चाणक्य की नीति को अपने जीवन में उतारने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी कमजोर क्यों न हो अपने आप को बुरे समय से बचा ही लेता है और चाणक्य की बातें सच साबित हुई हैं जिसमे कोई दोरह नहीं है चाणक्य की गिनती दुनिया के बड़े विद्वानों में की जाती है और उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक चाणक्य नीति पूरी दुनिया में बहुत प्रसिद्ध है कहा जाता है कि जब कोई व्यक्ति इंसान अपने जीवन में चाणक्य द्वारा बताई गई बातों का पर अमल करता है तो जीवन में सफलता प्राप्त करता है आज की इस पोस्ट में हम आपको चाणक्य द्वारा बताई गई ऐसी 3 बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें होशियार व्यक्ति को हमेशा गुप्त रखनी चाहिए।

आचार्य चाणक्य के अनमोल नीति जो बदल सकते है आपके विचारो को वह निम्न्लिखित है

(1 ) सुख का आधार धर्म है धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है अर्थ का आधार राज्य है निर्बल राजा को तत्काल संधि करनी चाहिए ,पडोसी राज्यों से सन्धियां तथा पारस्परिक व्यवहार का आदान-प्रदान और संबंध विच्छेद आदि का निर्वाह मंत्रिमंडल करता है, निकट के राज्य स्वभाव से शत्रु हो जाते है, किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है , ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए , वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है,संकट में केवल बुद्धि ही काम आती है ,लोहे को लोहे से ही काटना चाहिए, यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए ,यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए।

( 2 ) किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है सांप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है, न की अमृत एक बिगडैल गाय सौ कुत्तों से भी ज्यादा श्रेष्ठ है अर्थात एक विपरीत स्वभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते हैं, शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता,एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है,आपातकाल में स्नेह करने वाला व्यक्ति ही मित्र होता है, मित्रों के संग्रह से बल प्राप्त होता है। जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य,कल के मोर से आज का कबूतर भला अर्थात संतोष सब से बड़ा धन है,विद्या ही निर्धन का धन है।

(3 ) विद्या को चोर भी चुरा नहीं सकता,शत्रुओं के गुणों को भी ग्रहण करना चाहिए,अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है, किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी भी किसी भी शत्रु का साथ न करें,आलसी का न वर्तमान है, और न ही भविष्य , चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते। पहले निश्चय करिए, फिर कार्य आरम्भ करिए,भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है। अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है। शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है, आग में घी नहीं डालनी चाहिए अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए, मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है। दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है, दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती अर्थात आवश्यकतानुसार साधन जुटाने चाहिए, कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।

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