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farming:कम पानी में धान का बेहतर उत्पादन लेने के लिए करें इस आधुनिक तकनीक का प्रयोग

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अंबिकापुर। देश में लगातार मानसून की चिंताजनक की स्थिति को देखते हुए अब कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा धान की अच्छी पैदावार व कम लागत,कम पानी में धान का उत्पादन करने की पद्धति खोजी जा रही है।धान की खेती के लिए अमूमन पानी की सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है।ऐसे में भी बारिश न हो तो किसानों की चिंता बढ़ जाती है और उत्पादन भी प्रभावित होता है।लिहाजा अब सरगुजा जिले में नई तकनीक से धान की खेती एक प्रगतिशील किसान ने शुरू की है।इस प्रगतिशील किसान ने एक एकड़ में प्रायोगिक तौर पर इस पद्धति से खेती की शुरुआत कर दी है।

कम पानी में धान का बेहतर उत्पादन लेने के लिए ‘एरोबिक पद्धति’ से धान की बोवाई कराई जा रही है।इस पद्धति में ना खेत में पलेवा करने की जरूरत है और न रोपाई करने की जरूरत है।धान बीज को सीधे कतारबद्ध तरीके से बोवाई करनी है और छोड़ देना है।इस पद्धति से धान की जड़ें काफी नीचे चली जाती हैं और पानी की जरूरत नहीं पड़ती।जड़ों के नीचे चले जाने से भरपूर नमी मिल जाती है और धान आसानी से बढ़ने लगता है।

एरोबिक धान लगाने के लिए किसान को खेत तैयार करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती।किसान को खेत में कीचड़ बनाने की जरूरत ही नहीं होती।कीचड़ तैयार करने में सर्वाधिक पानी की खपत लगती है।धान की रोपाई भी करना नहीं पड़ता।एक हेक्टेयर में करीब 15 किलो हाइब्रिड बीज की आवश्यकता पड़ती है,जबकि एरोबिक पद्धति में 6 किलो बीज में ही एक एकड़ धान की फसल लगाई जा सकती है।

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इसे सूखी जमीन पर भी लगाया जा सकता है।यह खरपतवार नियंत्रण के लिए उपयुक्त माना जाता है।एरोबिक धान की फसल को 115 से 120 दिन के अंदर उत्पादन किया जा सकता है।इसके सफल प्रयोग के बाद किसानों ने इसे अपनाना भी शुरू कर दिया है।सरगुजा जिले के प्रगतिशील कृषक ताराचंद गुप्ता और उनके बेटे जिला पंचायत सदस्य राकेश गुप्ता ने प्रयोग के तौर पर करजी गांव में स्थित अपने एक एकड़ खेत में एरोबिक पद्धति से इस बार धान की बोवाई की है।

बोवाई के हफ्ते भर बाद ही धान उग आया है।इस पद्धति से कम पानी में भी धान आसानी से उत्पादन किया जा सकता है।इसके लिए पारंपरिक सुगंधित धान की किस्मों के साथ हाइब्रिड किस्में भी लगाया जा सकता है।इसे तरह-तरह के कृषि यंत्रों से तो लगाया ही जा सकता है किंतु ताराचंद गुप्ता व राकेश गुप्ता ने इसे श्रमिकों से लगवाया है।एक एकड़ में अच्छी जोताई कर खरपतवार नाशक दवाइयां डालकर कतार विधि से धान की बोवाई करा दी गई है।अब एक पखवाड़े में पूरा खेत हरा-भरा नजर आने लगेगा।यह पद्धति इतनी कारगर साबित हो रही है कि सरगुजा में दूसरे किसान इस तकनीक को अपनाने की बात कर रहे हैं।

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कारगर है यह पद्धति

कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर पीसी चौरसिया की मानें तो यह पद्धति इन दिनों पूरे विश्व में अपनाई जा रही है जहां धान की खेती होती है।पहले भी किसान गर्मी में ही धान की बोवाई कर दिया करते थे।तब उत्पादन भी आसानी से हो जाता था कम पानी में हो जाता था किंतु उस पद्घति को लोग भूल चुके हैं।आम तौर पर हम एरोबिक पद्धति को सूखा बोनी का धान भी कह सकते हैं।इससे समय की बचत के साथ समय पर धान की खेती हो जाती है।उन्होंने बताया कि-एरोबिक धान की खेती धान उत्पादन की श्रेष्ठ व स्थाई विधि है।इसे कोई भी किसान आसानी से इस्तेमाल कर सकता है।मानसून में लेटलतीफी से किसान कई बार पिछड़ जाते हैं।यदि इस पद्धति को अपनाएं तो किसान धान की खेती कभी नहीं छोड़ेंगे।

किसानों को करेंगे जागरूक

प्रगतिशील कृषक राकेश गुप्ता ने बताया कि-प्रयोग के तौर पर मैंने इस बार एरोबिक पद्धति से एक एकड़ में धान की खेती शुरू की है।उन्होंने बताया कि-बेंगलुरु में आयोजित कृषि महोत्सव में शामिल होने का मौका मिला था।तब उन्हें इस एरोबिक किसान क्राफ्ट धान बोवाई के संबंध में जानकारी मिली।वापस लौटते ही मैंने ठान लिया था कि सरगुजा में इसका प्रयोग शुरू कराऊंगा।गर्मी में ही एक एकड़ की अच्छी जोताई और साफ सफाई कराने के बाद मानसून शुरू होने से पहले ही श्रमिकों को लगाकर इसकी बोआई कराई जा चुकी है और अब तो धान उग आया है।निश्चित रूप से नई पद्धति सरगुजा के किसानों के लिए वरदान साबित होगी।इस पद्धति से कम पानी मे भी अच्छा उत्पादन लिया जा सकेगा।

जल संकट से निपटने अच्छा माध्यम

कृषि जानकारों के मुताबिक यह पद्धति व तकनीक जल संकट से निपटने का अच्छा माध्यम है।सूखाग्रस्त इलाकों के लिए धान लगाने की यह पद्धति आने वाले समय मे काफी मददगार साबित होगी। मानसून की लेट लतीफी से परेशान किसानों को एरोबिक धान ही लगाना चाहिए।

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