनों महापुरूषों ने देश की आजादी में अहम योगदान दिया। 

किसने पुकारा सबसे पहले बापू के नाम से ?

गांधी जी को बापू नाम बिहार के चंपारण जिले  के रहने वाले गुमनाम किसान से मिला था। दरअसल बिहार के चंपारण जिले में गांधी जी ने निलहा अंग्रेजों द्वारा भारतीय किसानों पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई थी। सही मायनों में अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ बापू के आंदोलन की शुरुआत चंपारण से ही हुई थी। बापू जब चंपारण पहुंचे तो यहां एक कमरे वाले रेलवे स्टेशन पर अपना कदम रखा उस वक्त किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इस धरती से मिलने वाला प्यार उन्हे देशभर में बापू के नाम से मशहूर बना देगा। दरअसल  राजकुमार शुक्ला ने गांधी जी को एक चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी ने ही उन्हें को चंपारण आने पर विवश कर दिया था। उस गुमनाम किसान को आज दुनिया राजकुमार शुक्ल के नाम से जानती है।
 

किसने कहा राष्ट्रपिता ?

मोहनदास करमचन्द गांधी को पहली बार नेताजी सुभाष चन्द्रबोस ने राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित किया था। 4 जून 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश प्रसारित करते हुए महात्मा गांधी को ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया था इसके बाद 6 जुलाई 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने एक बार फिर रेडियो सिंगापुर से एक संदेश प्रसारित कर गांधी जी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया। बाद में भारत सरकार ने भी इस नाम को मान्यता दे दी। गांधी जी के देहांत के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी रेडियो के माध्यम से देश को संबोधित किया था और कहा था कि ‘राष्ट्रपिता अब नहीं रहे’।

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