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Folk Media Notes :फोक मीडिया के हिंदी में नोट्स,भाग-1

Folk Media Notes
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Folk Media Notes

फोक मीडिया-मीडिया का वह प्रकार जो आमतौर पर छोटे समूहों या स्थानीय स्तर पर समाज के साथ संवाद करने के लिए जिस मीडिया का उपयोग किया जाता है,इसे ही फोक मीडिया कहते है।

यह जन संवाद का विशेषाधिकार प्राप्त,पूर्वानुमान योग्य संसाधन है जिसमें इंटरनेट के उदय के पूर्व संचार माध्यम में शामिल है।जैसे कि-समाचार पत्र,टेलिविज़न,पत्रिकाएँ आदि।इसे संचार के पुराने तरीक़े के रूप में जाना जाता है।

लोकगायन-छत्तीसगढ़ में लोकगायन की अपनी परम्परा विद्यमान है|लोकगायक परम्परागत  गाथाओं,फुटकर गीतों,सांसारिक गीतों और पर्वों के गीतों को गाते है|लोकगायकी में आमतौर पर लोकवाद्यों का प्रयोग होता है|

लोकगीतों की विशेषता-

1 इसमें आदिम परम्परा एवं जातीय विशेषताओं के दर्पण होते है|

2 लोकगीत विभिन्न्न पर्व,उत्सव और अनुष्ठान से जुड़े हुए होते है|

3 लोकगीतों के प्रति गांव और कृषि संस्कृति होती है|

4 लोकगीतों के रचनाकार और रचनाकाल अज्ञात होते है|

5 लोकगीतों की परम्परा मौखिक है,उसमे भाव अभिव्यक्ति,लयता,सहजता और बयानी होती है|

6 छत्तीसगढ़ के लोक साहित्य में लोकगीतों की प्रचुरता है|जिसमे छत्तीसगढ़ के संस्कार भी अधिक है|

लोकगीतों को प्रस्तुत करने वाले कलाकार-

(A)परम्परागत जातियां-जंगलों के निकट रहने वाले बसदेवा जाति,देवार जाति,परधान जाति,भिम्मा के लोग गायकी से जुड़े हुए होते है|

(B)शौकिया गायक-कवर,बंजारा व आहिर जाति|

(C)लोककला संस्कार संस्थाए|

छत्तीसगढ़ के सम्पूर्ण लोक वाद्य यंत्रों के नाम

1.ढोल-इसका खोल लकड़ी का होता है|इस पर बकरे का चमड़ा मढ़ा जाता है एवं लोहे की पतली कड़ियां लगी रहती है।जिसे चुटका कहते है।चमड़े अथवा सूत की रस्सी के द्वारा इसको खींचकर कसा जाता है|फाग तथा शैला नृत्यों में इनका विशेष उपयोग होते हैं ।

2.नगाड़ा-आदिवासी क्षेत्र में इसे यमार या ढोलकिया लोग उत्सवों के अवसर पर बजाते हैं,छत्तीसगढ़ में फाग गीतों में इसका विशेष प्रयोग होते हैं|नगाड़ों में जोड़े अलग-अलग होते हैं|जिसमें एकाकी आवाज पतली (टीन) तथा दूसरे की आवाज मोटी (गद्द) होती है|जिसे लकड़ी की डंडीयों से पीटकर बजाये जाते हैं|जिसे बठेना कहते हैं|इसमें नीचे पकी हुई मिट्टी का बना होता है ।

3.अलगोजा-तीन या चार छिद्रों वाली बांस से बनी बांसुरी को अलगोजा या मुरली कहते हैं,अलगोजा प्रायः दो होते हैं,जिसे साथ मुंह में दबाकर फूंक कर बजाते हैं|दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं|जानवरों को चराते समय या मेलों मड़ाई के अवसर पर बजाते हैं ।

4.खंजरी या खंझेरी-डफली के घेरे में तीन या चार जोड़ी झांझ लगे हो तो यह डफली या खंझेरी का रुप ले लेता है,जिसका वादन चांग की तरह हाथ की थाप से किया जाता है ।

5.चांग या डफ-चार अंगुल चौड़े लकड़ी के घेरे पर मढ़ा हुआ चक्राकार वाद्य सोलह से बीस अंगूल का व्यास होते हैं जिसे तारों हाथ के थाप से बजाया जाता है,इसके छोटे स्वरुप को डफली कहते हैं और बड़े स्वरुप को चांग कहते हैं ।

6.ढोलक-यह ढोल की भांति छोटे आकार की होती है|लकड़ी के खोल में दोनो तरफ चमड़ा मढ़ा होता है, एक तरफ पतली आवाज और दूसरे तरफ मोटी आवाज होती है,मोटी आवाज तरफ खखन लगा रहता है,भजन,जसगीत,पंडवानी,भरथरी,फाग आदि इसका प्रयोग होता है ।

7.ताशा-मिट्टी की पकी हुई कटोरी (परई) नुमा एक आकार होता है,जिस पर बकरे का चमड़ा मढ़ा होता है, जिसे बांस की पतली डंडी से बजाया जाता है,छत्तीसगढ़ में फाग गीत गाते समय नगाड़े के साथ इसका प्रयोग होता है ।

8.बांसुरी-यह बहुत ही प्रचलित वाद्य है,यह पोले होते हैं।जिसे छत्तीसगढ़ में रावत जाति के लोग इसका मुख्य रुप से वादन करते हैं,पंडवानी,भरथरी में भी इसका प्रयोग होता है ।

9.करताल,खड़ताल या कठताल-लकड़ी के बने हुए 11(ग्यारह)अंगूल लंबे गोल डंडों को करताल कहते हैं,जिसके दो टुकड़े होते हैं,दोनों टुकड़ो को हाथ में ढीले पकड़कर बजाया जाता है,तमूरा, भजन,पंडवानी गायन में मुख्यतः इसका प्रयोग होता है।

10.झांझ-झांझ प्रायः लोहे का बना होता है, लोहे के दो गोल टुकड़े जिसके मध्य में एक छेद होता है,जिस पर रस्सी या कपड़ा हाथ में पकड़ने के लिए लगाया जाता है।दोनों एक-एक टुकड़े को एक-एक हाथ में पकड़कर बजाया जाता है।

11.मंजीरा-झांझ का छोटा स्वरुप मंजीरा कहलाता है।मंजीरा धातु के गोल टुकड़े से बना होता है, भजन गायन,जसगीत,फाग गीत आदि में प्रयोग होता है ।

12.मोंहरी-यह बांसुरी के समान बांस के टुकड़ों का बना होता है।इसमें छः छेद होते हैं।इसके अंतिम सीरे में पीतल का कटोरीनुमा लगा होता है एवं इसे ताड़ के पत्ते के सहारे बजाया जाता है।मुख्यतः गंड़वा बाजा के साथ इसका उपयोग होता है।[email protected]

13.दफड़ा-यह चांग की तरह होता है।लकड़ी के गोलाकार व्यास में चमड़ा मढ़ा जाता है एवं लकड़ी के एक सीरे पर छेद कर दिया जाता है जिस पर रस्सी बांधकर वादक अपने कंधे पर लटकाता है,जिसे बठेना के सहारे बजाया जाता है,एक बठेना पतला तथा दूसरा बठेना मोटा होता है।

14.निशान या गुदुंम या सिंग बाजा-यह गड़वा बाजा साज का प्रमुख वाद्य है।लोहे के कढ़ाईनुमा आकार में चमड़ा मढ़ा जाता है।चमड़ा मोटा होता है एवं चमड़े को रस्सी से ही खींचकर कसा जाता है।लोहे के बर्तन में आखरी सिरे पर छेद होता है,जिस पर बीच-बीच में अंडी तेल डाला जाता है एवं छेद को कपड़े से बंद कर दिया जाता है।ऊपर भाग में खखन तथा चीट लगाया जाता है।टायर के टुकड़ों का बठेना बनाया जाता है,जिसे पिट-पिट कर बजाया जाता है इसके बजाने वाले को निशनहा कहते हैं।गुदुम या निशान पर बारह सींगा जानवर का सींग भी लगा दिया जाता है इस प्रकार आदिवासी क्षेत्रों में इसे सिंग बाजा कहते हैं।   

छत्तीसगढ़ी लोकगीत सूची

छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता है,गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है।गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता।छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की अविछिन्न परम्परा है।[email protected]

छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीत है –

सुआगीत,ददरिया,करमा,डण्डा,फाग,चनौनी,बाँस गीत, राउत गीत,पंथी गीत।सुआ,करमा,डण्डा,पंथी गीत नृत्य के साथ गाये जाते है।सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है।गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है।

  राऊत गीत –

यह दिपावली के समय गोवर्धन पूजा के दिन राऊत जाति के द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें तुरंत दोहे बनाए जातें हैं और गोलाकार वृत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास करते है। सारे प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर तत्कालीन सामजिक / राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए पुरुष प्रदर्शन करते है।

पुरुष गायकी के आधार पर-डंडा,डंडारी (बस्तर के होली पर नृत्य करते हुए गाय जाने वाला गीत),रावत,फाग,पंथी,गौरा गीत,रथ गीत,रहंस आदि

स्त्री-पुरुष संयुक्त गायकी के आधार पर-

कर्मा,गौरा,सरगुल,डोंगकेश,भगुरिया,घुरवा,गढ़वी,धुलिया,तम्बूरा पंडवानी,गवर,डोहा,गहर,पाली,फेरबदल,रहस,लाडू काना,नवरात्र,नवखाई,गोड़ी,भतरा,घूमर,कमार नृत्य गीत,घसिया नृत्य गीत,काऊ-माऊ,अटकन-मटकन,फुगड़ी गीत,लंगड़ी,भौरा,घुड़वा,सधौरी,समधी भेट गीत,बारात स्वागत गीत,कोरा भराई गीत,काके पानी गीत,छट्टी संस्कार गीत,बिदाई गीत,चुलमाटी गीत,विवाह गीत,तेल चढ़ाई गीत बीरम गीत,करिहं पारा,पठौनी गीत,जगन्नाथीया गीत(मृत्यु गीत),पर्व गीत,अनल पास या गाडरी गीत,लतिया भागी गीत,भोजली गीत,बांस गीत,शैला गीत,खुड़िया,छेरछेरा,माता सेवा के गीत,जसगीत,जवारा गीत,धनकुल गीत,होरी गीत,जगार गीत,श्रृंगार गीत,ददरिया,चंदैनी गंगा,दशहरा गीत,पंथी गीत,फुलवासन गीत आदि|

जनजातियों के आधार पर गीत-गोरनृत्य गीत,शैला नृत्य गीत,सरहुल नृत्य गीत,ककसार नृत्य गीत,मुरिया नृत्य गीत आदि|

लोक गाथाओं के आधार पर-ढोलामारु की कथा,भरथरी गायन

अन्य गीत-बरखा गीत,कृषि गीत

बारहमासी गीत-राखी गीत,भाई दूज गीत,तीजहीं गीत,हास परिहास के गीत,बिरहा गीत,बिहाव गीत,परिवार कल्याण गीत आदि|  

छत्तीसगढ़ के संस्कार गीत

1 चुलमाटी- विवाह अवसर पर मिट्टी लाने के समय यह गीत गाया जाता है ।

“तोला माटी कोड़ेल नई आवए नीत धीरे-धीरे
तोर कनिहा ल ढील धीरे धीरे
जतके परोसे ततके ल लील धीरे धीरे”

तेल चगही-जब वर और कन्या को तेल हल्दी लगाया जाता है तब यह गीत गाया जाता है।

परघैनी- बारात के स्वागत के समय यह गीत गाया जाता है इसमें गालियां का भी प्रयोग किया जाता है-

“आमा पान के बिजना,हालत डुलत आथे रे
किसबीन के बेटा हर बारात ले के आथे रे”

भडैनी-बारातियों को भोजन कराते समय गाए जाने वाले गीत भडैनी कहलाता है।

भाँवर गीत- विवाह के फेरे के समय गाए जाने वाले गीत गीत भाँवर गीत कहलाता है।

टिकावन गीत- विवाह संपन्न होने पर नव दंपत्ति को उपहार स्वरूप आशीर्वाद स्वरूप जो गीत गाया जाता है उसे टिकावन गीत कहते हैं।

विदाई गीत-विवाह संपन्न होने के बाद विदाई कराते समय गाए जाने वाले गीत विदाई गीत कहलाता है।

सोहर गीत-छत्तीसगढ़ में जन्म के समय कई सारे गीत गाये जाते हैं। ये गीतों का सिलसिला पूरे जन्म-संस्कार के समय जारी रहता है। बहुत ही सुन्दर है ये सारे गीत जो जन्म संस्कार के वक्त गाया जाता है। जन्म संस्कार के अन्तर्गत है गर्भ अवस्था के नौ महीने।

सबसे पहले सधौरी संस्कार, जो सातवें महीने में होता है। इस समय गर्भवती महिला को सात प्रकार की रोटियाँ खिलाते हैं। इस वक्त उस महिला के मायके की चीजे आती है जिसे मायके के सधोरी कहते हैं। बेटी के लिये कपड़े गहने भेजते है। सधौरी के वक्त दूसरी महिलायें गर्भवती महिला के लिये कपड़े, सात प्रकार की रोटीयाँ लेकर आते हैं। इन रोटियों का अलग अलग नाम है – खुरमी, पपची, लाड़ू, सोंहारी, पिड़िया, कुसमी, करी लड्डू।

पर्व गीत-

फाग गीत-यह पर्व गीत है जो होली पर गाया जाता है

ये हो मोहन खेरे होरी
काकर हाथ में रंग के कटोरा,
काकर हाथ पिचकारी
राधा के हाथ में रंग के कटोरा
कान्हा हाथ पिचकारी

गौरी गौरा-शिव पार्वती संबंधित यह पर्व गीत छत्तीसगढ़ में कार्तिक मांघ में मनाया जाता है।

“आवर होगे,भावर होगे,खाईन बरा,सोहारी हो,
गौरा महादेव ,शामी जी हमर बाप महतारी हो।”

भोजली गीत-भोजली पर्व पर भोजली विसर्जन करते समय यह गीत गाया जाता है।

“ओ देवी गंगा,लहर तुरंगा ये
भोजली दाई के दिखे आठव अंगा।”

छेरछेरा गीत-पौष मांघ पूर्णिमा को मनाया जाता है,इस अवसर पर बच्चे नई फसल आने पर घर-घर दस्तक देते और धान मागंते हुए गीत गाते हैं

“छेर-छेरा छेर-छेरा
कोठी के धान ल हेरत ए हेरा”

नृत्य गीत

भारत गांवों का देश है और इन गावों में रहने वाले हमारे पूर्वजों द्वारा मनोरंजन और विभिन्न देवी देवताओं को खुश करने के लिए कई प्रकार के नृत्य किया जाता था ,ये नृत्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा।आज भी गांवो में इनमें से कुछ नृत्यों को मनोरंजन तो कुछ नृत्यों को अनुष्ठान आदि के नाम पर आयोजित किया जाता है।इन नृत्यों को लोक नृत्य कहा जाता है।

1.सुआ नृत्य-यह नृत्य मुख्यतः आदिवासी स्त्रियों का नृत्य है,इस नृत्य को महिलाओं और लड़कियों द्वारा समूह में गोल गोल घूमकर गीत गा गाकर किया जाता है।बीच मे मिट्टी का तोता चावल से भरे टोकरी में रखा जाता है साथ ही दिये जलाकर भी रखा जाता है|इस नृत्य को खरीफ के तैयार होने की ख़ुशी में घर घर जा जाकर किया जाता है।सुआ नृत्य छ. ग.के सभी क्षेत्र में किया जाता है।

सुवा गीत- तरीहरी नाना मोर नाहरी नाना रे सुवा मोर ,
तरीहरी ना मोरे ना।
ए दे ना रे सुवा मोर तरीहरी ना मोरे ना ।

1.कोन सुवा बइठे मोर आमा के डारा म ,कोन सुवा उड़त हे अगास,ना रे सुवा मोर कोन सुवा उड़त हे अगास।2
हरियर सुवा बइठे मोर आमा के डारा म,पिवरा सुवा उड़त हे अगास, ना रे सुवा मोर पिवरा सुवा उड़त हे अगास।।2
ए अगास ए सुवा रे मोर,तरीहरी ना मोरे ना…
ए दे ना रे सुवा मोर ,तरीहरी ना मोरे ना।

2.कोन सुवा लावत हे मोर पिया के सन्देशिया,कोन सुवा करत हे मोर बाच, ना रे सुवा मोर कोन सुवा करत हे मोर बाच।2
हरियर सुवा लावत हे मोर पिया के सन्देशिया,पिवरा सुवा करत हे मोर बाच,ना रे सुवा मोर पिवरा सुवा करत हे मोर बाच।2
ए दे बाच ए सुवा रे मोर,तरिहरी ना मोरे ना….
ए दे ना रे सुवा रे मोर,तरिहरी ना मोरे ना।

2.राउत नाचा- यादव जाति के लोगों द्वारा यह नृत्य किया जाता है ।इस नृत्य में वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है ।सभी एक ही प्रकार के वेषभूषा धारण किये रहते है। यह समूह में किये जाने वाला नृत्य है।समूह में दो या तीन व्यक्ति महिला का वेशभूषा धारण किये रहता है जिसे परी कहा जाता है।नाचने वाले अपने सर पर पगड़ी धारण किये रहते हैं और हाथ मे डंडा या हथियार पकड़े रहते हैं।कई समूह एक ही स्थान पर इकट्ठे होते है और उस स्थान पर बड़े-बड़े लकड़ी के खम्भे के चारो ओर घूम घूम कर दोहा कहते और नाचते हैं।यह कार्तिक नृत्यमाह के प्रबोधनी एकादशी से प्रारम्भ होता है। यह शौर्य नृत्य है।राउत नाच पुरुषों द्वारा किया जाता है।

दोहा-राम नगरिया राम के बसे गंगा के तीर हो।
तुलसी दास चन्दन घिसय तिलक लेत रघुबीर हो।।

3.पंथी – पंथी नृत्य छ. ग.के सतनामी जाति के लोगो द्वारा किया जाने वाला नृत्य है ।यह नृत्य दिसम्बर माह के 18 तारीख से शुरू होता है यह एक समूह नृत्य है।जिसमें वाद्य यंत्र बजाने वाले और नाचने वाले को मिलाकर 15 से 25 या अधिक सदस्य हो सकते हैं।यह नृत्य बाबा गुरु घासीदास के जन्म उत्सव के रूप में शुरू हुआ था।

पंथी नृत्य दो प्रकार का होता है –

1.बैठ पार्टी- इस नृत्य में वाद्य यंत्र बजाने वाले बैठ कर वाद्य यंत्रों को बजाते हैं।नाचने वाले इनके चारोओर घूमते हुए नृत्य करते हैं ।इस नृत्य में करतब नही दिखाया जाता है।बैठ पार्टी में दो व्यक्ति गाने वाले होते हैं जिसमे एक गाता है दूसरा दुहराता है इन्हें क्रमशः पंडित और रागी कहा जाता है।

2.खड़ी पार्टी-खड़ी पार्टी में वादक खड़े होकर नाचते हुए वाद्य यंत्रों को बजाते हैं।खड़ी पार्टी वाले में एक व्यक्ति नाचते हुए गाता है बाकी उसे दुहराते हैं।खड़ी पार्टी में करतब दिखाया जाता है।

पंथी गीत-
जाएके बेरा काम आहि जी… ,ए जाएके बेरा काम आहि न 2।
तै तो हिरदे म सुमरले सतनाम , जाएके बेरा काम आहि न ।
एक झन साथी तोर घर कर नारी… घर कर नारी…,
मरे के बेरा ओह दूसरे बनाही… दूसरे बनाही…….।
घर कर नारी …घर कर नारी……,
दूसरे बनाही ….दूसरे बनाही…..
तै तो हिरदे म सुमरले सतनाम ,जाएके बेरा आहि न।

4.कर्मा नृत्य- कर्मा नृत्य छत्तीसगढ़ का प्रमुख जनजातीय नृत्य है । पूरे छत्तीसगढ़ में करमा नृत्य का अपना अलग पहचान है ।करमा नृत्य में महिला और पुरुष दोनो सामूहिक रुप में नृत्य करते है ।बीच मे कदम के डाली को गड़ाया जाता है और उसके चारों ओर नृत्य किया जाता है।यह बारिश शुरू होने के साथ शुरू होता है और फसल काटने तक चलता है ।इस नृत्य के कई भाग है जैसे करम डाल का स्वागत ,लाना ,गड़ाना फिर विसर्जन आदि ।

करमा नृत्य के साथ जो गाने गाए जाते हैं वह बड़ा ही मनमोहक होता है।यह मुख्य रूप से गोंड़ और बैगा जनजाति में ज्यादा प्रचलित है जिसमे कर्म देवता की आराधना किया जाता है।

करमा नृत्य के साथ गाए जाने वाले गीत-

करमा होवथे हमर पारा म ,करमा नाचे ल आबे ओ।

5.ददरिया गीत नृत्य-ददरिया गीत नृत्य छत्तीसगढ़ के समस्त मैदानी क्षेत्रों के किया जाता है ददरिया के कई बड़े बड़े लोक कलाकार हुए है जैसे कुलेश्वर ताम्रकार ,झड़ी राम देवांगन, कविता वासनिक, आदि ।

ददरिया नृत्य लोगो के मनोरंजन के लिए आयोजित किये जाते हैं ।इस मे एक गायक और एक गायिका होती है ।वादक और नृत्य करने वाले सभी को मिलाकर 30 से 40 तक की संख्या हो सकती है ।यह नृत्य प्रेम ,आकर्षण ,के भाव पर आधारित होता है ।

गीत- जहुरिया ल कै गोटी मारौं भाजी फूल,मोर चढ़ती जवानी के दिन वो जहुरिया ल कै गोटी मारौं।

6.गौर नृत्य-बस्तर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र के माड़िया जनजाति द्वारा जात्रा नामक त्यौहार के अवसर पर जंगली भैंसों के सींघो को पहन कर नृत्य किया जाता है ।इस नृत्य के कारण माड़िया जनजाति का अपना अलग ही पहचान है ।ईस नृत्य में महिला और पुरुष दोनों साथ साथ नृत्य करते हैं।महिलाएं आभूषण धारण किये रहती हैं साथ ही सभी एक ही रंग के वस्त्र धारण किये रहतीं हैं।पुरुष वाद्ययन्त्र के साथ सर पर गौर का सींघ धारण किये रहते है और गोलाकार रूप में नृत्य करते हैं।गौर जानवर के सींघ धारण करने के कारण इस नृत्य का नाम गौर नृत्य पड़ा।

7 गेड़ी नृत्य- गेड़ी नृत्य बस्तर जिले की मुड़िया जनजाति का नृत्य है जिनमे नृत्य करने वाले एक ही प्रकार के वेशभूषा धारण कर गेड़ी (लकड़ी का दो डंडा होता है जिसके मध्य भाग में खाँचा बनाकर बांस के टुकड़े से पैर रखने का बनाया जाता है )पर खड़े होकर नृत्य किया जाता है ।गेड़ी नृत्य के कारण मुड़िया जनजाति का अपना अलग पहचान है।

दशहरा नृत्य-यह बैगा आदिवासियों का आदि नृत्य है विजयदशमी से प्रारंभ होने के कारण इस नृत्य का नाम दशहरा नृत्य पड़ा। दशहरा नृत्य सैला नृत्य की भलीभांति सरल है।इस नृत्य को अन्य जनजातियों नीतियों का द्वार भी कहा जाता है।

सैला नृत्य- सैल का अर्थ होता है डंडा,सैल शिखरों पर रहने वाले लोगों के द्वारा किए जाने के कारण इस नृत्य का नाम सैला नृत्य पड़ा। यह नृत्य दशहरे में आरंभ होकर पूरे शरद ऋतु की रातों तक चलता है अपने सपने आदि देव को प्रसन्न करने के लिए सैला नृत्य का आयोजन करते हैं।
सैला नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है इसमें नर्तक हाथों में डंडा लेकर नृत्य करते हैं इस अवसर पर दोहे भी बोले जाते हैं इसे डंडा नाच भी कहा जाता है।मांदर इस नृत्य का प्रमुख वाद्ययंत्र है।सैला नृत्य में भी क्षेत्रीय विविधता और भिन्नता पाई जाती है|जैसे-बैठकी सैला,आरती सैला,शिकारी सैल,ढाढ़ी सैला इसके कुछ प्रकार है ।

सरगुल नृत्य- उरांव जनजाति का अनुष्ठान नृत्य उरांव सरना नामक देवी का निवास साल( सरई) वृक्ष में मानते हैं और प्रति वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा पर साल वृक्ष की पूजा का आयोजन करते हैं और वृक्ष के आसपास नृत्य करते हैं यह एक समूह नृत्य है इसमें उराव युवक-युवती हिस्सा लेते हैं इस नृत्य का प्रमुख वाद्य यंत्र मांदर और झांझ है ।

आहारी नृत्य-बुंदेलखंड के भूमिया बैगाओं का नृत्य है इसमें एक पुरुष के कंधे पर दो आदमी आरूढ़(खड़े) होते हैं एक व्यक्ति ताली बजाते हुए भीतर बाहर आना जाना रहता है। वादव पार्श्व में रहते हैं।

चंदैनी नृत्य- चंदैनी मूलतः प्रेमगाथा है इसे पुरुष पात्र विशेष वेशभूषा में नृत्य के साथ चंदैनी कथा के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

गेड़ी नृत्य- घोटुल की मोरिया युवक लकड़ी की गेड़ी पर खड़े होकर अत्यंत तीव्र गति से नृत्य करते हैं जिसे गेड़ी नृत्य कहा जाता है।इस नृत्य में केवल पुरुष शामिल होते हैं नित्य के माध्यम से शारीरिक कौशल और संतुलन का प्रदर्शन किया जाता है।

एबालतोर नृत्य- मड़ाई के अवसर पर मुड़िया घोटूल के सदस्यों द्वारा किया जाने वाला नृत्य एबालतोर नृत्य कहलाता है ।

ककसार नृत्य- यह बस्तर की अबूझमाड़िया जनजाति का प्रमुख नृत्य है मुड़िया गांव में वर्ष में एक बार ककसार पूजा का आयोजन किया जाता है जिसमें मुरिया जनजाति के लोग लिंग देव को प्रसन्न करने के लिए रात भर नृत्य करते हैं।

मांदरी नृत्य- मुड़िया जनजाति का यह नित्य है घोटूल के प्रमुख नृत्यों में से एक है यह युवक और युवतियों द्वारा किया जाता है दोनों पृथक पृथक पंक्तियों में पृथक पृथक गोला या अर्ध गोला बनाकर नृत्य करते हैं यह नृत्य मुख्यतः करताल पर किया जाता है इसमें कोई वाद्ययंत्र नहीं बजता।गीत नहीं गाया जाता है सिर्फ चिटकुल बजाया जाता है।

दमनच नृत्य –पहाड़ी कोरवों में यह नृत्य विवाह के अवसर पर रात भर किया जाता है इसमें सभी उम्र के स्त्री-पुरुष भाग लेते हैं यह नृत्य मृदुगली ताल पर किया जाता है।

हुलकीपाटा नृत्य- मुड़िया जनजातियों का प्रसिद्ध नृत्य है युवक-युवतियों को इस नृत्य का प्रशिक्षण घोटूल में प्राप्त होता है यह नृत्य कभी भी मेले, विवाह या किसी अन्य अवसर पर किया जाता है।

छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य-

संभवतः प्रारंभिक मानव के आदिम नृत्य में नाटक की उत्पत्ति हुई है आदिम जातियों से प्रेरित होकर लोकनाट्य की संरचना हुई।इससे लोकनाट्य में आदिम जीवन में अनेक तत्व समाहित होते हैं।नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरमुनि जी ने अपने ग्रंथ में लोक नृत्यों का जिक्र किया है।पारंपरिक संगीत नृत्य अभिनय एवं कथनन मिलकर लोकनाट्य का सृजन करते हैं लोकनाट्य लोग जीवन का संपूर्ण प्रतिबिंब है आसपास घटित होने वाली घटना लोकनाट्य का विषय होती है यह सामाजिक अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा साधन है।

लोकनाट्य लोक मंच की संरचना अत्यंत सरल होती है

लोकनाट्य कर्म में एक सामूहिक सहभागिता है जिसमें पूरा गांव सक्रिय भागीदारी देता है।

लोकनाट्य में स्त्री का पात्र प्रायः पुरुष ही निभाते हैं।

आंचलिक रूढ़ियां लोकनाट्य की मौलिक पहचान बनाती है।

हर अंचल के पारंपरिक लोक नाट्य की अपनी नीति शैली निश्चित स्वरूप एवं उद्देश्य होता है ।

लोकनाट्य प्रायः किसी अनुष्ठान एवं पर्व से जुड़े हुए होते हैं।

लोकनाट्यों की भाषा एवं विषय सामयिक होते हैं।

लोकनाट्यों का मूल उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ समाज की अच्छाई और बुराई की नब्ज पर हाथ रखना होता है।

पंडवानी-

महाभारत के पांडवों की कथा का छत्तीसगढ़ी लोक स्वरूप पंडवानी है पंडवानी का मूल आधार प्रधान और देवारों की पंडवानी गायकी महाभारत की कथा और संबल सिंह चौहान की दोहा चौपाई महाभारत है।इसमें मुख्य नायक भीम है। पंडवानी के लिए किसी विशेष अवसर ही पूजा अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती पंडवानी में एक मुख्य गायक, एक हुंकारी भरने वाला रागी तथा वाद्य पर संगत करने वाले लोग होते हैं जो आमतौर पर तबला, ढोलक ,हारमोनियम और मंजीरा के संगत करते हैं ।मुख्य गायक स्वयं तंबूरा एवं करताल बजाता है

पंडवानी की दो शाखाएं हैं-

1 वेदमती
2 कापालिक

कापालिक शैली में तथा गायक गायिका के स्तुति में या कपाल में विद्यमान होती है। कापालिक शैली वाचक परंपरा पर आधारित है कापालिक शैली की प्रमुख गायक है- तीजनबाई ,शांतिबाई चेलक उषा बाई बारले।

वेदमती में शास्त्र संबंध गायकी की जाती है वेदमती सैली का आधार शास्त्र अर्थात खड़ी भाषा में संबल सिंह चौहान की महाभारत को पयय रूप में है।वेदमती सैली के गायक वीरासन बैठकर पंडवानी गायन करते हैं।झाड़ू राम निषाद, पुनाराम निषाद, पंचू राम, रेवाराम वेदमती शैली के कलाकार है। झाड़ू राम देवांगन महाभारत के शांति पर्व का प्रस्तुत करने वाला सर्वश्रेष्ठ कलाकार है इसके अलावा कई नाम है जैसे दांनी प्रधान, राम जी देवार, रीतू वर्मा आदि।

दहीकांगो-छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्र में आदिवासी कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दही कांगो नामक नृत्य नाटिका प्रदर्शन करते हैं यह कर्मा और रास का मिलाजुला स्वरूप है इसमें कदम या किसी वृक्ष के नीचे राधा कृष्ण की मूर्ति स्थापित कर इसकी चारों और नृत्य करते हुए कृष्ण लीला का अभिनय होता है।कृष्ण के सखा का पात्र इसमें विदूषक का होता है जो दही से भरा मटका फोड़ता है।

फ़िल्म जगत

किशोर साहू-निर्देशक,अभिनेता,पटकथा लेखक,कहानीकार, चित्रकार जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे किशोर साहू।

जिन्होंने छत्तीसगढ़ की भूमि में जन्म लिया और हिंदी सिनेमा जगत को सशक्त बनाया किशोर साहू एक कुशल निर्देशक रहे सन 1936 में उन्होंने हिंदी सिनेमा में छत्तीसगढ़ संवाद का प्रयोग किया फिल्म नदिया के पार में उन्होंने दिलीप कुमार और कामिनी कौशल से अभिनय करवाया इस फिल्म के संवाद अभिनेत्री के लिए छत्तीसगढ़ी में लिखे गए थे हाल ही में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने किशोर साहू के नाम पर किशोर साहू अलंकरण सम्मान प्रारंभ किया है राष्ट्रीय स्तर पर दिया जाने वाला सम्मान है।

कांतिलाल राठौर- कांतिलाल जी का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ है उनके द्वारा निर्मित गुजराती फिल्म कुंकु क्षेत्रीय भाषा के सर्वश्रेष्ठ होने का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

सत्यदेव दुबे-बिलासपुर के पद्मभूषण प्रख्यात रंगकर्मी फिल्म निर्माता संवाद एवं पटकथा लेखक श्याम बेनेवाल और गोविंद निहलानी की अनेक फिल्मों में जैसे अंकुर,निशांत,भूमिका,कलयुग,आक्रोष,विजेता और मंडी के लिए संवाद लेखन और भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त किया।जुनून फिल्म के संवाद लेखन के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड प्राप्त हुआ।

डॉ. शंकर शेष-बिलासपुर में इनका जन्म हुआ इनकी दो कहानियां क्रमशः घरौंदा और दूरियां इन पर फिल्म बनी इन फिल्मों को पुरस्कार भी मिले।

अशोक मिश्रा- इनका जन्म रायपुर में हुआ मूलतः संवाद लेखक के रूप में उन्होंने अपनी विशेष पहचान बनाई धारावाहिक ” भारत एक खोज” में पटकथा लेखन किया। सन् 1995 में फिल्म नसीम के लिए श्रेष्ठ पटकथा लेखक का सम्मान प्राप्त किया।वर्ष 2000 में फिल्म समर के लिए इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया।

नत्थू दादा रामटेके- इनका जन्म राजनंदगांव में हुआ इनका कद था दो फिट इन्हें अभिनय में रुचि थी अभिनेता के रूप में राज कपूर जी के साथ बहुत सारी फिल्मों में काम किया।

भैया लाल हेड़ाऊ- यह मुख्यतः रंगकर्मी थे इनका जन्म राजनंदगांव में हुआ उन्होंने प्रसिद्ध सीने निर्देशक सत्यजीत रे की टेली फिल्म सदगति में अभिनय किया।

ओमकार दास मानिकपुरी-इनका जन्म दुर्ग जिले में हुआ इन्होंने प्रसिद्ध निर्देशक आमिर खान की फिल्म पीपली लाइफ में नत्था का मुख्य किरदार निभाया और ख्याति पाई।

अनुज शर्मा-छत्तीसगढ़ फिल्मों के अभिनेता के रूप में उन्होंने विशेष ख्याति अर्जित की है मुख्यतः लोक कलाकार के रूप में ख्याति प्राप्त करने के बाद वर्ष 2014 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।

अनुराग बसु- हिंदी सीने निर्देशक के रूप में अनुराग बसु ने छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किया है।यह मुख्यतः भिलाई से हैं।इसके द्वारा निर्देशित फिल्म बर्फी, मर्डर, साया,कुछ तो है,गैंगस्टर कार्ड्स,तुम सा नहीं देखा कुछ प्रमुख फ़िल्म है।
हाल ही में कुछ टेलीविजन शो में जज की भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं उन्होंने इंडियन बेस्ट ड्रामेबाज कार्यक्रम में जज के रूप में भी काफी प्रसिद्धि प्राप्त की।

जनजाति

गोंड़- छत्तीसगढ़ की जनजातियों में गोंड़ सबसे बड़ी जनजाति है गोंड़ शब्द की उत्पत्ति कुड शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है पर्वत और स्वयं को कोंटुतोर कहते हैं जिसका अर्थ होता है पर्वतवासी मनुष्य गोंड़ छत्तीसगढ़ के मुख्य का दक्षिण भाग में निवास करते हैं इसके अलावा राज्य के विभिन्न क्षेत्र में भी यह जनजाति पाई जाती है और यह जनजाति के लोग ज्यादातर कमर के नीचे वस्त्र धारण करते हैं इसके में आभूषण एवं गोदना का अधिक प्रचलन है पीतल,मोती, मूंगा के आभूषण ज्यादातर इस्तेमाल किए जाते हैं। गोंड़ समाज पितृवंशिय, पितृसत्तापक वाला होता है।गोंड़ जनजाति एक विवाहिय है लेकिन बहु विवाह को भी मान्यता है।गोंड़ जनजाति में ममेरे, फुफेरे,बहनों,भाई- बहनों में विवाह अधिमान्य है।जिसे “दूध लवटावा” कहते है।गोंडों में

विधवा विवाह एवं वधु मूल्य भी प्रचलित है इस जनजाति में चढ़ पथौनी और लमसेना विवाह के स्वरूप है गोंड़ जनजाति में चेचक या कुष्ठ रोग से मृत्यु होने पर मृतक का सिर दक्षिण दिशा की ओर रखकर दफनाया जाता है।मृतक संस्कार में गोंड़ तीसरे दिन कोज्जी बनाते हैं तथा दसवें दिन कुंडा मिलान संस्कार होता है। गोंडों में अतिथि को विशेष सम्मान दिया जाता है इस जनजाति के लोग अपने मकान के अतिथि के लिए अलग से एक कमरा बनाते हैं जो काफी साफ सुथरा होता है गोंड़ मुख्यतः आफेटन, पशुपालन एवं कृषि उत्पादक पर निर्भर थे।किंतु वर्तमान में वे स्थायी पेशा करने लगे हैं ।इसके अतिरिक्त लघु वनोपज संग्रह, पशु पालन, मुर्गी पालन,मजदूरी इनकी आजीविका के साधन है।बूढ़ादेव इनके प्रमुख देवता है। बूढ़ादेव,सूरजदेव, नारायण देव आदि देवता भी महत्तपूर्ण है । बस्तर क्षेत्र में मां दंतेश्वरी प्रमुख देवी है।गोंडों के पर्व में नवाखानी,बिदरी,ज्वार,मड़ाई, छेरटा, लाहुकांज़ आदि प्रमुख है।गोंडों की मुख्य बोली गोंडी है ।

उरांव- उरांव के प्रमुख द्रविण जनजाति है ।इन्हें धनकर या धनगढ़ भी कहा जाता है ।उरांव गोत्र समाज है मिंज,तिग्गा, लंगड़ा आदि परंपरागत गोत्र है ।

उरांव रायगढ़,जशपुर,कोरिया, सरगुजा ,लरामपुर,सूरजपुर जिला में निवास करते हैं इस जनजाति की खासियत है कि यह साफ सफाई पर विशेष ध्यान देते हैं उरांव जनजाति के पुरुष धोती, बांडी और लंबी पूंछ वाला साफा पहनते है स्त्रियां साड़ी पहनती है स्त्रियों में पीतल के आभूषण और मोतियों से बनी हुई माला अत्यधिक लोकप्रिय है इस जनजाति की महिलाएं शरीर पर कलात्मक गोदना गोदवाती है।इस जनजाति में जो गांव का प्रमुख होता है वह मांझी कहलाता है अनेक गांवों से परहार इकाई बनाई जाती है।जिसका प्रमुख परहार राजा विभिन्न प्रकार के मामलों को सुलझाता है और विवादों पर फैसला देता है उराव जनजाति धर्मा नामक इष्ट की आराधना करते हैं। त्योहारों में व्रत पूजा की परंपरा है इनके प्रमुख अनुष्ठान सरना पूजा, कुलदेव पूजा एवं कर्मा पूजा है। उरांव जनजाति में शिक्षा का स्तर काफी अच्छा है इनकी बोली कुरुख है।

बैगा- यह त्रविण वर्ग की जनजाति है बैगा का शाब्दिक अर्थ होता है पुरोहित इन्हें पंडा भी कहा जाता है।बैगा गोंड के परंपरागत पुरोहित है ये नागा बाबा को अपना पूर्वज मानते हैं छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बैगा जनजाति को विशेष पिछड़ी अनुसूचित जाति का दर्जा प्रदान किया गया है।बैगा कवर्धा, बिलासपुर, मुंगेली जिले में निवास करते हैं स्त्रियों में आभूषण एवं गोदना का अत्यधिक प्रचलन है इस जनजाति में परंपरागत रूप से तैयार मदिरा एवं पेज का इसके सामाजिक जीवन में विशिष्ट स्थान है।बैगा लोगों को मानना है कि खेतों में हल जोतने से धरती मां को कष्ट होता है अतः स्थानांतरित कृषि करते हैं जिसे बेवा कहा जाता है यह जनजाति शिकार करने की विशेष शौकीन होती है।इस जनजाति के लोगों को वनाओषधियों का विशेष ज्ञान होता है।ये ओझा का कार्य भी करते हैं बैगा जनजाति के प्रमुख देवता बूढ़ादेव है इनकी मान्यता है कि यह साल के वृक्ष पर निवास करते हैं अतः यह साल वृक्ष की पूजा करते हैं भूमि की रक्षा के लिए बैगा ठाकुर देव एवं बीमारियों की रक्षा के लिए बुढ़ा देव की पूजा करते हैं।यह जनजाति नृत्य में कुशल होती है।कर्मा इनका सर्वप्रमुख नृत्य है।

कवार- यह शासन द्वारा घोषित एक विशेष पिछड़ी जनजाति है यह एक गोड़ों की उपजाति है यह जनजाति मुख्यतः गरियाबंद जिले में तथा आंशिक रूप से धमतरी जिले में निवास करती है क्षेत्रीय आधार पर कमार दो समूहों में विभाजित है पहला पहाड़ी पर रहने वाला पहाड़पाटिया दूसरा मैदान में रहने वाला बंध रिजिया कमार बस्ती से अलग जंगल में नदी के तट पर रहते हैं।इनके घर बांस, लकड़ी,घास, मिट्टी आदि से बने होते हैं घर में किसी की मृत्यु होने पर पुराने घर को तोड़कर नया घर बनाते हैं।कमार पंतवंशीय होते हैं इनमें विवाह माता पिता द्वारा तय होता है। संगोत्री विवाह वर्जित है।विवाह विच्छेद,विधवा विवाह मान्य है कमार अधिकांशतः भूमिहीन होते हैं वे शिकार और खाद्य संग्रह द्वारा जीवन निर्वाह कहते हैं वह जंगल में जड़ी बूटी बीनने का काम भी करते हैं कमार बांस के सुंदर समान बनाने के लिए जाने जाते हैं इनके जीवन यापन का प्रमुख स्रोत बांस शिल्प भी है यह स्थानांतरित खेती करते हैं जिसे दाहि या दईया कहा जाता है।

कोरवा-भारत की एक प्रमुख जनजाति है जो छोटा नागपुर की पहाड़ियों एवं वनों में, छत्तीसगढ़ एवं झारखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करते हैं। वे सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछडे हुए हैं। कुछ कोरवा लोग उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में भी पाये जाते हैं।

छत्तीसगढ़ के मेला-मड़ई

विविध मेलों का क्रम –

*अगहन माह – बड़े भजन रामनामी मेला (रायपुर – बिलासपुर संभाग)
*पौष माह के विभिन्न मेले
*क्वांर और चैत्र मास के विभिन्न मेले
*माघ मास के विभिन्न मेले
*तिहार-बार मेला
*राजिम मेला –
*बस्तर के मड़ई मेले

विविधतापूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य में विभिन्न स्वरूप के मेलों का लंबा सिलसिला है, इनमें मुख्यतः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र यानि जशपुर-रायगढ़ अंचल में जतरा अथवा रामरेखा, रायगढ़-सारंगढ़ का विष्णु यज्ञ- हरिहाट, चइत-राई और व्यापारिक मेला, कटघोरा-कोरबा अंचल का बार, दक्षिणी क्षेत्र यानि बस्तर के जिलों में मड़ई और अन्य हिस्सों में बजार, मातर और मेला जैसे जुड़ाव अपनी बहुरंगी छटा के साथ राज्य की सांस्कृतिक सम्पन्नता के जीवन्त उत्सव हैं। मेला ‘होता’ तो है ही, ‘लगता’, ‘भरता’ और ‘बैठता’ भी है।

विविध मेलों का क्रम –

अगहन माह – बड़े भजन रामनामी मेला (रायपुर – बिलासपुर संभाग)

गीता का उद्धरण है- ‘मासानां मार्गशीर्षोऽहं …’, अगहन को माहों में श्रेष्ठ कहा गया है और यह व्याख्या सटीक जान पड़ती है कि खरीफ क्षेत्र में अगहन लगते, घर-घर में धन-धान्य के साथ गुरुवार लक्ष्मी-पूजा की तैयारी होने लगती है, जहां लक्ष्मी वहां विष्णु। इसी के साथ मेलों की गिनती का आरंभ, अंचल की परम्परा के अनुरूप, प्रथम के पर्याय- ‘राम’ अर्थात्, रामनामियों के बड़े भजन से किया जा सकता है, जिसमें पूस सुदी ग्यारस को अनुष्ठान सहित चबूतरा और ध्वजारोहण की तैयारियां होती हैं, द्वादशी को झंडा चढ़ाने के साथ ही मेला औपचारिक रूप से उद्घाटित माना जाता है, तीसरे दिन त्रयोदशी को भण्डारा होता है, इस हेतु दो बड़े गड्ढे खोदे जाते, जिन्हें अच्छी तरह गोबर से लीप-सुखा कर भंडारण योग्य बना लिया जाता। भक्तों द्वारा चढ़ाए और इकट्ठा किए गए चावल व दाल को पका कर अलग-अलग इन गड्ढों में भरा जाता, जिसमें मक्खियां नहीं लगतीं। यही प्रसाद रमरमिहा अनुयायियों एवं अन्य श्रद्धालुओं में वितरित होता। संपूर्ण मेला क्षेत्र में जगह-जगह रामायण पाठ होता रहता है। नख-शिख ‘रामराम’ गोदना वाले, मोरपंख मुकुटधारी, रामनामी चादर ओढ़े रमरमिहा स्त्री-पुरूष मेले के दृश्य और माहौल को राममय बना देते हैं।

मेले में परिवेश की सघनता इतनी असरकारक होती है कि यहां प्रत्येक व्यक्ति, समष्टि हो जाता है। सदी पूरी कर चुका यह मेला महानदी के दाहिने और बायें तट पर, प्रतिवर्ष अलग-अलग गांवों में समानांतर भरता है। कुछ वर्षों में बारी-बारी से दाहिने और बायें तट पर मेले का संयुक्त आयोजन भी हुआ है। मेले के पूर्व बिलासपुर-रायपुर संभाग के रामनामी बहुल क्षेत्र से गुजरने वाली भव्य शोभा यात्रा का आयोजन भी किया गया है। इस मेले और समूह की विशिष्टता ने देशी-विदेशी अध्येताओं, मीडिया प्रतिनिधियों और फिल्मकारों को भी आकर्षित किया है।

पौष माह के विभिन्न मेले

रामनामी बड़े भजन के बाद तिथि क्रम में पौष पूर्णिमा अर्थात् छेरछेरा पर्व पर तुरतुरिया, सगनी घाट (अहिवारा), चरौदा (धरसीवां) और गोर्रइया (मांढर) का मेला भरता है। इसी तिथि पर अमोरा (तखतपुर), रामपुर, रनबोर (बलौदाबाजार) का मेला होता है, यह समय रउताही बाजारों के समापन और मेलों के क्रम के आरंभ का होता है, जो चैत मास तक चलता है। जांजगीर अंचल की प्रसिद्ध रउताही मड़ई हरदी बजार, खम्हरिया, बलौदा, बम्हनिन, पामगढ़, रहौद, खरखोद, ससहा है। क्रमशः भक्तिन (अकलतरा), बाराद्वार, कोटमी, धुरकोट, ठठारी की रउताही का समापन सक्ती के विशाल रउताही से माना जाता है। बेरला (बेमेतरा) का विशाल मेला भी पौष माह में (जनवरी में शनिवार को) भरता है। ‘मधुमास पुनीता’ होते हुए ‘…ऋतूनां कुसुमाकरः’, वसंत ऋतु-रबी फसल तक चलने वाले मेलों के मुख्य सिलसिले का समापन चइत-राई से होता है, सरसींवां और भटगांव के चैत नवरात्रि से वैशाख माह के आरंभ तक चलने वाले चइत-राई मेले पुराने और बड़े मेले हैं। सपोस (चंदरपुर) का चइत-राई भी उल्लेखनीय है। चइत-राई का चलन बस्तर में भी है।

रामराम मेला

सिद्धमुनि आश्रम, बेलगहना में साल में दो बार-शरद पूर्णिमा और बसंत पंचमी को मेला भरता है।शरद पूर्णिमा पर ही बरमकेला के पास तौसीर में मेला भरता है, जिसमें अमृत खीर प्रसाद, शरद पूर्णिमा की आधी रात से सूर्योदय तक बंटता है। मान्यता है कि जो तीन साल लगातार यह प्रसाद खाता है वह आजीवन रोगमुक्त रहता है। यह उड़िया-छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मेल-जोल का मेला है। कुदरगढ़ और रामगढ़, उदयपुर (सरगुजा) में रामनवमी पर बड़ा मेला भरता है।शंकरगढ़ का घिर्रा मेला पूस सुदी नवमी को होता है, जिसमें विभिन्न ग्रामों के रंग-बिरंगे ध्वजों के साथ ‘ख्याला’ मांगने की परम्परा है। लाठी और ढाल लेकर नृत्य तथा ‘कटमुंहा’ मुखौटेधारी भी आकर्षण के केन्द्र होते हैं। सरगुजा का ‘जतरा’ यानि घूम-घूम कर लगने वाला मेला अगहन मास के आरंभ से उमको होता हुआ सामरी, कुसमी, डीपाडीह, भुलसी, दुर्गापुर होकर शंकरगढ़ में सम्पन्न होता है। कुंवर अछरिया (सिंघनगढ़, साजा) और खल्लारी का मेला चैत पूर्णिमा पर भरता है।

भौगोलिक दृष्टि से उत्तरी क्षेत्र में सरगुजा-कोरिया अंचल के पटना, बैकुण्ठपुर, चिरमिरी आदि कई स्थानों में गंगा दशहरा के अवसर पर मेला भरता है तो पुराने रजवाड़े नगरों में, विशेषकर जगदलपुर में गोंचा-दशहरा का मेला प्रमुख है, किन्तु खैरागढ़ के अलावा खंडुआ (सिमगा), ओड़ेकेरा और जैजैपुर में भी दशहरा के अवसर पर विशाल मेला भरता है और भण्डारपुरी में दशहरा के अगले दिन मेला भरता है। सारंगढ़ अंचल के अनेक स्थलों में विष्णु यज्ञों का आयोजन होता है और यह मेले का स्वरूप ले लेता है, जिन्हें हरिहाट मेला कहा जाता है और मकर संक्रांति पर जसपुर कछार (कोसीर), सहजपाली और पोरथ में मेला लगता है। मकर संक्रांति पर एक विशिष्ट परम्परा घुन्डइया मेला, महानदी में बघनई और सूखा नाला के संगम की त्रिवेणी के पास हथखोज (महासमुंद) में प्रचलित है। यहां भक्त स्त्री-पुरुष मनौती ले कर महानदी की रेत पर लेट जाते हैं और बेलन की तरह लोटने लगते हैं फिर रेत का शिवलिंग बना कर उसकी पूजा करते हैं। संकल्प सहित इस पूरे अनुष्ठान को ‘सूखा लहरा’ लेना कहा जाता है।

क्वांर और चैत्र मास के विभिन्न मेले

क्वांर और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवरात्रियों पर भी मेला भरने का चलन पिछले सालों में बढ़ा है, इनमें झलमला (बालोद) में दोनों नवरात्रि पर बड़े मेले भरते हैं और रतनपुर में इस अवसर पर प्रज्ज्वलित होने वाले ज्योति कलशों की संख्या दस हजार पार कर जाती है। अकलतरा के निकट दलहा पहाड़ पर नागपंचमी का मेला होता है, जिसमें पहाड़ पर चढ़ने की प्रथा है। विगत वर्षों में कांवड़िया श्रद्धालुओं द्वारा सावन सोमवार पर शिव मंदिरों में जल चढ़ाने की प्रथा भी तेजी से बढ़ी है। पारम्परिक तिथि-पर्वों से हटकर सर्वाधिक उल्लेखनीय कटघोरा का मेला है, जो प्रतिवर्ष राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर 26 जनवरी को नियत है। रामकोठी के लिए प्रसिद्ध तेलीगुंडरा, पाटन में भी इसी अवसर पर मेला होता है।

माघ मास के विभिन्न मेले

आमतौर पर फरवरी माह में पड़ने वाला दुर्ग का हजरत बाबा अब्दुल रहमान शाह का उर्स, राजनांदगांव का सैयद बाबा अटल शाह का उर्स, लुतरा शरीफ (सीपत), सोनपुर (अंबिकापुर) और सारंगढ़ के उर्स का स्वरूप मेलों की तरह होता है। रायगढ़ अंचल में पिछली सदी के जनजातीय धार्मिक प्रमुख और समाज सुधारक गहिरा गुरु के मेले चिखली, सूरजगढ़, रेंगापाली, लेंध्रा, बरमकेला आदि कई स्थानों पर भरते हैं, इनमें सबसे बड़ा माघ सुदी 11 को ग्राम गहिरा (घरघोड़ा) में भरने वाला मेला है। इसी प्रकार कुदुरमाल (कोरबा), दामाखेड़ा (सिमगा) में माघ पूर्णिमा पर कबीरपंथी विशाल मेले आयाजित होते हैं तथा ऐसे कई अन्य कबीरपंथी जुड़ाव-भण्डारा सरगुजा अंचल में होते रहते हैं। दामाखेड़ा, कबीरपंथियों की महत्वपूर्ण गद्दी है, जबकि कुदुरमाल में कबीरदास जी के प्रमुख शिष्य धरमदास के पुत्र चुड़ामनदास एवं अन्य दो गुरूओं की समाधियां है। मेले के अवसर पर यहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ कबीरपंथी दीक्षा भी दी जाती है। गुरु घासीदास के जन्म स्थान गिरोदपुरी के विशिष्ट और विस्तृत पहाड़ी भू-भाग में फाल्गुन सुदी 5 से भरने वाले तीन दिवसीय विशाल मेले का समापन जैतखंभ में सफेद झंडा चढ़ाने के साथ होता है। एक लोकप्रिय गीत ‘तूं बताव धनी मोर, तूं देखा द राजा मोर, कहां कहां बाबाजी के मेला होथे’ में सतनामियों के गिरौदपुरी, खडुवापुरी, गुरुगद्दी भंडार, चटुआ, तेलासी के मेलों का उल्लेख है।

दामाखेड़ा का मेला

शिवनाथ नदी के बीच मनोरम प्राकृतिक टापू मदकूघाट (जिसे मनकू, मटकू और मदकूदीप/द्वीप भी पुकारा जाता है), दरवन (बैतलपुर) में सामान्यतः फरवरी माह में सौ-एक साल से भरने वाला इसाई मेला और मालखरौदा का क्रिसमस सप्ताह का धार्मिक समागम उल्लेखनीय है। मदकूदीप में एक अन्य पारम्परिक मेला पौष में भी भरता है। दुर्ग जिला का ग्राम नगपुरा प्राचीन शिव मंदिर के कारण जाना जाता है, किन्तु यहां से तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। पिछले वर्षों में यह स्थल श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ के रूप में विकसित हो गया है। यहां दिसम्बर माह में शिवनाथ उत्सव, नगपुरा नमस्कार मेला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें जैन धर्मावलंबियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति होती है। इसी प्रकार चम्पारण में वैष्णव मत के पुष्टिमार्गीय शाखा के अनुयायी पूरे देश और विदेशों से भी बड़ी तादाद में आते हैं। यह स्थान महाप्रभु वल्लभाचार्य का प्राकट्य स्थल माना जाता है, अवसर होता है उनकी जयंती, वैशाख बदी 11 का।

तिहार-बार मेला

आमतौर पर प्रति तीसरे साल आयोजित होने वाले ‘बार’ में तुमान (कटघोरा) तथा बसीबार (पाली) का बारह दिन और बारह रात लगातार चलने वाले आयोजन का अपना विशिष्ट स्वरूप है। छत्तीसगढ़ी का शब्द युग्म ‘तिहार-बार’ इसीसे बना है। इस आयोजन के लिए शब्द युग्म ‘तीज-तिहार’ के तीज की तरह ही बेटी-बहुओं और रिश्तेदारों को खास आग्रह सहित आमंत्रित किया जाता है। गांव का शायद ही कोई घर छूटता हो, जहां इस मौके पर अतिथि न होते हों। इस तरह बार भी मेलों की तरह सामान्यतः पारिवारिक, सामाजिक, सामुदायिक, आर्थिक आवश्यकता-पूर्ति के माध्यम हैं। इनमें तुमान बार की चर्चा और प्रसिद्धि बैलों की दौड़ के कारण होती है। कटघोरा-कोरबा क्षेत्र का बार आगे बढ़कर, सरगुजा अंचल में ‘बायर’ नाम से आयोजित होता है। ‘बायर’ में ददरिया या कव्वाली की तरह युवक-युवतियों में परस्पर आशु-काव्य के सवाल-जवाब से लेकर गहरे श्रृंगारिक भावपूर्ण समस्या पूर्ति के काव्यात्मक संवाद होते हैं। कटघोरा क्षेत्र के बार में गीत-नृत्य का आरंभ ‘हाय मोर दइया रे, राम जोहइया तो ला मया ह लागे’ टेक से होता है। बायर के दौरान युवा जोड़े में शादी के लिए रजामंदी बन जाय तो माना जाता है कि देवता फुरमा (प्रसन्न) हैं, फसल अच्छी होगी।

रायगढ़ की चर्चा मेलों के नगर के रूप में की जा सकती है। यहां रथयात्रा, जन्माष्टमी और गोपाष्टमी धूमधाम से मनाया जाता है और इन अवसरों पर मेले का माहौल रहता है। इस क्रम में गणेश चतुर्थी के अवसर पर आयोजित होने वाले दस दिवसीय चक्रधर समारोह में लोगों की उपस्थिति किसी मेले से कम नहीं होती। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद इसका स्वरूप और चमकदार हो गया है। इसी प्रकार सारंगढ़ का रथयात्रा और दशहरा का मेला भी उल्लेखनीय है। बिलासपुर में चांटीडीह के पारम्परिक मेले के साथ, अपने नए स्वरूप में रावत नाच महोत्सव (शनिचरी) और लोक विधाओं के बिलासा महोत्सव का महत्वपूर्ण आयोजन होता है। रायपुर में कार्तिक पूर्णिमा पर महादेव घाट का पारंपरिक मेला भरता है।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात् आरंभ हुआ सबसे नया बड़ा मेला राज्य स्थापना की वर्षगांठ पर प्रतिवर्ष सप्ताह भर के लिए आयोजित होने वाला राज्योत्सव है। इस अवसर पर राजधानी रायपुर के साथ जिला मुख्यालयों में भी राज्योत्सव का आयोजन किया गया है। इसी क्रम में विभिन्न उत्सवों का जिक्र उपयुक्त होगा। भोरमदेव उत्सव, कवर्धा (अप्रैल), रामगढ़ उत्सव, सरगुजा (आषाढ़), लोककला महोत्सव, भाटापारा (मई-जून), सिरपुर उत्सव (फरवरी), खल्लारी उत्सव, महासमुंद (मार्च-अप्रैल), ताला महोत्सव, बिलासपुर (फरवरी), मल्हार महोत्सव, बिलासपुर (मार्च-अप्रैल), बिलासा महोत्सव, बिलासपुर (फरवरी-मार्च), रावत नाच महोत्सव, बिलासपुर (नवम्बर), जाज्वल्य महोत्सव (जनवरी), शिवरीनारायण महोत्सव, जांजगीर-चांपा (माघ-पूर्णिमा), लोक-मड़ई, राजनांदगांव (मई-जून) आदि आयोजनों ने मेले का स्वरूप ले लिया है, इनमें से कुछ उत्सव-महोत्सव वस्तुतः पारंपरिक मेलों के अवसर पर ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों के रूप में आयोजित किए जाते हैं, जिनमें श्री राजीवलोचन महोत्सव, राजिम (माघ-पूर्णिमा) सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

राजिम मेला-

मेले की गिनती राज्य के विशालतम मेलों में है। विगत वर्षों में राजिम मेले का रूप लघु कुंभ जैसा हो गया है और यह ‘श्री राजीवलोचन कुंभ’ के नाम से आयोजित हो रहा है। मान्यता है कि चारों धाम तीर्थ का पुण्य-लाभ, राजिम पहुंचकर ही पूरा होता है। मेले के दौरान कल्पवास और संत समागम से इसके स्वरूप और आकार में खासी बढ़ोतरी हुई है। माघ-पूर्णिमा पर भरने वाले इस मेले का केन्द्र राजिम होता है, महानदी, पैरी और सोंढुर त्रिवेणी संगम पर नदी के बीचों-बीच स्थित कुलेश्वर महादेव और ठाकुर पुजारी वाले वैष्णव मंदिर राजीवलोचन के साथ मेले का विस्तार पंचक्रोशी क्षेत्र में पटेवा (पटेश्वर), कोपरा (कोपेश्वर), फिंगेश्वर (फणिकेश्वर), चंपारण (चम्पकेश्वर) तथा बम्हनी (ब्रह्मणेश्वर) तक होता है। इन शैव स्थलों के कारण मेले की अवधि पूरे पखवाड़े, शिवरात्रि तक होती है, लेकिन मेले की चहल-पहल, नियत अवधि के आगे-पीछे फैल कर लगभग महीने भर होती थी।

राजिम मेला के एक प्रसंग से उजागर होता मेलों का रोचक पक्ष यह कि मेले में एक खास खरीदी, विवाह योग्य लड़कियों के लिए, पैर के आभूषण-पैरी की होती थी। महानदी-सोढुंर के साथ संगम की पैरी नदी को पैरी आभूषण पहन कर पार करने का निषेध प्रचलित है। इसके पीछे कथा बताई जाती है कि वारंगल के शासक अन्नमराज से देवी ने कहा कि मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आऊंगी, लेकिन पीछे मुड़ कर देखा तो वहीं रुक जाऊंगी। राजा आगे-आगे, उनके पीछे देवी के पैरी के घुंघरू की आवाज दन्तेवाड़ा तक आती रही, लेकिन देवी के पैर डंकिनी नदी की रेत में धंसने लगे। घुंघरू की आवाज न सुन कर राजा ने पीछे मुड़ कर देखा और देवी रुक गईं और वहीं स्थापित हो कर दंतेश्वरी कहलाईं। लेकिन कहानी इस तरह से भी कही जाती है कि देवी का ऐसा ही वरदान राजा को उसके राज्य विस्तार के लिए मिला था और बस्तर से चल कर बालू वाले पैरी नदी में पहुंचते, देवी के पैर धंसने और आहट न मिलने से राजा ने पीछे मुड़ कर देखा, इससे उसका राज्य विस्तार बाधित हुआ। इसी कारण पैरी नदी को पैरी पहन कर (नाव से भी) पार करने की मनाही प्रचलित हो गई। संभवतः इस मान्यता के पीछे पैरी नदी के बालू में पैर फंसने और नदी का अनिश्चित प्रवाह और स्वरूप ही कारण है।

राजिम मेले में कतार से रायपुर के अवधिया-धातुशिल्पियों की दुकान होती। वे साल भर कांसे की पैरी बनाते और इस मेले में उनका अधिकतर माल खप जाता, बची-खुची कसर खल्लारी मेला में पूरी हो जाती। विवाह पर कन्या को पैरी दिया जाना अनिवार्य होने से इस मौके पर अभिभावक लड़की को ले कर दुकान पर आते, दुकानदार पसंद करा कर, नाप कर लड़की को पैरी पहनाता। पसंद आने पर अभिभावक लड़की से कहते कि दुकानदार का पैर छूकर अभिवादन करे, उसने उसे पैरी पहनाया है। लड़की, दुकानदार सहित सभी बड़ों के पैर छूती और दुकानदार उसे आशीष देते हुए पैरी बांध-लपेट कर दे देता, पैरी के लिए मोल-भाव तो होता है लेकिन फिर पैरी पहनाने के एवज में दुकानदार को रकम (मूल्य नहीं) भेंट-स्वरूप दी जाती और यह पैरी अगली बार सीधे लड़की के विवाह पर खोल कर उसे पहनाया जाता। इसी के साथ रायगढ़ अंचल के मेलों के ‘मान-जागर’ को याद किया जा सकता है। यहां के प्रसिद्ध धातु-शिल्पी झारा-झोरका, अवधियों की तरह ही मोम-उच्छिष्ट (lost-wax) तकनीक से धातु शिल्प गढ़ते हैं। इस अंचल में लड़कियों को विवाह पर लक्ष्मी स्वरूप धन-धान्य का प्रतीक ‘पैली-मान’ (पाव-आधा सेर माप की लुटिया) और आलोकमय जीवन का प्रतीक ‘दिया-जागर’ (दीपदान) देना आवश्यक होता, जो झारा बनाते।

राजिम मेला का एक उल्लेखनीय, रोचक विस्तार जमशेदपुर तक है। यहां बड़ी तादाद में छत्तीसगढ़ के लोग सोनारी में रहते हैं। झेरिया साहू समाज द्वारा यहां सुवर्णरेखा और खड़खाई नदी के संगम, दोमुहानी में महाशिवरात्रि पर एक दिन का राजिम मेला-महोत्सव आयोजित किया जाता है। पहले यह आयोजन मानगो नदी के किनारे घोड़ा-हाथी मंदिर के पास होता था, लेकिन ‘मरिन ड्राइव’ बन जाने के बाद इस आयोजन का स्थल बदल गया है।

शिवरीनारायण-खरौद का मेला –

शिवरीनारायण-खरौद का मेला भी माघ-पूर्णिमा से आरंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि माघ-पूर्णिमा के दिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर का ‘पट’ बंद रहता है और वे शिवरीनारायण में विराजते हैं। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु और मेलार्थी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। भक्त नारियल लेकर ‘भुंइया नापते’ या ‘लोट मारते’ मंदिर तक पहुंचते हैं, यह संकल्प अथवा मान्यता के लिए किये जाने वाले उद्यम की प्रथा है। प्रतिवर्ष होने वाले खासकर ‘तारे-नारे’ जैसी लोक विधाओं का प्रदर्शन अब नहीं दिखता लेकिन उत्सव का आयोजन होने से लोक विधाओं को प्रोत्साहन मिल रहा है। छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण की प्रतिष्ठा तीर्थराज जैसी है। अंचल के लोग सामान्य धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर अस्थि विसर्जन तक का कार्य यहां सम्पन्न होते हैं। इस अवसर पर मंदिर के प्रांगण में अभी भी सिर्फ ग्यारह रुपए में सत्यनारायण भगवान की कथा कराई जा सकती है।

यह मेला जाति-पंचायतों के कारण भी महत्वपूर्ण है, जहां रामनामी, निषाद, देवार, नायक और अघरिया-पटेल-मरार जाति-समाज की सालाना पंचायत होती है। विभिन्न सम्प्रदाय, अखाड़ों के साधु-सन्यासी और मनोरंजन के लिए मौत का कुंआ, चारोंधाम, झूला, सर्कस, अजूबा-तमाशा, सिनेमा जैसे मेला के सभी घटक यहां देखे जा सकते हैं। पहले गोदना गुदवाने के लिए भी मेले का इंतजार होता था, अब इसकी जगह रंग-छापे वाली मेहंदी ने ले लिया है। गन्ने के रस में पगा लाई का ‘उखरा’ प्रत्येक मेलार्थी अवश्य खरीदता है। मेले की चहल-पहल शिवरीनारायण के माघ पूर्णिमा से खरौद की शिवरात्रि तक फैल जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में पिनखजूर खरीदी के लिए आमतौर पर उपलब्ध न होने और विशिष्टता के कारण, मेलों की खास चीज होती थी।

उखरा की तरह ही मेलों की सर्वप्रिय एक खरीदी बताशे की होती है। उखरा और बताशा एक प्रकार से कथित क्रमशः ऊपर और खाल्हे राज के मेलों की पहचान भी है। इस संदर्भ में ऊपर और खाल्हे राज की पहचान का प्रयास करना आवश्यक प्रतीत होता है। इसके अलावा एक अन्य प्रचलित भौगोलिक नामकरण ‘चांतर राज’ है, जो निर्विवाद रूप से छत्तीसगढ़ का मध्य मैदानी हिस्सा है, किन्तु ‘ऊपर और खाल्हे’ राज, उच्च और निम्न का बोध कराते हैं और शायद इसीलिए, उच्चता की चाह होने के कारण इस संबंध में मान्यता एकाधिक है।

ऐतिहासिक दृष्टि से राजधानी होने के कारण रतनपुर, जो लीलागर नदी के दाहिने स्थित है, को ऊपर राज और लीलागर नदी के बायें तट का क्षेत्र खाल्हे राज कहलाया और कभी-कभार दक्षिणी-रायपुर क्षेत्र को भी पुराने लोग बातचीत में खाल्हे राज कहा करते हैं। बाद में राजधानी-संभागीय मुख्यालय रायपुर आ जाने के बाद ऊपर राज का विशेषण, इस क्षेत्र ने अपने लिए निर्धारित कर लिया, जिसे अन्य ने भी मान्य कर लिया। एक मत यह भी है कि शिवनाथ का दाहिना-दक्षिणी तट, ऊपर राज और बायां-उत्तरी तट खाल्हे राज, जाना जाता है, किन्तु अधिक संभव और तार्किक जान पड़ता है कि शिवनाथ के बहाव की दिशा में यानि उद्गम क्षेत्र ऊपर राज और संगम की ओर खाल्हे राज के रूप में माना गया है।

छत्तीसगढ़ का काशी कहे जाने वाले खरौद के लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन और लाखा चांउर चढ़ाने की परंपरा है, जिसमें हाथ से ‘दरा, पछीना और निमारा’ गिन कर साबुत एक लाख चांवल मंदिर में चढ़ाए जाने की प्रथा है। इसी क्रम में लीलागर के नंदियाखंड़ में बसंत पंचमी पर कुटीघाट का प्रसिद्ध मेला भरता है। इस मेले में तीज की तरह बेटियों को आमंत्रित करने का विशेष प्रयोजन होता है कि इस मेले की प्रसिद्धि वैवाहिक रिश्तों के लिए ‘परिचय सम्मेलन’ जैसा होने के कारण भी है। बताया जाता है कि विक्रमी संवत की इक्कीसवीं शताब्दी आरंभ होने के उपलक्ष्य में रतनपुर में आयोजित श्री विष्णु महायज्ञ के पश्चात् इस क्षेत्र में सांकर और मुलमुला के साथ कुटीघाट में भी विशाल यज्ञ आयोजित हुआ जो मेले का स्वरूप प्राप्त कर प्रतिवर्ष भरता आ रहा है।

रतनपुर मेला

‘लाखा चांउर’ की प्रथा हसदेव नदी के किनारे कलेश्वरनाथ महादेव मंदिर, पीथमपुर में भी है, जहां होली-धूल पंचमी पर मेला भरता है। इस मेले की विशिष्टता नागा साधुओं द्वारा निकाली जाने वाली शिवजी की बारात है। मान्यता है कि यहां महादेवजी के दर्शन से पेट के रोग दूर होते है। इस संबंध में पेट के रोग से पीड़ित एक तैलिक द्वारा स्वप्नादेश के आधार पर शिवलिंग स्थापना की कथा प्रचलित है। वर्तमान मंदिर का निर्माण खरियार के जमींदार द्वारा कराया गया है, जबकि मंदिर का पुजारी परंपरा से ‘साहू’ जाति का होता है। इस मेले का स्वरूप साल दर साल प्राकृतिक आपदाओं व अन्य दुर्घटनाओं के बावजूद भी लगभग अप्रभावित है। कोरबा अंचल के प्राचीन स्थल ग्राम कनकी के जांता महादेव मंदिर का पुजारी परंपरा से ‘यादव’ जाति का होता है। इस स्थान पर भी शिवरात्रि के अवसर पर विशाल मेला भरता है।

चांतर राज में पारम्परिक रूप से मेले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथियां माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि (फाल्गुन बदी 13) हैं और इन्हीं तिथियों पर अधिकतर बड़े मेले भरते हैं। माघ पूर्णिमा पर भरने वाले अन्य बड़े मेलों में सेतगंगा, रतनपुर, बेलपान, लोदाम, बानबरद, झिरना, डोंगरिया (पांडातराई), खड़सरा, सहसपुर, चकनार-नरबदा (गंड़ई), बंगोली और सिरपुर प्रमुख है। इसी प्रकार शिवरात्रि पर भरने वाले प्रमुख मेलों में सेमरसल, अखरार, कोटसागर, लोरमी, नगपुरा (बेलतरा), मल्हार, पाली, परसाही (अकलतरा), देवरघट, तुर्री, दशरंगपुर, सोमनाथ, देव बलौदा और किलकिला पहाड़ (जशपुर) मेला हैं। कुछेक शैव स्थलों पर अन्य तिथियों पर मेला भरता है, जिनमें मोहरा (राजनांदगांव) का मेला कार्तिक पूर्णिमा को, भोरमदेव का मेला चैत्र बदी 13 को तथा लटेश्वरनाथ, किरारी (मस्तूरी) का मेला माघ बदी 13 को भरता है।

रामनवमी से प्रारंभ होने वाले डभरा (चंदरपुर) का मेला दिन की गरमी में ठंडा पड़ा रहता है लेकिन जैसे-जैसे शाम ढलती है, लोगों का आना शुरू होता है और गहराती रात के साथ यह मेला अपने पूरे शबाब पर आ जाता है। संपन्न अघरिया कृषकों के क्षेत्र में भरने वाले इस मेले की खासियत चर्चित थी कि यह मेला अच्छे-खासे ‘कॅसीनो’ को चुनौती दे सकता था। यहां अनुसूचित जाति के एक भक्त द्वारा निर्मित चतुर्भुज विष्णु का मंदिर भी है। कौड़िया का शिवरात्रि का मेला प्रेतबाधा से मुक्ति और झाड़-फूंक के लिए जाना जाता है। कुछ साल पहले तक पीथमपुर, शिवरीनारायण, मल्हार, चेटुआ आदि कई मेलों की चर्चा देह-व्यापार के लिए भी होती थी। कहा जाता है कि इस प्रयोजन के मुहावरे ‘पाल तानना’ और ‘रावटी जाना’ जैसे शब्द, इन मेलों से निकले हैं। रात्रिकालीन मेलों का उत्स अगहन में भरने वाले डुंगुल पहाड़ (झारखंड-जशपुर अंचल) के रामरेखा में दिखता है। इस क्षेत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक आयोजन बागबहार का फरवरी में भरने वाला मेला है।

बस्तर के मड़ई मेले

धमतरी अंचल को मेला और मड़ई का समन्वय क्षेत्र माना जा सकता है। इस क्षेत्र में कंवर की मड़ई, रूद्रेश्वर महादेव का रूद्री मेला और देवपुर का माघ मेला भरता है। एक अन्य प्रसिद्ध मेला चंवर का अंगारमोती देवी का मेला है। इस मेले का स्थल गंगरेल बांध के डूब में आने के बाद अब बांध के पास ही पहले की तरह दीवाली के बाद वाले शुक्रवार को भरता है। मेला और मड़ई दोनों का प्रयोजन धार्मिक होता है, किन्तु मेला स्थिर-स्थायी देव स्थलों में भरता है, जबकि मड़ई में निर्धारित देव स्थान पर आस-पास के देवताओं का प्रतीक- ‘डांग’ लाया जाता है अर्थात् मड़ई एक प्रकार का देव सम्मेलन भी है। मैदानी छत्तीसगढ़ में बइगा-निखाद और यादव समुदाय की भूमिका मड़ई में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। बइगा, मड़ई लाते और पूजते हैं, जबकि यादव नृत्य सहित बाजार परिक्रमा, जिसे बिहाव या परघाना कहा जाता है, करते है। मेला, आमतौर पर निश्चित तिथि-पर्व पर भरता है किन्तु मड़ई सामान्यतः सप्ताह के निर्धारित दिन पर भरती है। यह साल भर लगने वाले साप्ताहिक बाजार का एक दिवसीय सालाना रूप माना जा सकता है। ऐसा स्थान, जहां साप्ताहिक बाजार नहीं लगता, वहां ग्रामवासी आपसी राय कर मड़ई का दिन निर्धारित करते हैं। मोटे तौर पर मेला और मड़ई में यही फर्क है।

दशहरा मेला ,जगदलपुर, बस्तर

मड़ई का सिलसिला शुरू होने के पहले, दीपावली के पश्चात यादव समुदाय द्वारा मातर का आयोजन किया जाता है, जिसमें मवेशी इकट्ठा होने की जगह- ‘दइहान’ अथवा निर्धारित स्थल पर बाजार भरता है। मेला-मड़ई की तिथि को खड़खड़िया और सिनेमा, सर्कस वाले भी प्रभावित करते थे और कई बार इन आयोजनों में प्रायोजक के रूप में इनकी मुख्य भागीदारी होती थी। दूसरी तरफ मेला आयोजक, खासकर सिनेमा (टूरिंग टाकीज) संचालकों को मेले के लिए आमंत्रित किया करते थे और किसी मेले में टूरिंग टाकीज की संख्या के आधार पर मेले का आकार और उसकी महत्ता आंकी जाती थी। मेला-मड़ई के संदर्भ में सप्ताह के निर्धारित वार पर भरने वाले मवेशी बाजार भी उल्लेखनीय हैं। मैदानी छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि में व्यापारी नायक-बंजारों के साथ तालाबों की परम्परा, मवेशी व्यापार और प्राचीन थलमार्ग की जानकारी मिलती है। कई पुस्तकें ऐसे ठिकानों पर ही आसानी से मिल पाती हैं और जिनसे लोकरुचि का अनुमान होता है।

बस्तर के जिलों में मड़ई की परम्परा है, जो दिसम्बर-जनवरी माह से आरंभ होती है। अधिकतर मड़ई एक दिन की ही होती है, लेकिन समेटते हुए दूसरे दिन की ‘बासी मड़ई’ भी लगभग स्वाभाविक अनिवार्यता है। चूंकि मड़ई, तिथि-पर्व से संलग्न सप्ताह दिवसों पर भरती है, इसलिए इनका उल्लेख मोटे तौर पर अंगरेजी माहों अनुसार किया जा सकता है। केशकाल घाटी के ऊपर, जन्माष्टमी और पोला के बीच, भादों बदी के प्रथम शनिवार (सामान्यतः सितम्बर) को भरने वाली भंगाराम देवी की मड़ई को भादों जात्रा भी कहा जाता है। भादों जात्रा के इस विशाल आयोजन में सिलिया, कोण्गूर, औवरी, हडेंगा, कोपरा, विश्रामपुरी, आलौर, कोंगेटा और पीपरा, नौ परगनों के मांझी क्षेत्रों के लगभग 450 ग्रामों के लोग अपने देवताओं को लेकर आते है।

भंगाराम देवी प्रमुख होने के नाते प्रत्येक देवी-देवताओं के कार्यों की समीक्षा करती है और निर्देश या दंड भी देती है। माना जाता है कि इस क्षेत्र में कई ग्रामों की देव शक्तियां आज भी बंदी है। यहां के मंदिर का सिरहा, बंदी देवता के सिरहा पुजारी से भाव आने पर वार्ता कर दंड या मुक्ति तय करता है। परम्परा और आकार की दृष्टि से भंगाराम मड़ई का स्थान विशिष्ट और महत्वपूर्ण है।

भंगाराम मेला ,केशकाल , बस्तर

मड़ई के नियमित सिलसिले की शुरूआत अगहन पूर्णिमा पर केशरपाल में भरने वाली मड़ई से देखी जा सकती है। इसी दौर में सरवंडी, नरहरपुर, देवी नवागांव और लखनपुरी की मड़ई भरती है। जनवरी माह में कांकेर (पहला रविवार), चारामा और चित्रकोट मेला तथा गोविंदपुर, हल्बा, हर्राडुला, पटेगांव, सेलेगांव (गुरुवार, कभी फरवरी के आरंभ में भी), अन्तागढ़, जैतलूर और भद्रकाली की मड़ई होती है। फरवरी में देवरी, सरोना, नारायणपुर, देवड़ा, दुर्गकोंदल, कोड़ेकुर्से, हाटकर्रा (रविवार), संबलपुर (बुधवार), भानुप्रतापपुर (रविवार), आसुलखार (सोमवार), कोरर (सोमवार) की मड़ई होती है।

संख्या की दृष्टि से राज्य के विशाल मेलों में एक, जगदलपुर का दशहरा मेला है। बस्तर की मड़ई माघ-पूर्णिमा को होती है। बनमाली कृष्णदाश जी के बारामासी गीत की पंक्तियां हैं-

”माघ महेना बसतर चो, मंडई दखुक धरा। हुताय ले फिरुन ददा, गांव-गांव ने मंडई करा॥” बस्तर के बाद घोटिया, मूली, जैतगिरी, गारेंगा और करपावंड की मड़ई भरती है। यही दौर महाशिवरात्रि के अवसर पर महाराज प्रवीरचंद्र भंजदेव के अवतार की ख्यातियुक्त कंठी वाले बाबा बिहारीदास के चपका की मड़ई का है, जिसकी प्रतिष्ठा पुराने बड़े मेले की है तथा जो अपने घटते-बढ़ते आकार और लोकप्रियता के साथ आज भी अंचल का अत्यधिक महत्वपूर्ण आयोजन है। मार्च में कोंडागांव (होली जलने के पूर्व मंगलवार), केशकाल, फरसगांव, विश्रामपुरी और मद्देड़ का सकलनारायण मेला होता है। दन्तेवाड़ा में दन्तेश्वरी का फागुन मेला नौ दिन चलता है।

अप्रैल में धनोरा, भनपुरी, तीरथगढ़, मावलीपदर, घोटपाल, चिटमटिन देवी रामाराम (सुकमा) मड़ई होती है। इस क्रम का समापन इलमिड़ी में पोचम्मा देवी के मई के आरंभ में भरने वाले मेले से होता है।

मेला-मड़ई के स्वरूप में समय के कदमताल, परिवर्तन अवश्य हुआ है, किन्तु धार्मिक पृष्ठभूमि में समाज की आर्थिक-सामुदायिक आवश्यकता के अनुरूप इन सतरंगी मेलों के रंग की चमक अब भी बनी हुई है और सामाजिक चलन की नब्ज टटोलने का जैसा सुअवसर आज भी मेलों में मिलता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।

छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहार

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध त्यौहार

• रथयात्रा(रजुतिया) : आषाढ़ शुक्लपक्ष
• हरेली(गेंडी पर्व) : श्रावण अमावस्या
• नागपंचमी : श्रावण शुक्लपक्ष
• भोजली : श्रावण
• रक्षाबंधन : श्रावण शुक्लपक्ष पूर्णिमा
• हलषष्ठी(कमरछट) : भादो कृष्णपक्ष षष्टी
• जन्माष्टमी(आठे कन्हैया) : भादो कृष्णपक्ष(अमाव
स्या)
• पोला : भादो कृष्णपक्ष(अमावस्या)
• हरितालिका(तीजा) : भादो शुक्लपक्ष(पूर्णिमा)
• पितृपक्ष(पितर) : क्वांर कृष्णपक्ष
• दशहरा : क्वांर शुक्लपक्ष
• दिपावली : कार्तिक कृष्णपक्ष(अमावस्या)
• देवउठनी(एकादशी) : कार्तिक शुक्लपक्ष
• छेरछेरा : पौष शुक्लपक्ष(पूर्णिमा)
• महाशिवरात्रि : फागुन कृष्णपक्ष
• राजिम, चम्पारण, सिरपुर, दामाखेडा मेला : माघ
पूर्णिमा
• होलिकादहन : फागुन शुक्लपक्ष(पूर्णिमा)
• अक्षय तृतीया(अक्ती) : बैसाख शुक्लपक्ष(पूर्
णिमा)

छत्तीसगढ़ म किसिम किसिम के तीज तिहार मनाय जाथे।इंहाँ जेन जेन तिहार ल मनाय जाथे ओ मा के कई तिहार ल तो देश भर म मनाय जाथे।छत्तीसगढ़ देश भर म एक अइसे राज ए जिहाँ बारो महीना तिहारे तिहार रथे अउ ए तिहार मन म किसिम किसिम के पकवान तको बनाय जथे।

छत्तीसगढ़ के तिहार

1.राम नवमी-

चइत महीना के शुक्लपक्ष के नवमी के दिन राम नवमी के तिहार मनाय जाथे। ए तिहार ल भगवान राम के जनम दिन के रूप म मनाय जाथे।ए दिन ल शुभ माने जाथे इही कारन ए, के ए दिन बर बिहाव जादा होथे।

2.अक्ति तिहार-

बइसाख महीना के शुक्लपक्ष के तीसर दिन अक्ति तिहार मनाय जाथे।ए दिन खेत म थोरकन बिजहा डार के खेती के शुरुवात करे जाथे।इही दिन करसी म पानी भर के पुरखामन के शांति के कामना तको करे जाथे बर पीपर म पानी डारथें।ए दिन ल शुभ माने जाथे इही कारन ए दिन शादी बहुत होथे।ए तिहार ल पुतरा पुतरी तिहार तको कथें।

3.हरेली तिहार-

हरेली तिहार ल सावन महीना म अंधेरी पाख के अमावस्या के दिन मनाय जाथे।एखर नाव ले ही पता चल जथे के हरियाली के तिहार।किसान मन हरेली के दिन अपन किसानी के औजार मन ल धो मांज के पूजा पाठ करथें।गाय बइला ल गोठान म ले जाके गहूँ के पिसान म लपेट के नुंन ल खवाथे।ए दिन घर म बढ़िहा बढ़िहा रोटीपीठा तको बनाय जाथे।ए दिन के बारे म पुराना जमाना ले मानत आवत हे कि तंत्र मंत्र वाले अपन तंत्र मंत्र के सिद्धि इही दिन करथें।ए तिहार म किसान मन प्रकृति के संगे संग खेती किसानी म जेतना चीज ओखर काम आथे तेखर पूजा पाठ करके उंखर प्रति अपन आस्था प्रकट करथे।

4.नांगपंचमी तिहार-

नांगपंचमी के तिहार ल सावन महीना के पंचमी के दिन मनाय जाथे।ए दिन नाग देवता के पूजा करे जाथे।छत्तीसगढ़ म ए दिन नाग भगवान ल दूध तको चढाय जाथे।ए दिन कुश्ती के खेल तको रखे जथे।

5.राखी तिहार-

ए तिहार ह भाई बहिनी के मया के तिहार ए।बहिनी मन ए दिन अपन भाई के हाथ म राखी बांधथें। भाई मन अपन बहिनी मन ल राखी बांधे के खुशी म साड़ी ,रुपया पैसा देथें।नागपंचमी के दशवइय्या दिन सावन महीना के पूर्णिमा म राखी तिहार मनाय जाथे।

6.भोजली तिहार-

भोजली तिहार भादो महीना म कृष्ण पक्ष के शुरुच दिन ही मनाय जाथे।नान नान टुकनी म माटी भर के ओमा पाँच -सात किसिम के अन्न ल डार के एक जघा म रख देथें अउ सब संगवारी मिल के रोज भोजली गीत ल गा के देवी के सेवा करथें।ए तिहार ह प्रकृति देवी के तिहार ए।

7.कमरछठ तिहार-

कमरछठ के तिहार ल भादो के कृष्ण पक्ष म ही षष्ठी के दिन मनाय जाथे।जमीन खोद के तालाब के रूप बनाके पानी भर लेथें फेर माता हलषष्ठी के पूजा करथें अउ अपन बेटा के लम्बा उमर के आशिर्बाद माँगथें।

8.आठे कन्हइया तिहार-

भादो के कृष्ण पक्ष म आठे के दिन भगवान कृष्ण के जन्म दिन के रूप म ए तिहार ल मनाथें।

9.पोरा तिहार-

पोरा के तिहार ल भादो महीना के अमावस्या के दिन मनाय जाथे।ए तिहार ह तको खेती किसानी ले जुड़े तिहार ए।ए दिन किसान मन अपन अपन गाय बइला ल धो मांज के लाथें अउ पूजा पाठ करथें।गाय बइला के सिंघ म पालिस करके घांघड़ा पहिना के सजाथें।सांझकन बइला दउड़ तको कराथें।ए दिन माने जाथे कि अन्न माता ह गरभ धारन करथे।मतलब धान म दूध भराय ल धर लेथे।महिला घर ल लिप बहार के सजाथें अउ पकवान तको बनाथें। पोरा के दिन माटी के बइला ,जाँता, पोरा के पूजापाठ तको करथें।

तीजा तिहार-

भादो महीना म शुक्ल पक्ष के तीसरा दिन मनाथें ।छत्तीसगढ़ म तीजा ह दीदी बहिनी मन के तिहार ए।पोरा के तीन दिन के बाद तीजा तिहार मनाय जाथे।ए दिन सब दीदी बहिनी मन मइके आय रथें अउ मइके म आके अपन पति के लम्बा उमर खातिर उपास रखथें।भगवान शंकर के माटी के मूरति बनाके पूजा पाठ करथें अउ पति के लम्बा उमर बर भगवान से बरदान माँगथें।ए तिहार ल हरितालिका तिहार के नाव से तको जाने जाथे।घर म बने पकवान ल फरहार करथें।

11.पितर तिहार-

पितर तिहार ल कुंवार महीना के कृष्ण पक्ष म मनाय जाथे।पूरा कृष्ण पक्ष ल पितर पक्ष कथें।अपन पुर्वज मन के आत्मा के शांति बर ए तिहार ल मनाथें।

12.नवरात्रि तिहार-

कुंवार महीना म ही शुक्ल पक्ष म 1-9 दिन तक नवरात्रि म माता दुर्गा के मूरति बनाके नौ दिन तक पूजा पाठ करे जाथे अउ दशमी के दिन पानी म ठंडा कर देथें।

13.दशहरा तिहार-

दशहरा तिहार ल बुराई म अच्छाई के तीज कहे जाथे।अश्विन महीना के दशमी अंजोरी पाख म दशहरा तिहार मनाय जाथे।अइसे माने जाथे के भगवान राम ह माता सीता ल रावन के बध करके आपस लहुटे रहिस हे।उही खुशी म बुराई म अच्छाई के जीत के रूप म मनाय जाथे।

14.देवारी(दिवाली)तिहार-

छत्तीसगढ़ म तको देवारी के तिहार मनाय जाथे। देवारी तिहार के संगे संग अउ दु-तीन ठन तिहार मनाय जाथे।धनतेरस(कातिक महीना कृष्ण पक्ष तेरवाँ दिन),नरक चतुर्दशी(कृष्ण पक्ष चौदहवां दिन),गोवर्धन पूजा(शुक्ल पक्ष पहला दिन),भाई दूज(शुक्ल पक्ष दूसरा दिन) ।देवारी तिहार कातिक महीना के अमावस्या के दिन ए तिहार ल मनाय जाथे।ए दिन घर म सबकोटी दिया जलाय जाथे।अइसे मान्यता हे के ए दिन भगवान राम ह बनवास काटके के लहूटे रहिस हे त अयोध्या म सब तरफ दिया जला के ओखर सुवागत करे गे रहिस हे।

15 .- मकरसंक्रांति-

पुष महीना के कृष्ण पक्ष में छठवा दिन मनाथें।ए दिन तीली के लड्डू बनाथें।

16.छेरछेरा तिहार-

छेरछेरा छत्तीसगढ़ म नया फसल आय के खुशी म मनाय जाथे।छेरछेरा पूष महीना के पुन्नी के दिन मनाय जाथे।जब किसान मन नवा फसल ल मिसकूट के तियार होथे त ए दिन लईका सियान सब झन घरोघर जाके अन्न के दान माँगथें।

17.होली तिहार-

होली छत्तीसगढ़ के बड़े अउ आखरी तिहार ए।होली फागुन महीना के पूर्णिमा के एक दिन बाद मनाय जाथे।होली रंग के तिहार ए।पूर्णिमा के रात के होलिका दहन होथे फेर बिहान भर होली तिहार होथे।होली म एक दूसर ल रंग लगाके आपस म मतभेद भूला के मिलजुल के रहिथें।

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