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Kabir Das: जीवनभर आडंबरों पर प्रहार करते रहे संत कबीरदास,पढ़े कुछ दोहे…

Kabir Das

संत कबीरदास आजीवन समाज में व्याप्त आडंबरों पर प्रहार करते रहे।वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में मिलती है।माना जाता है कि-उनका जन्म काशी में लहरतारा में हुआ।स्वामी रामानंद को उन्होंने अपना गुरु माना।कबीरदास जी पढ़े-लिखे नहीं थे।वह किताबी विद्या प्राप्त न कर सके।उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे,मुख से बोले और उनके शिष्यों ने उसे लिखा।

संत कबीरदास जी की शिक्षा आज भी प्रासंगिक है और समाज को मार्ग दिखाने वाली है।उनका अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ।वह काशी के जुलाहे के रूप में जाने जाते हैं।बहुत से लोग आजमगढ़ के बेलहरा गांव को उनका जन्मस्थान मानते हैं।‘बेलहरा’ ही बदलते-बदलते लहरतारा हो गया।एक बार दक्षिण भारत से महान पंडित सर्वानंद,कबीरदास जी से बहस करने आए लेकिन उन्होंने बिना किसी बहस सर्वानंद को लिखित में देकर अपनी हार स्वीकार की।इसके बाद सर्वानंद ने उन्हें अपना गुरु मान लिया और अपने पूरे जीवनभर कभी कोई किताब नहीं छुई।

कबीरदासजी अपने जीवन के आख़िरी समय में मगहर चले आए और 1518 में यहीं उनकी मृत्यु हुई।मगहर के बारे में माना जाता था कि-यहां मरने वाला व्यक्ति नरक में जाता है।कबीरदास जी स्वेच्छा से मगहर आए और इस अंधविश्वास को तोड़ना चाहते थे कि-काशी में मोक्ष मिलता है और मगहर में नरक।उनकी मृत्यु के उपरांत उनके शव को लेकर विवाद हो गया।हिन्दू कहते थे कि-उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से।जब उनके शव से चादर हटाई गई,तब वहां फूलों का ढेर था।वहां से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने।मुसलमानों ने मुस्लिम रीति और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं,जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

कबीर के दोहे

बुरा जो देखन मैं चला,बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना,मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला।जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का,पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

साधु ऐसा चाहिए,जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै,थोथा देई उड़ाय।

अर्थ: इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये,जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े,तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

धीरे-धीरे रे मना,धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा,ॠतु आए फल होय।

अर्थ: मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !

माला फेरत जुग भया,फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे,मन का मनका फेर।

अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

जाति न पूछो साधु की,पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का,पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ: सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।

दोस पराए देखि करि,चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई,जिनका आदि न अंत।

अर्थ: यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।

जिन खोजा तिन पाइया,गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा,रहा किनारे बैठ।

अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

बोली एक अनमोल है,जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के,तब मुख बाहर आनि।

अर्थ: यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

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