तालाब खोदाई के दौरान मिली उमा महेश्वर की पांचवीं सदी की प्रतिमा

रायपुर – राजधानी के समीप आरंग गांव में खोदाई के दौरान प्राचीन प्रतिमाएं मिली हैं। पुरातात्विक विभाग का प्राथमिक आंकलन है कि प्रतिमाएं पांडुवंशीकालीन छठवीं शताब्दी की हो सकती हैं। वैज्ञानिक अध्ययन और विश्लेषण के बाद इनके संबंध में आधिकारिक घोषणा की जाएगी। इससे पहले भी आरंग इलाके में खोदाई के दौरान कई प्रतिमाएं और मिल चुकी हैं। वे छठवीं-सातवीं शताब्दी की हैं। अभी प्राप्त प्रतिमाओं के बारे में अधिकारियों का कहना है कि ये माता चामुंडा, भगवान विष्णु और उमा-महेश्वर यानी शंकर-पार्वती तथा जैन तीर्थंकर की हैं, जिन्हें राजधानी रायपुर के संग्रहालय में रखा गया है।

आरंग के झलमला तालाब की सफाई के दौरान ग्रामीणों को प्रतिमाएं मिलीं। तालाब के पास समिया माता मंदिर में एक खंडित शिलालेख भी मिला है । इसमें संस्कृत भाषा और पूर्व नागरी, कुटिल लिपि (उत्तर लिच्छवी लिपि) में कुछ लिखा है। संभावना है कि यह शिलालेख छठवीं-सातवीं शताब्दी का है। इससे पूर्व भी आरंग में राजर्षितुल्यकुल वंश के राजा भीमसेन का ताम्रपत्र मिला था, जिसे संग्रहालय में रखा गया है।

इलाके में मिले शिलालेखों से संभावना जताई जा रही है कि पांडुवंशीकाल में भी आरंग एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र था। आरंग क्षेत्र, ऐतिहासिक पुरातत्व स्थल और बौद्ध केंद्र सिरपुर के समीप स्थित है। यहां के तालाब झलमला, अंधियारखोप, रानीसागर, जलसेल तालाब के टापू में इससे पहले भी प्रतिमाएं मिल चुकी है।अंधियार खोप तालाब में मिली एक और प्रतिमा के बारे में कहा जा रहा है कि यह जैन धर्म के तीर्थंकर की पादपीठ है। एक अन्य प्रतिमा भी जैन तीर्थंकर की है, जो खंडित अवस्था में है।

विष्णु, चामुंडा, उमा-महेश्वर, जैन तीर्थंकर की प्रतिमाएं मिली

यहाँ पूर्व में कई प्रतिमाएं मिली थीं, जो पांचवीं-छठवीं और सातवीं शताब्दी की थीं, इसलिए संभावना है कि विष्णु, चामुंडा, उमा-महेश्वर, जैन तीर्थंकर की प्रतिमाएं भी उसी काल की हो सकती हैं। इसकी जांच करवाई जाएगी। फिलहाल चारों प्रतिमाओं को म्यूजियम में रखा गया है।’

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