कबीर मंथन : चाकी-चाकी सब कहे,कीली कहे न कोय…

चाकी चाकी सब कहे, कीली कहे न कोय।
जो कीली से लाग रहे
बाको बाल न बांका होए।
हम सब यह जानते है कि चक्की में अनाज पिसते समय, अनाज केंद्र में स्थापित कील के पास डाला जाता है और धीरे धीरे वह चक्की के पांटों के बीच आ कर पिस जाता है किन्तु अनाज का वह दाना बच जाता है जो कील के करीब रहता है। ठीक इसी प्रकार जीवन भी एक चक्की की भांति है । आत्मा इस नश्वर शरीर में एक मात्र जाग्रत है ,शाश्वत है और कील के स्थान पर है ।आत्मा ईश्वर स्वरूप है किन्तु दिखलाई नहीं देता। अजीब सी बात है जो दिखता नहीं , जिसका अस्तित्व के विषय में हम कुछ कह नहीं पाते उसे कहां से पाए।
कबीर फिर कहते है-
मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे
मै तो तेरे पास में
ना तीरथ में ना मूरत में
ना एकांत निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में
ना काबे कैलास में
ना में जप में ना में तप में
ना में बरत उपास में
ना में क्रिया करम में रहता
नहिं जोग संन्यास में।
फिर कहां है वह जिसके आस पास जीवन की यह चक्की चल रही है।
खोजी होए तुरत मिल जाऊं
इक पल की तालास में
कहत कबीर सुनो भई साधो
मै तो हूँ विश्वास में।
आप को इस विश्वास रूपी कील के करीब जाना है।उसे हर रूप में देखना है ।सर्वप्रथम अपने में देखना है। दुराग्रह की गांठ जब खुल जाती है ,तब विश्वास का वह बीज अंकुरित होता है जिसके वृक्ष स्वरूप होने पर वह सब को छाया देने लगता है। आप अपने जितने करीब आएंगे , जितने अंतर्मुखी होंगे , जितना यह विश्वास करेंगे कि संसार सब एक सार है उतना ही प्रसन्न होते जाएंगे।
अवधूत दत्तात्रेय जी और भक्त प्रल्हाद का संवाद इस भाव की प्रेरणा करता है कि निर्लिप्त रह कर किस प्रकार आप सब कुछ का आनंद ले सकते है।अवधूत कहते है कि मुझे कभी एक वक्त भोजन मिलता है उसे भी मै प्रेम से खाता हूं, कभी दो वक्त भी मिल जाता है और कभी इतना मिल जाता है कि सीमा ही टूट जाती है। कभी चट्टान पर सोता हूं , तो कभी कुछ दयावान राजा मुझे महलों में गद्दो पर सुलाते है। अर्थात हर अवस्था में अपने को प्रसन्न रखना तथा ईश्वर के समीप पाना ही जीवन मुक्त होना है। इसी अवस्था में आप उसे पा लेते है ,जिसे बाहर ढूंढते है ।
सरलता और सहजता दो ऐसे गुण है जो बच्चो में पाए जाते है ।यही दो गुण भक्तो में पाए जाते है। जो भक्त सात्विक भक्ति सराबोर होते है , उन्हें क्या मिला और क्या खोया की चिंता नहीं होती है ।वे बंधन में डालने वाले कर्मकांडो में नहीं पड़ते। नरसिंह मेहता, मीरा , कबीर, सूरदास , तुलसीदास में यही गुण थे , जो आज तक समाज उनका अनुसरण करने का प्रयास कर रहा है।

अतः आप जितनी अपनी अंतरात्मा के करीब होंगे, जितना सहजता के पास जाएंगे, जितना प्रेम करेंगे , जितना लोगो के उपेक्षा अथवा दुर्भानावश किए गए व्यवहार को विस्मृत करेंगे उतना ही आसानी से प्रसन्नता को आत्मसात करेंगे।

✍️ लेख- डॉ.उषा किरण अग्रवाल

प्राध्यापक मनोविज्ञान, शासकीय दूधाधारी बजरंग महिला स्नात्कोत्तर महाविद्यालय ,रायपुर

1 Comment
  1. Gajendra Thakur says

    बहुत ही उपयोगी है यह कबीर मंथन जीवन में जो इन मूल सिद्धांतों में अगर चले तो निश्चित ही वह अपने श्रेष्ठ मार्ग में चलेगा और श्रेष्ठ नागरिक के गुणों का वह स्वामी होगा

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