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Editing Techniques Notes in Hindi: संपादकीय तकनीक के हिंदी में नोट्स

संपादन के सिद्धांत (Principal and Function of Editing )

1. वस्तुनिष्ठता- खबर से निकलकर आनी चाहिए
2. विवादास्पद खबर ना हो।
3. थोड़ी सी संभावना होने पर,या विवाद होने की आशंका होने पर खबर प्रकाशित न करें।
4. समाचार का आशय
5. खबरों के तत्व (5W1H), तथ्य,सत्य प्रमाणिकता के तौर पर
7. रूपरेखा (खबर बनाएं कैसे) विज्ञप्तियों का संपादन करना

प्रारूप
मुख्य बातें (खबर का)
विस्तार (खबर का)

8. अन्य महत्वपूर्ण खबरें
9. भाषा
10. पंडित और टिप्पणियों से बचना।
11. चित्र व समाचारों का सही संयोजन,(ग्राफ़िक्स का निर्माण)
12. महत्व के आधार पर समाचारों का स्थान देना।
13. खबरों की पुष्टि करना।
14. संतुलन बनाना
15. अनुच्छेद व कानूनों का ध्यान रखना

खासकर अपराधों की खबरों में संदेही लिखते हैं अगर अधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है तब तक पुष्टि होने पर ही अपराधी लिखेंगे।

Editing Techniques Notes in Hindi

प्रधान संपादक- समाचार पत्रों का प्रमुख, नींव रखने का कार्य, सब पर नियंत्रण, सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेता है।

संपादक- इनका कार्य भी प्रधान संपादक की तरह होता होता है,प्रकाशन और सारी चीजें।

समाचार संपादक की नियुक्ति भी प्रधान संपादक करता है।

संपादक (Editor)- दूसरा महत्वपूर्ण पद समाचार पत्र में होता है वह है संपादक का।संपादक अपने समाचार पत्र का दायित्व होता है।संपादकीय लेख को अपने अधिनस्थ कर्मचारियों की नियुक्ति संपादकीय लेखन पर कर सके तथा अपने समाचार पत्र के प्रचार प्रसार में सहायक बन सके।संपादक अवसर पड़ने पर अपने अधीनस्थ रिपोर्टरों को हौसला बढ़ाने का भी कार्य करता है।

उपसंपादक (sub editor)- संपादक के बाद का प्रमुख पद होता है उप संपादक का। उपसंपादक प्रतिदिन बैठक आयोजित करता है अथवा अधिकार रखता है।रिपोर्टर को विषय देने का विशेष अधिकार एवं बैठक में खबरों की समीक्षा करता है।संपादक की अनुपस्थिति में उप संपादक संपादकीय लेखन का कार्य भी करता है।

समाचार संपादक (News editor)- समाचार के चयन से लेकर उसके संपादन एवं प्रकाशन एवं स्थान निर्धारण का दायित्व समाचार संपादक का होता है।समाचार संपादक सभी को line-up करता है कार्यक्षेत्र भी बदल सकता है।

संवाददाता (Coraspondent)- समाचार पत्र में आवश्यकता अनुरूप संवाददाता नियुक्त किए जाते हैं जो खबरें देने का कार्य करते हैं।यह स्थानीय स्तर पर होते हैं और कार्यालय में नहीं आते बल्कि किसी साधन से अपनी खबरों को कार्यालय में भेज देते हैं।क्षेत्रीय स्तर पर यह नियुक्त किए जाते हैं।यह मुख्य कार्यालय से संबंधित होते हैं।समाचार संपादक के दिशा निर्देशों पर भी कार्य करते हैं लोगों की विज्ञप्तियां भी एकत्रित करता है।

रिपोर्टर (Reporter)- किसी भी समाचार पत्र की जान रिपोर्टर ही होता है एवं किसी भी तरह की खबर या हर प्रकार की खबर लेने का कार्य रिपोर्टर का होता है।समाचार चयन का कार्य रिपोर्टर करता है।रिपोर्टर हमेशा इस बात के लिए तत्पर रहता है कि वह महत्वपूर्ण सूचनाएं पाठकों के लिए एकत्रित कर सके।कोई भी क्षेत्र की खबर ना छुटे,सत्य खबरों का प्रकाशन,आवश्यक तत्व को जुटाना,खबरों की प्रासंगिकता,पाठकों के आधार पर खबरों का चयन करना,सही और गलत का फर्क,अच्छी भाषा का ज्ञान रिपोर्टर का दायित्व है।

समीक्षक- ये हर अखबार में जरूरी नहीं है।पर समानता अखबार अपने समीक्षक नियुक्त करते हैं,छोटे व मंझले अखबार समीक्षकों के लिए समीक्षा को स्थान देते हैं। छोटे व मंझले अखबार आवश्यकतानुसार ऐसे लेखकों का भुगतान करते हैं- कला समीक्षक
साहित्य समीक्षक
खेल समीक्षक

फोटो पत्रकार- रिपोर्टर के दिशा निर्देशों का ध्यान रखता है खबरों की भूख होनी चाहिए।

प्रूफ संशोधक- गलतियों को पढ़ना,चिन्हित करना व पाठकों के पढ़ने योग्य बनाना,मुख्य काफी से टाइप काफी को मिलाना आदि।

संपादकीय लेखक- ये प्रधान संपादक,संपाद, उप संपादक ही करते हैं।

Introduction to editing (संपादन का परिचय)

एडिटिंग की शुरुआत उस समय होती है जब कोई संपादक या उप संपादक ऐसी खबरों को छांटना शुरू करता है जो अगले दिन का अखबार बनाते समय ज्यों की त्यों प्रयोग नहीं की जा सकती।इस दौरान केवल वही खबरें चुनी जाती है जो पाठक के लिए रुचिकर हो,सूचनाप्रद हो, सामायिक हो।इसके बाद ही ये खबरें डेस्क पर संपादन के लिए भेजी जाती है।जहां पर उसकी व्याकरण संबंधी,वाक्य संबंधी,वर्तनी संबंधी,आंकड़ों संबंधित,तर्क संबंधी गलतियों को ठीक किया जाता है।इसके अलावा पेज पर उपलब्ध स्थान के अनुसार भी खबर को एडिट किया जाता है।संपादन के समय खबर को आमतौर पर दो भागों में बांटा जाता है यह दो भाग है- इंटरो और बॉडी

इंट्रो का काम पाठकों को पूरी खबर से परिचित कराना होता है जबकि बॉडी का काम खबर के बारे में विस्तार से जानकारी देना होता है।

इंट्रो में आमतौर पर यह जानकारी दी जाती है कि क्या हुआ,कब हुआ,कहां, कैसे और क्यों हुआ और उसमें कौन प्रभावित हुआ।जबकि बॉडी में इनकी सवालों के जवाब विस्तार से दिए जाते हैं।इंट्रो को खबर कर निचोड़ भी कहते हैं।

इनवर्टेड पिरामिड का कॉन्सेप्ट- उल्टे पिरामिड की अवधारणा- एडिटिंग करते वक्त उल्टे पिरामिड सिद्धांत का पालन किया जाता है।जिसमें खबरों को महत्व के घटते हुए क्रम में लिखा जाता है।

संपादन के सिद्धांत (Principal of editing)

1. सूक्ष्मता
2. आधार तत्वों का पालन
3. कल्पनाशीलता
4. आलोचनात्मक दृष्टिकोण
5. सटीकता
6. उल्लेख
7. संतुलन और निष्पक्षता
8. संक्षिप्तता
9. स्पष्ठता

1. सूक्ष्मता- अगर जानकारी सही या सटीक न हो तो पत्रकारिता नहीं है ।एक संपादक के तौर पर हर खबर की सटीकता को परखना हमारा कर्तव्य है।

2. आधार तत्वों का पालन- खबर लिखते वक्त संपादन से संबंधित सभी आधारभूत बातों का ध्यान रखना चाहिए।इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तकनीक कितनी विकसित हो चुकी है ।एक अच्छी कॉपी का संपादन बेसिक्स पर ही निर्भर करता है।

3. कल्पनाशीलता- अच्छे संपादन के लिए रचनात्मक और लचीली सोच की ज़रूरत होती है।

4. आलोचनात्मक दृष्टिकोण- संपादन करते वक्त हर प्रकार की जानकारी का अपने स्तर पर विश्लेषण करना चाहिए।तथ्यों की अपने स्तर पर पड़ताल करनी चाहिए।विभिन्न स्रोंतों का इस्तेमाल कर सूचनाओं की विश्वसनीयता परखनी चाहिए।

5. सटीकता- एक छोटी सी गलती भी अखबार या पत्रिका की छवि को धूमिल कर सकती है ।इसलिए खबरों में नाम, आंकड़े और तथ्य बार-बार परखे जाने चाहिए।

6. उल्लेख- खबर आपको किसी न किसी स्रोत से अवश्य मिलती है।खबर की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है कि जिस श्रोत से जानकारी ली गयी है उसका उल्लेख खबर में करें ।श्रोत का उल्लेख करने से पाठक खबर पर ज़्यादा विश्वास करेगा और पत्रकार पर भी अपने विचार थोपने का आरोप नहीं लगेगा।

7. संतुलन और निष्पक्षता- संतुलन का अर्थ है समाचार में दोनों पक्षों को शामिल किया जाए अर्थात खबर लिखते वक्त आप किस एक पक्ष को अपने अखबार या पत्रिका के माध्यम से समर्थन नहीं दे रहे है।यह एक पेशेवर पत्रकार का दायित्व है।

8. संक्षिप्तता- आजकल पाठकों के पास इतना समय नहीं है कि वे विस्तृत खबरों को पूरा पढ़ें इसलिए खबर लिखते वक्त बिना कोई गोलमाल किए सीधे शब्दों में तथ्यों को पेश करना चाहिए।इससे स्थान और समय की तो बचत होती है साथ ही अखबार या पत्रिका के प्रति पाठकों की विश्वसनीयता भी बढ़ती है।

9. स्पष्टता- स्पष्ट सोच और विचारों की स्पष्टता से कोई भी व्यक्ति मीडिया से उच्च पदों तक पहुंच सकता है वहीं इसके विपरीत होने पर इसे नीचे भी गिरा सकती है।अभिव्यक्ति जितनी साधारण और स्पष्ट होगी उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा होगा।

संपादकीय विभाग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

1. इनपुट
2. आउटपुट

इनपुट के अंतर्गत

1. समाचार ब्यूरो या संवाददाता
2. असाइनमेंट डेस्क
3. रिसर्च विभाग
4. गेस्ट कोऑर्डिनेशन विभाग

संपादकीय विभाग के अधीन कई पद होते है-

1. रिपोर्टर
2. इनपुट प्रमुख
3. रिसर्चर
4. एंकर
5. डेस्क कोआर्डिनेटर
6. समाचार संपादक
7. निर्माता

गेस्ट कोआर्डिनेशन डिपार्टमेंट- किसी भी न्यूज़ चैनल में कई प्रकार के प्रासंगिक,राजनीतिक,मानवीय,सामाजिक या स्वास्थ्य किसी भी ताजा विवादित विषय पर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।

आउटपुट- यह संपादकीय विभाग का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है।इनपुट विभाग से प्राप्त होने वाली प्राथमिक सामग्री को संपादन के जरिए प्रसारण के लिए उपयुक्त स्वरूप में तैयार करने का कार्य आउटपुट विभाग करता है।

कॉपी लेखन व संपादन- रिपोर्टर से प्राप्त सूचना या स्क्रिप्ट जब आउटपुट को दी जाती है तो उसे एक प्रसारण योग्य स्क्रिप्ट में बदलने के लिए डेस्क के बदले किया जाता है।कॉपीराइटर समाचार के साथ प्राप्त हुए दृश्यों को देखकर और प्राथमिक जानकारी लेकर स्टोरी की स्क्रिप्ट लिखता है।फिर कॉपी एडिटर उसे एडिट करता है और फिर इसी स्क्रिप्ट पर आधारित स्टोरी run-down के आधार पर प्रसारित की जाती है।

रन डाउन- न्यूज़ चैनल में प्रसारित किए जाने वाले समाचार अथवा कार्यक्रमों का ब्लूप्रिंट run-down कहलाता है।run-down में उस कार्यक्रम में शामिल विषय वस्तु को किस समय प्रसारित करना है और उनका क्रम निर्धारित किया जाता है।यह वह स्थान है जहां पर किसी भी समाचार बुलेटिन या स्टोरी तथा अन्य सामग्रियों को इकट्ठा किया जाता है और प्रसारण की योजना अनुसार व्यवस्थित कर प्रसारित किया जाता है।

अपडेट और मॉनिटरिंग डेस्क- ये विभाग चैनल पर ग्राफ़िक्स द्वारा चलने वाले लगातार अपडेट को संपादित करता है तथा अलग-अलग चैनल पर चलने वाले खबरों को मानीटरिंग भी करता है लगातार चलने वाले ग्राफ़िक्स अपडेट को टीकर और स्क्रॉल आदि कहा जाता है।

एसआईटी में काम करने वाले लोग वरिष्ठता के आधार पर रिपोर्टर,सीनियर कॉरस्पॉडेंट,प्रिंसिपल कॉरस्पॉडेंट ,प्रिंसिपल कॉरस्पॉडेंट,स्पेशल कॉरस्पॉडेंट आदि होते हैं।

इनपुट हेड- यह संपादकीय विभाग का प्रमुख होता है।इसका काम मुख्य रूप से खबरों की योजना बनाना और खबरों को सही समय पर हासिल करना है इनपुट हेड संपादक विभाग की ओर से चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करता है तथा मार्केटिंग और आउटपुट के साथ तालमेल रखता है।इसे OB VAN(आउटडोर ब्रॉडकास्टिंग वेन)भी कहा जाता है।

रिसर्चर- किसी भी समाचार को प्रकाशित करने से पहले उसकी सत्यता तथा तथ्यों को प्रमाणित किया जाता है।यह काम रिसर्चर का ही होता है।एक रिसर्चर की शुरुआत से लेकर अंत तक सभी बिंदुओं को ध्यान में रखकर छानबीन करता है।प्रायः इस पद पर नए ट्रेनर्स को रखा जाता है।

एंकर्स- टेलीविजन में समाचारों का प्रसारण एंकर करते हैं एक न्यूज़ चैनल में 24 घंटे में 8-8 घंटे के तीन शिफ्ट लगती है जिसमें 7-8 एंकर होते हैं वही स्पेशल प्रोग्राम या स्पेशल स्टोरीज के लिए स्पेशल एंकर नियुक्त किए जाते हैं।

डेस्क- टीवी में संवाददाता के पास से आकर समाचार न्यूज़ टेस्ट पर भेजा जाता है।रिपोर्टर की स्क्रिप्ट में व्याकरण की गलतियां,भाषा की अशुद्धियां या फिर खबर को व्यवस्थित ढंग से लिखने की जिम्मेदारी डेस्क या काफी डेस्क की होती है जिसके बाद तैयार फाइनल स्क्रिप्ट को editing के लिए कंप्यूटर पर डालकर अलग-अलग प्रक्रिया से भेजा जाता है।

न्यूज़ कोऑर्डिनेटर-न्यूज़ रूम में अलग-अलग क्षेत्रों और ब्यूरो से समाचार आते हैं।कौन सी खबर किस समय आएगी इसकी जिम्मेदारी न्यूज़ कोऑर्डिनेटर की होती है।कई बार एक ही समाचार में एक बाईट या एक इंटरव्यू दिल्ली से तो दूसरा किसी और शहर से आना होता है।खबर पूरी होने होने के लिए दोनों या सही समय पर मिलना जरूरी है।न्यूज़ कोऑर्डिनेटर दोनों रिपोर्टरों से बात करके उनके प्रसारित होने का शेड्यूल फिक्स करता है।इनका दूसरा काम अगले दिन का न्यूज़ प्लान तैयार करना भी होता है।वह तमाम ब्यूरो और आउट स्टेशन से संवाददाताओं से बातचीत कर डे प्लान या स्टोरी ऑडियंस बनाता है और मीटिंग में आईडिया अप्रूव होने के बाद रिपोर्टर को खबर के प्रसारित होने की समय की जानकारी देता है यह जानकारी संभावित होती है।

न्यूज़ एडिटर- समाचार संपादक का काम स्क्रिप्ट को पढ़ने के अलावा आउटपुट और इनपुट के बीच तालमेल बनाने का भी होता है।समाचार संपादक ही अपने सहयोगियों के साथ रिपोर्टर्स के साथ भी तालमेल रखता है।

समाचार निर्माता- टेलीविजन समाचार में न्यूज़ रूम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका न्यूज़ निर्माता की होती है।वहीं यह निर्णय होता है कि कौन सी खबर किस फॉर्मेट में जाएगी।कुछ चैनल्स में न्यूज़ प्रोड्यूसर ही समाचार एडिटर की भूमिका भी निभाता है।

कॉपी एडिटर- प्रकाशन और प्रसारण के लिए तैयार होने से पूर्व जो व्यक्ति खबर अथवा कॉपी के अशुद्धियों को चेक करता है उसे दोबारा एडिट करता है कॉपी एडिटर कहलाता है।प्रिंट मीडिया में कॉपी एडिटर मात्रात्मक और लेआउट कभी ख्याल रखता है।

प्रूफ रीडिंग- गलतियों को मार्क करके लिखना,तथ्यों की जांच व उसका पता लगाना सही बातों का ध्यान रखकर अनावश्यक चीजों को काटने छाटने का कार्य प्रूफ्र रीडर करता है।प्रकाशन और प्रसारण से पूर्व तैयार कॉपी में वर्तनी, व्याकरण और मात्रात्मक अशुद्धियों को सावधानीपूर्वक पढ़कर सांकेतिक रूप से सुधार करने की प्रक्रिया प्रूफ रीडिंग कहलाती है।इस प्रक्रिया में लेआउट के कई तत्वों को चेक किया जाता है,जैसे- शीर्षक,पैराग्राफ,संक्षिप्त विवरण को देखना भी शामिल है।

सहायक संपादक- सहायक संपादक वैचारिक लेख,आलेख,अग्रलेख,संपादक के नाम पत्र इत्यादि सामग्री का चयन करके इन्हें पढ़ने योग्य बनाता है।समाचार पत्र समूह की क्षमता के अनुसार विभिन्न संपादकों की नियुक्ति की जाती है।सहायक संपादक को संयुक्त संपादक की अपेक्षा आउटलुक की गहरी समझ होती है।आवश्यकता पड़ने पर सहायक संपादक विषय संबंधी विशेष लेख संपादकीय आदि भी लिख सकता है।

न्यूज़ एडिटर- समाचार देश का हो या विदेश का,राजनीतिक हो या सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक हो इनको पत्र-पत्रिकाओं की नीति के अनुसार छापने योग्य बनाने के लिए संपादकीय विभाग में जिस व्यक्ति की नियुक्ति होती है उसे न्यूज़ एडिटर या समाचार संपादक कहते हैं।समाचार संपादक के अधीन संयुक्त संपादक कार्य करते हैं इनके कार्यों का बंटवारा समाचार संपादक करता है उप संपादकों तथा मुख्य उप संपादक ओं के मध्य कोआर्डिनेशन बनाए रखना समाचार संपादक का ही काम होता है।

चीफ सब एडिटर- पेज प्रभारी को चीफ सब एडिटर या मुख्य उपसंपादक कहते है।इसे शिफ्ट इंचार्ज भी कहा जाता है।समाचारों का चयन करके उनकी गुणवत्ता के आधार पर उन्हें पृष्ठ में स्थान देना मुख्य उप संपादक की जिम्मेदारी है।शीर्षक,उपशीर्षक,फ्लैग,इंटरव्यू आदि की जांच करना चीफ सब एडिटर का काम होता है।समाचार संपादन की अनुपस्थिति में चीफ सब एडिटर ही न्यूज़ एडिटर की भूमिका निभाता है।

न्यूज़ रूम (News Room)-

संपादकीय विभाग में खबरों के चयन से लेकर उनके प्रकाशन के पूर्व तक की प्रक्रिया न्यूज़ रूम में संपन्न होती है।न्यूज़ रूम समाचार पत्र की सभी गतिविधियों का नर्वस सिस्टम होता है।किसी भी अखबार के पदानुक्रम में सबसे ऊपर संपादन होता है।संपादन न्यूज़ रूम में रोजाना के क्रियाकलापों की योजना तैयार कर रिपोर्ट और अपने अधीनस्थ सब एडिटर्स को दिशा निर्देश देता है।इस काम में न्यूज़ एडिटर,चीफ सब एडिटर,सीनियर सब एडिटर और सब एडिटर उसकी सहायता करते हैं।समाचार संपादक न्यूज़ रूम का मुखिया होता है।जो अपनी टीम के साथ खबरों पर काम करता है और इस बात का ध्यान रखता है कि खबर में संबंधित सभी पक्षों को खबर में पर्याप्त स्थान दिया जाता है अथवा नहीं।

समाचार पत्र के सभी रिपोर्टर और एडिटोरियल डेस्क के सब एडिटर,चीफ सब एडिटर,न्यूज़ एडिटर और एडिटर सुबह की बैठक में भाग लेते हैं।इस बैठक में रिपोर्टर की स्टोरी और उनके द्वारा कवर की जाने वाली इवेंट्स या घटनाक्रमों पर चर्चा की जाती है।रिपोर्टर्स को खबरों के संबंध में दिशा निर्देश दिए जाते हैं जिनके आधार पर रिपोर्ट दिनभर अपनी खबरिया स्टोरी पर काम करते हैं शाम को न्यूज़ रूम में दोबारा एक और बैठक होती है जिसमें रिपोर्टर द्वारा लाई गई खबरों के इंगल इत्यादि पर चर्चा की जाती है।खबर पेज पर किस रूप में जाएगी? रिपोर्टर को उसी के अनुसार खबरें लिखने में निर्देश दिए जाते हैं।

न्यूज़ डेस्क (News Desk)-

सामान्यता न्यूज़ डेस्क पर शिफ्टों में काम होता है और एक मुख्य उप संपादक किसी भी शिफ्ट का प्रभारी रहता है।वह संपादन और पेज मेंकिंग की कार्य योजनाओं की तैयारी करता है।अगर समाचार संपादन न्यूज़ रूम का प्रधान है तो मुख्य उप संपादक न्यूज़ डेस्क का प्रभारी है।

वहीं दूसरी ओर समाचार संपादक और मुख्य उप संपादक खबरों में लगातार होने वाले अपडेट को देखते रहते हैं।न्यूज़ डेस्क पर होने वाला काम समाचार संपादक या असाइनमेंट एडिटर द्वारा चुनी गई खबरें न्यूज़ पेपर पर आती है। मुख्य उप संपादक अपनी नीचे काम करने वाले लोगों की विशेषता तक के आधार पर उन्हें खबरें संपादित करने के लिए सौपता है।

कुछ अखबारों में उपसंपादकों के एक समूह को पूरे पेज सौंप दिए जाते हैं जिसमें उप संपादकों को अलग-अलग पेजों पर जाने वाली खबरों नहीं मिलती बल्कि उन्हें दो या तीन पेज पर जाने वाली सारी खबरों को संपादित करना होता है।

रेडियो समाचार संपादन के सिद्धांत (principal of Radio News Editing)

रेडियो एक अत्यंत लोकप्रिय जनसंचार माध्यम है।रेडियो ध्वनि पर आधारित माध्यम है।समाचार पत्र के संपादन व रेडियो के संपादन में अंतर होता है। रेडियो संपादक को ऐसी भाषा शैली चुन्नी पड़ती है जो सुविधाओं को प्रभावित करें।रेडियो समाचार संपादन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

1. वाक्य सरल व संक्षिप्त होने चाहिए- समाचार बोलने वाला लंबे-लंबे वाक्य नहीं बोल पाता तथा छोटे वाक्य श्रोताओं द्वारा आसानी से समझे जाते हैं और सूचना को सहज व सरल रूप से व्यक्त करने पर बल देना चाहिए।

2. सभी श्रोता साक्षर नहीं होते अतः कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सरल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।नाम आदि का उल्लेख करते समय संक्षेप में लिखने की वजह पूरे नाम का उल्लेख करें।

3. रेडियो समाचार बुलेटिन में एक ही व्यक्ति समाचार प्रस्तुत करता है और न्यूज़ रील में कोडिंग भी देता है।रेडियो समाचार बुलेटिन बनाते समय संपादक को उसी तत्परता से सोचना पड़ता है।जितना एक समाचार पत्र के संपादक को समाचार की ताजगी,समाचार का चयन,समाचार का शीर्षक आदि।कुछ ऐसे बिंदु होते हैं समाचार संपादक को ज्ञात होना चाहिए।

4. वास्तव में एक अच्छा समाचार बुलेटिन बनाना एक कला है,बुलेटिन की एक सीमित अवधि होती है।इस सीमित अवधि में समाचारों को रुचिकर तरीके से प्रतिपादित करने की कला संपादक के कर्मकौशल और व्यक्तित्व का परिचारक है।

5. कुशल व योग्य संपादक समाचार का संपादन करते समय समाचार के अस्तित्व का ध्यान रखता है उसमें नवीनता व तथ्य परकता का संयोजन होना चाहिए।

संपादन (Editing)

न्यू डेस्क पेपर काम करते वक्त उप संपादकों को इस बात का ध्यान रखना होता है कि खबर का शीर्षक,खबर कि इंट्रो और फ़ोटो से मेल खाता हुआ हो यदि खबर में काट छांट की आवश्यकता है या फिर इसमें कुछ जोड़ा जाना है तो उसे संबंधित रिपोर्ट या ब्यूरो से बातचीत करके करना चाहिए।यदि खबर के साथ फोटो है तो उसका कैप्शन (फोटो के नीचे लिखी जानकारी) रुचिकर तरीके से लिखना।

यदि कोई विशेष खबर या पैकेज है तो उसके बेहतर प्रस्तुतीकरण के लिए ग्राफ़िक्स इत्यादि भी बनाए जा सकते हैं।

ये सभी काम खत्म होने के बाद पेज की प्रूफ रीडिंग करवाना ताकि खबर में किसी भी प्रकार की व्याकरण,वर्तनी की अशुद्धि ना हो।

पेज डिजाइन करने का काम पेजमेकर याऑपरेटर करते हैं।लेआउट अर्थात शब्दों और चित्रों को व्यवस्थित और सही तरीके से पेज पर प्रदर्शित करने का काम पेजमेकर का ही होता है।हालांकि एक सब एडिटर को ही पेज में किंग की समझ और ज्ञान होना आवश्यक है।

समाचार संपादक या डिप्टी एडिटर या सह संपादक पेज बनाने की प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए रखते हैं।लेआउट में खबरों को महत्व के अनुसार जगह देने का निर्णय भी संपादकीय विभाग पर ही होता है।न्यूज़ डेस्क,न्यूज़ रूम का ही एक हिस्सा होता है और समाचार संपादक बॉस।कई अखबारों के मुख्य उप संपादक नहीं होते ऐसी जगहों पर समाचार संपादन ही न्यूज़ डेस्क का काम संभालता है।

ENG का पूरा अर्थ – ELECTRONIC NEWS GATHERING

PTC का पूरा अर्थ- Peast to Camera

RADIO/ Signature tune-

क्योंकि यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि रेडियो को केवल सुना जा सकता है,देखा नहीं जा सकता इसलिए पूरी तैयारी किस प्रकार की जाती है कि आपको याद रहे कि आप वक्त सुन रहे हैं? हर रेडियो स्टेशंस की एक सिगनेचर ट्यून होती है,जो कार्यक्रम शुरू होने पर तथा ब्रेक में बार-बार चलाई जाती है।इसका लाभ यह होता है कि सिग्नेचर ट्यून सुनने की आपको पता चल जाता है कि कौन सा रेडियो स्टेशन चल रहा है।

बुलेटिन- विभिन्न तरह के समाचारों का सुनियोजित संकलन।

रिकॉर्डेड बुलेटिन- जो पहले से रिकॉर्ड कर लिया गया हो।

लाइव बुलेटिन-सीधा प्रसारण।

साउंड बाइट-किसी भी व्यक्ति से बातचीत का टुकड़ा।

प्रोडक्शन हाउस- कार्यक्रम तैयार करने का स्थान।ऐसे स्थान जो स्वतंत्र रूप से विभिन्न चैनलों और संस्थाओं के लिए कार्यक्रम तैयार करते हैं।

आउटडोर शूटिंग- जब किसी कार्यक्रम या रिपोर्ट की शूटिंग स्टुडियो के बाहर होती है तो उसे आउटडोर शूटिंग कहते है।

लीनियर एडिटिंग- ये इलेक्ट्रॉनिक से संबंधित है।इसमें कैमरा द्वारा लिए गए विषयों का चयन उन्हें श्रेणीवार ढंग से लगाने और उनमें काट छांट करने का काम वीडियो टेप पर ही होता है।ऑडियो रिकॉर्डिंग का काम भी वीडियो टेप पर ही किया जाता है।

नॉन लीनियर एडिटिंग-इस तरह की एडिटिंग डिजिटल वीडियो टेक्नोलॉजी पर आधारित है।इसमें वीडियो ऑडियो डाटा को कंप्यूटर के हार्ड डिस्क में डिजिटाइज़ किया जाता है।इस एडिटिंग में कई तरह की सुविधाएं होती है और कई इस तरह से गुजरने के बाद भी क्वालिटी का नुकसान नहीं होता।

विजुअल कवरेज- ऐसा कवरेज जिसमे दृश्यों को इकट्ठा किया जाता है।

टेक्स्ट हेडलाइन- ऐसा समाचार जिनके साथ दृश्यों को नहीं दिखाया जाता ये समाचार ग्राफ़िक्स प्लेट पर बनते हैं और इनमें छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है।जैसे कि अखबारों के शीर्षक।

डेडलाइन- काम करने की समय सीमा।निर्धारित समय से कार्य पूर्ण करना।

पैनल चर्चाए- पैनल चर्चा का आयोजन क्षेत्र विशेष, घटना, समसामयिक पहलू आदि के लिए की जाती है।इसमें भेटकर्ता एक पक्ष को लेकर अलग-अलग व्यक्तियों से चर्चा करता है।अंतर केवल इतना सा है कि- भेंटवार्ता में वार्तालाप सवाल जवाब किस शैली में होता है और पैनल चर्चा में सभी से केवल विषय से केंद्रित ही सवाल रखे जाते हैं।सभी भाग लेने वाले को एक ही दर्जा और महत्ता दी जाती है।

ऐसी वार्ता के अंतर्गत अपने-अपने क्षेत्रों की प्रचंड विद्वान शामिल होते हैं इन में भाग लेने वाले का एक ही बराबर पद होता है।प्रायः पैनल चर्चा के लिए ऐसे विषय को लिया जाता है जो विवादास्पद और बहुचर्चित हो।साथ ही जिस पर वाद-विवाद,टिप्पणियां आदि की गुंजाइश जैसे विषय-राजनीतिक,समसामयिक, आर्थिक,भौगोलिक कुछ भी हो सकते हैं।

Section of News Items

समाचार- सामान्यता आमतौर पर घटित होने वाला सामान्य गतिविधियों के अलावा जो कुछ भी नया और खास घटित होता है वह समाचार है।मेले,उत्सव, दुर्घटना,विवाद,बिजली,पानी,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाओं का ना मिलना समाचार हो सकते हैं।किसी भी घटना का अन्य लोगों पर पड़ने वाला प्रभाव और इसके बारे में पैदा होने वाले समाचार की अवधारणा को जन्म देती है।किसी भी घटना,विचार या समस्या का ज्यादा से ज्यादा लोगों से सरोकार यह निर्धारित करता है कि वह समाचार बनाने योग्य है या नहीं।

परिभाषाएं-

” समाचार जल्दी में लिखा गया इतिहास है कोई भी समाचार उससे संबंधित अगला अपडेट आने पर इतिहास बन जाता है।”

” जिस घटना को पत्रकार लाता है,लिखता है,व संपादन करके उसे काट छांट करके अखबार में प्रकाशित होने योग्य बनाता है वह समाचार है।”

समाचार के तत्व (Elements of news items)

1. प्रभाव या इम्पैक्ट- समाचार जितने अधिक लोगों से संबंधित होगा उतना ही बड़ा समाचार बनेगा।
2. निकटता- समाचार जितना निकट से संबंधित होगा उतना ही बड़ा होगा।दूर दुनिया की किसी बड़ी घटना से निकट की किसी छोटी घटना को ज्यादा ही स्थान दिया जाएगा।
3. विशिष्ट व्यक्ति- जिस व्यक्ति से संबंधित खबर है वह व्यक्ति जितना विशिष्ट होगा समाचार उतना ही अधिक प्रभावी और बड़ा बनेगा।
4. तात्कालिकता- कोई ताजा घटना प्रमुखता से बड़े रूप में छापी जाएगी वही उससे संबंधित आने वाले फॉलोअप को अगले दिनों में छोटे रूप में छापा जाएगा।समाचार पत्र छपने के दौरान भी आखिरी समय में प्राप्त महत्वपूर्ण खबरों को पहले से प्राप्त उसमें कम महत्वपूर्ण खबरों को हटाकर छापा जाता है।
5. एक्सक्लूसिव-यदि कोई समाचार केवल एक ही समाचार पत्र के पास हो तो वह उसे बड़े आकार में प्रकाशित करेगा।यदि वही समाचार सभी समाचार पत्रों के पास है तो उसे कम स्थान पर दिया जाएगा।
6. व्यापकता- समाचार का विषय जितना व्यापक होगा उतना ही बड़ा होगा।उतना ही अधिक लोगों से सरोकार रखेगा।समाचार का विषय जितना अधिक व्यापकता लिए हुए होगा तो उतना ही अधिक लोग उसमें रुचि लेंगे।
7. नवीनता- जिन बातों को मनुष्य पहले से जानता है वह समाचार नहीं बनता। समाचार का सबसे बड़ा गुण है नवीनता,समाचार में कोई ना कोई नई जानकारी अवश्य होनी चाहिए।अखबारों के मामले में 1 दिन पुराना समाचार रद्दी की टोकरी में चला जाता है।वही टीवी के मामले में 1 सेकंड पहले प्राप्त समाचार बासी हो जाता है,इसलिए कहा गया है ‘News this second is the history of the next second.’
8. असाधारणता- हर नई सूचना समाचार नहीं होती जिस नई सूचना में समाचार पन होगा वही समाचार बनेगी अर्थात नई सूचना में कुछ ऐसा असाधारणता होना चाहिए जो उसे समाचार बनाए। उदाहरण- जैसा हम जानते हैं कि कुत्ते का किसी व्यक्ति को काटना कोई समाचार नहीं है लेकिन यदि कोई विक्षिप्त व्यक्ति किसी कुत्ते को काट ले तो वह समाचार है।
9. सत्यता और प्रमाणिकता- कोई भी घटना तब तक समाचार नहीं बन सकती जब तक उसकी सत्यता की जांच ना की जाए।समाचार अपवाहों या सुनी सुनाई बातों पर नहीं बनाए जा सकते।वे सत्य घटनाओं की तथ्यात्मक जानकारी होते हैं।सत्यता,प्रमाणिक और तथ्य पूर्ण होने के बाद ही समाचार विश्वसनीय बनता है।
10. रुचिपूर्णता- किसी भी नई सूचना में सत्यता और समाचार का तत्व होने के साथ-साथ उसमें पाठकों की रुचि भी होनी आवश्यक मानी जाती है क्योंकि समाचार पत्र का मुख्य उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक खबरों को पहुंचाना है यह तभी संभव होगा जब ज्यादा से ज्यादा पाठकों की रुचि समाचार को पढ़ने में होगी।
11. प्रभावशीलता- कोई भी सूचना व्यक्तियों की किसी न किसी बड़े समूह,समाज के किसी बड़े वर्ग से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है खबर यदि समाचार पर कोई प्रभाव नहीं डालती तो उसका कोई औचित्य नहीं इसलिए समाचार का प्रभावी होना आवश्यक है।
12. स्पष्ठता- एक अच्छे समाचार की भाषा सरल,सहज और स्पष्ट होनी चाहिए कोई भी सूचना कितनी भी बड़ी महत्वपूर्ण असाधारण और प्रभावशाली क्यों ना हो अगर वह सरल और आम बोलचाल की भाषा में नहीं है तो वह सूचना बेकार है।

समाचार के स्रोत (Section of News items)

प्रत्याशित स्रोत- पुलिस स्टेशन,नगर पालिका,अस्पताल,संस्थाएं,विभिन्न समितियों की बैठक,संसद,विधानसभा,पत्रकार सम्मेलन,सार्वजनिक वक्तव्य, संस्थाओं के सम्मेलन आदि समाचारों के प्रत्याशित स्रोत हैं।

पूर्वानुमान स्रोत- पूर्वानुमानित स्रोत से तात्पर्य खबरों के ऐसे स्रोत से हैं जिसके बारे में आपको पहले से जानकारी तो ना हो लेकिन आपको इस बात का अनुमान हो कि उन जगहों से खबरें या स्टोरीज बनाई जा सकती है।

अप्रत्याशित स्रोत- अप्रत्याशित स्रोत ऐसे स्रोत होते हैं जिनके बारे में ना तो हमें पहले से ज्ञान हो और ना ही हमें पहले से कोई सूचना हो।उदाहरण किसी भी सामान्य व्यक्ति से बातचीत जो उसने बताई वह खबर बनाने लायक है।

समाचार समितियां- देश विदेश में ऐसी कई समितियां हैं जो विस्तृत क्षेत्रों के समाचारों को अपने सदस्य अखबारों या टीवी न्यूज़ चैनलों को समाचार संकलित करके भेजती है।भारत में मुख्य समितियों में -पीटीआई ,UNI, भाषा, वार्ता आदि है।

प्रेस विज्ञप्तियां- सरकारी विभाग सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत प्रतिष्ठान ही अन्य व्यक्ति और संगठन अपने से संबंधित समाचार को सरल और स्पष्ट भाषा में लिखकर ब्यूरो ऑफिस जा शहर के समाचार पत्र कार्यालय में प्रकाशन के लिए भिजवा दें यह समाचार प्रेस विज्ञप्ति कहलाते हैं।

सरकारी प्रेस विज्ञप्ति यह चार प्रकार की होती है-

A. प्रेस कम्युनिक्स – शासन की महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस कम्यूनिक्स के माध्यम से समाचार पत्रों तक पहुंचाए जाते हैं इनसे ज्यादा संपादन की आवश्यकता नहीं होती इस रिलीज के बाएं और सबसे नीचे स्थान पर संबंधित विभाग का नाम स्थान और तारीख लिखी जाती है।

B. प्रेस रिलीज- प्रशासन के अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस रिलीज के द्वारा अखबारों और समाचार चैनलों को भेजे जाते हैं।

C. हैंडआउट- दिन प्रतिदिन की विविध विषयों, मंत्रालय के कार्यकलापों की सूचना हैंडआउट के माध्यम से दी जाती है।यह प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो द्वारा प्रसारित किए जाते हैं।

D. गैर विभागीय हैंडआउट- मौखिक रूप से दी गयी सूचनाओं को गैर विभागीय हैंडआउट के माध्यम से प्रसारित किया जाता है।

पुलिस विभाग- सूचना का सबसे बड़ा केंद्र पुलिस विभाग होता है पूरे जिले में होने वाली अपराधिक घटनाओं की जानकारी पुलिस विभाग को होती है जिसे पुलिसकर्मी प्रेस के प्रभारी संवाददाताओं को बताते हैं वर्तमान समय में लिखित रूप में भी कोतवाली या संबंधित थानों में दिनभर में दर्ज किए गए मामलों की सूचना पुलिस संगठनों को भेजी जाती है।

चिकित्सालय- शहर में स्वास्थ्य संबंधित समाचारों के लिए जिन अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ,उप स्वास्थ्य केंद्र तथा बड़े प्राइवेट अस्पतालों में भी सूचनाएं प्राप्त होती है।

कारपोरेट ऑफिस- निजी कंपनियों के ऑफिस समाचारों के स्रोत होते हैं कई कंपनियां अपने समाचारों को प्रकाशित करने में दिलचस्पी रखती है जो कि उनका व्यापार बढ़ाने में सहायक होती है।

न्यायालय- जिला अदालतों के फैसले में उनके द्वारा व्यक्तियों या संस्थाओं को दिए गए निर्देश हाई कोर्ट,सुप्रीम कोर्ट के फैसले आदि भी समाचारों के प्रमुख स्रोत है।

साक्षात्कार-विभागाध्यक्षों,महत्वपूर्ण व्यक्तियों,अधिकारियों आदि के साक्षात्कार से भी महत्वपूर्ण समाचार बनाए जा सकते हैं।

समाचारों का फॉलोअप- महत्वपूर्ण घटनाओं की विस्तृत रिपोर्ट रुचिकर समाचार बनती है।दर्शक और पाठक चाहते हैं कि बड़ी घटनाओं के संबंध में उन्हें सविस्तार जानकारी मिलती रहे,जिसके चलते संवाददाताओं को घटना की तह तक जाना होता है।

पत्रकारवार्ता- सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थान अक्सर अपनी उपलब्धि को प्रकाशित करवाने के लिए पत्रकारवार्ता का आयोजन करते हैं।जिसमें उनके द्वारा किए गए वक्तव्य,समृद्धि समाचारों को जन्म देती है।इन सभी स्रोतों के अतिरिक्त दिन भर में होने वाली सभाएं,सम्मेलन,शहर के संस्कृति और साहित्य से जुड़े कार्यक्रम और वे सभी स्थान जहां से सामाजिक जीवन से जुड़ी हुई नई घटनाओं की जानकारी मिलती है समाचारों के महत्वपूर्ण स्रोत कहलाते हैं।

Subbing (Sub Editing)-

यह सब एडिटिंग का संक्षिप्त रूप है रिपोर्टर और ब्यूरो द्वारा भेजी गई खबरें जब डेस्क पर आती है तो संबंधित डेस्क का सब एडिटर उन खबरों में काट छांट कर के उन्हें तथ्यात्मक रूप से पुष्ट करता है।खबर में यदि कोई कमी है तो उसे संबंधित रिपोर्टर से बात करके दूर करता है।इसके अलावा खबर की व्याकरणात्मक अशुद्धियों को भी सुधारता है।खबर को अखबार में प्रकाशन योग्य बनाने के लिए खबर में परिवर्तन करने की प्रक्रिया subbing या सब एडिटिंग कहलाती है।

Weakly newspaper and periodicals

साप्ताहिक समाचार पत्र सामान्यतः तो सप्ताह में एक बार या दो बार प्रकाशित होते हैं।ऐसे समाचार पत्रों का सरकुलेशन भी दैनिक समाचार पत्र की तुलना में बहुत कम होता है और यह बहुत ही छोटे समुदाय क्षेत्र और शहरों तक ही सीमित रहते हैं।आमतौर पर साप्ताहिक समाचार पत्र स्थानीय खबरों को प्रमुखता देते है। ये स्वयं को सामुदायिक पत्रकारिता में ही व्यस्त रखते हैं। ज्यादातर साप्ताहिक समाचार पत्र दैनिक समाचार पत्रों का फॉर्मेट अपनाते हैं लेकिन उनका मुख्य केंद्र एक निश्चित क्षेत्र के समाचारों को कवरेज देना हीं होता है।साप्ताहिक समाचार पत्रों के संवाददाताओं के पास किसी भी खबर या स्टोरी पर काम करने के लिए दैनिक समाचार पत्र की तुलना में ज्यादा समय होता है।

साप्ताहिक समाचार पत्रों के समाचार

इन समाचार पत्रों का न्यूज़ कवरेज स्थानीय मुद्दों जैसे- स्कूली शिक्षा,स्वास्थ्य केंद्र,जिला अस्पताल, जिला अधिकारी कार्यालय, कचहरी, नगर पालिका, वार्ड की समस्या,सड़के, के क्षेत्र में होने वाली दुर्घटनाएं,पुलिस स्टेशन में दर्ज मामलों पर आधारित होती है।

सामुदायिक खबरें- आम तौर पर साप्ताहिक समाचार पत्र में सामाजिक या सामुदायिक खबरों को दैनिक समाचार पत्र की तुलना में ज्यादा ही स्थान मिलता है।शहर में होने वाले विभिन्न जातिगत समाजों के कार्यक्रमों, उसके कार्यकारिणी गठन, चुनाव इत्यादि का कवरेज भी समाचार पत्र में पर्याप्त स्थान पाता है।

पब्लिक रिकॉर्ड एन्ड नोटिसेस- अदालतों में होने वाली सुनवाई विभिन्न सरकारी विभागों के निविदा विज्ञापन फाइनेंशियल रिपोर्ट या किसी नई योजना से संबंधित जानकारी इत्यादि भी साप्ताहिक समाचार पत्रों में छपती है।

विज्ञापन- साप्ताहिक समाचार पत्र में आमतौर पर एक या दो सेल्स रिप्रेजेंटेटिव होते हैं जिनका काम मार्केट से जाकर विज्ञापन लाना होता है।इन समाचार पत्रों की ज्यादातर विज्ञापन स्थानीय व्यापार पर आधारित होते हैं इसके अलावा क्लासिफाइड वर्गीकृत विज्ञापन भी साप्ताहिक समाचार पत्र की आय का प्रमुख स्रोत होते हैं।

लेआउट- साप्ताहिक समाचार पत्रों का लेआउट प्रकाशन से 2 या 3 दिन पहले ही निश्चित कर लिया जाता है।साप्ताहिक समाचार पत्रों का लेआउट बनाने के लिए दैनिक समाचार पत्रों की तरह ही एडोब पेजमेकर,एडोब इंन डिजाइन,क्वार्क एक्सप्रेस आदि सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है।

Photo Editing-

जिस प्रकार से प्रकाशित करने से पूर्व लेख,आलेख, कविता या कहानी आदि को संपादित करके उसे प्रभावशाली बनाया जाता है उसी प्रकार से प्रकाशित होने वाली फोटो को भी संपादित करने की आवश्यकता पड़ती है। फोटो एडिट करने का उद्देश्य उसे visual रूप से ज्यादा प्रभावकारी,संबंधित विषय की ज्यादा से ज्यादा जानकारी देने वाली तथा खबर में उपलब्ध स्थान के अनुसार बनाना होता है।

फोटोग्राफ के स्रोत-

प्रत्येक अखबार में विशेषज्ञ फोटोग्राफर नियुक्त होते हैं हालांकि बढ़ती टेक्नोलॉजी के कारण अब पत्रकार खुद भी मोबाइल आदि के इस्तेमाल से भी फोटो लेते हैं।

फोटो एजेंसी-

फोटोग्राफ का सबसे बड़ा स्रोत फोटो एजेंसी होती है।उनके पास हर वक्त लगभग,हर जरूरत की फ़ोटो होती है। मीडिया को फ़ोटो उपलब्ध कराने के लिए कई राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय फ़ोटो एजेंसियां अपनी सेवाएं प्रदान करती है।

अंतरराष्ट्रीय फ़ोटो एजेंसियां

एसोसिएट प्रेस 1848
AFP
फ़ोटो शॉट
रेटना 1978
रायटर पिक्चर्स
वर्ल्ड पिक्चर्स नेटवर्क
ब्लैक स्टार एजेंसी
कैमरा प्रेस

भारतीय फ़ोटो एजेंसियां

डाईनोडिया फ़ोटो एजेंसी
फ़ोटो कार्प
पिक्स फार न्यूज़
फ़ोटो इंडिया डाट कॉम
फ़ोटो इंक

इंटरनेट पर उपलब्ध फ़ोटो- इंटरनेट के सर्च इंजन फोटो ढूंढने का सबसे सरल तरीका है इंटरनेट की कई सारी साइट्स निशुल्क तथा कई शुल्क लेकर फोटो उपलब्ध कराती है।गूगल से अच्छी गुणवत्ता वाली बेहतर फोटो प्राप्त करने के लिए इसकी प्रीमियर सेवा का ग्राहक बनना पड़ता है।इंटरनेट से फोटो लेते वक्त कॉपीराइट विषयक प्रावधानों का ध्यान रखना चाहिए।

स्टॉक फोटोस- स्टॉक फोटोग्राफ्स उन फोटोस को कहते हैं जिन्हें फोटोग्राफर, संस्थान, न्यूज़ एजेंसी और स्वयं समाचार पत्र अपनी लाइब्रेरी में संग्रहित करते हैं यह विभिन्न अवसरों पर खींची गई ऐसी तस्वीर होती है जिन्हें समय आने पर कई जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।

असाइनमेंट फ़ोटो- ये उन फोटोज को कहते हैं जिन्हें कोई अखबार या पत्रिका विशेष तौर पर अपने फोटोग्राफर को भेजकर खिंचवाता है जिसमें फोटोग्राफर संस्थान की मांग और खबरिया इस्टोरी की जरूरत के अनुसार फोटो खींचता है।असाइनमेंट के लिए विशेषज्ञ फोटोग्राफर की सहारा लिया जाता है जो अपने अनुभव व ज्ञान के आधार पर उस विषय की बारीकियों को पकड़ सकें।

फ़ोटो का आकर्षण बिंदु-

1. कंटेंट (विषय वस्तु)- फोटो में विषय वस्तु या कंटेंट उसके आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र होता है।नई जगहों की तस्वीर,मेलों की फोटो,जाने पहचाने सेलिब्रिटी की जीवन शैली,वन्यजीव या कुछ भी नया या असामान्य से कुछ ऐसी विषय वस्तु है जो सहज ही देखने वाले का ध्यान आकर्षित कर लेती है। विषय वस्तु का चुनाव पत्रिका के लक्ष्य समूह को ध्यान में रखकर किया जाता है।

2. फ़ोटो खिंचने का तरीका- फोटोग्राफी अपने आप में एक कला है एक ही विषय वस्तु की फोटो अलग-अलग प्रकार से खींची जा सकती है और पारंपरिक एंगल से क्या नई रोशनी है के प्रभाव से फोटो को आकर्षक ढंग से लिया जा सकता है।

3. मूवमेंट-फोटो के आकर्षण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छन है कल्पना कीजिए ओलंपिक प्रतियोगिता में 100 मीटर की दौड़ में विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली फोटो ठीक उस वक्त खींची गई जब उसका पैर फिनिश लाइन पर पड़ा होना चाहिए वह फोटो धावकों के दौड़ते हुए खींची गई फोटो से ज्यादा प्रभावी मानी जाएगी।

4. फ़ोटो फिलर- कई बार पत्रिका अखबार में खबरें छोटी होने की वजह से या फिर विज्ञापन का साइज अनियमित होने से कुछ स्थान खाली रह जाता है इस स्थान का सदुपयोग फिलर फोटोग्राफी से किया जाता है।उसमें भी यह कोशिश की जाती है कि जिस जगह पर फिलर फोटोग्राफ्स लगाई जाए तो उसके आसपास प्रकाशित खबर उस फोटो के अनुरूप हो।उसके प्रति रुचि पैदा करने वाली ऐसी स्थिति ना होने पर फोटो को एक अच्छा सा कोटेशन देकर लगा दिया जाता है ये फिलर्स अखबार को एक आकर्षक लुक देते हैं।कई बार इनका उपयोग महत्वपूर्ण संदेश या जानकारी देने के लिए भी किया जाता है।

5 फ़ोटो एडिटिंग तकनीक- इसमें समय के साथ काफी बदलाव आया है पुरानी तकनीक में नेगेटिव रोल का प्रयोग किया जाता था फोटोग्राफ्स को खींचने या एक्सपोज़ करने के बाद रोल कोड डार्क रूम में ले जाकर विभिन्न केमिकल्स की सहायता से डेवलप किया जाता था।तथा उस फोटो को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने के बाद ही अंधेरे कमरे से बाहर लाया जाता था इस सारी प्रक्रिया में काफी समय लगता था।तथा हर समाचार पत्र संस्थान में फोटोग्राफर के साथ-साथ डेवलपिंग और डार्क रुम स्पेशलिस्ट की नियुक्ति किए जाते थे इसके बाद तैयार फोटो को प्रिंटर में स्कैन कर डिजिटल फाइल में बदला जाता था इसके बाद उसे कंप्यूटर फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर की मदद से एडिट करके प्रकाशन योग्य बनाया जाता था।

6. आधुनिक फ़ोटो संपादन तकनीक- आज के समय में नई तकनीक के आने से फोटोग्राफर द्वारा खींची गई फोटोस को डिजिटली सीधे कंप्यूटर पर ही डेवलप किया जाता है।ये फोटो किसी कागज या सीधे देखे जाने वाले माध्यम में नहीं होती बल्कि कंप्यूटर द्वारा समझी जाने वाली भाषा फॉर्मेट के अनुसार होती है इसे डिजिटल फोटो कहते हैं क्योंकि कंप्यूटर में पेन ड्राइव, सीडी, हार्ड ड्राइव, ईमेल इत्यादि माध्यम से स्टोर की जाती है।पारम्परिक फ़ोटो को भी स्कैन करके डिजिटल फ़ाइल या फ़ोटो में बदला जा सकता है।

आजकल प्रिंटिंग टेक्निक्स के विकास के साथ-साथ प्रकाशन तक का पूरा कार्य कंप्यूटर के माध्यम से ही होता है।इस पृष्ठभूमि में डिजिटल फोटोग्राफ्स की मांग ज्यादा बढ़ गई है।साथ ही साथ प्रतिस्पर्धा के दौर में हर अखबार फोटोज को विषय वस्तु और लुक के हिसाब से दूसरे से बेहतर दिखाना चाहता है और डिजिटल तकनीक के माध्यम से यह सब आसानी से संभव बनाया जा सकता है जिसके लिए कई प्रकार के फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर की मदद ली जाती है।

7. फ़ोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर- फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर एक असिस्टेंस का काम करते हैं जिसके माध्यम से फोटोज को प्राथमिक एडिटिंग के अलावा अखबार के लेआउट के हिसाब से भी एडिट किया जा सकता है और पेज पर प्रदर्शित कंटेंट को प्रभावी बनाया जा सकता है।

एडोब फोटोशॉप
कोरल फोटो पेंट
फोटो फ्लेक्सर
मैजिक फोटो एडिटर
पिकनिक
फोटो स्केप
फोटो इंप्रेश
फोटो एक्सप्लोर
पिकासा 3
विंडो फोटो एडिटर
फोटो प्लस

ये सारे फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर रिटेल वेंड़र्स से भी खरीदे जा सकते हैं वहीं इंटरनेट साइट में जाकर कुछ फोटो सॉफ्टवेयर निशुल्क डाउनलोड किया जा सकता है।निशुल्क फोटो एडिटिंग की जरूरतों को आसानी से पूरा करते हैं एडिटिंग में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला सॉफ्टवेयर एडोब फ़ोटो शॉप है।यह बहुत ही यूजर फ्रेंडली होने के कारण सीखने वाले लोगों से लेकर विशेषज्ञ तक सभी इसका इस्तेमाल करते हैं।

फ़ोटो एडिटिंग के तत्व

1. ब्राइटनेस- सामान्यता फोटो खींचते वक्त रोशनी की कमी या अधिकता सही तरीके से फोटो ना ले पाने की वजह से फोटो ज्यादा काली या फिर ज्यादा उजाली हो जाती है।यदि फोटो में ज्यादा कालापन है तो उसे अंडर एक्सपोर्ट कहते हैं वहीं यदि फोटो में ज्यादा उजाला पन है तो उसे ओवर एक्सपोर्ट कहते हैं फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर में उपलब्ध ब्राइटनेस कंट्रोल टूल की मदद से इस कमी को सुधारा जाता है।

2. कंट्रास्ट- फोटो में अंधेरे हिस्से तथा रोशनी वाले हिस्से में रोशनी के अनुपात को कंट्रास्ट कहते हैं जब फोटो लेते वक्त प्रकाश की स्थिति या विषय वस्तु की बनावट की वजह से कंट्रास्ट कम या बहुत ज्यादा हो जाता है तो फोटो अनाकर्षक हो जाती है।कंट्रास्ट कंट्रोल टूल्स की मदद से इसे सुधारा जा सकता है।

3. क्रापिंग- कई बार ऐसी फोटो उपलब्ध होती है जिसमें विषय वस्तु तो बहुत छोटा होता है लेकिन गैर जरूरी हिस्सा बड़ा होता है ऐसी स्थिति में ऑब्जेक्ट को मुख्य आकर्षक बिंदु बनाने के लिए फोटो को अब ऑब्जेक्ट के अनुसार छोटा किया जाता है,इस क्रिया को क्रॉपिंग कहते हैं।फोटो के अनावश्यक चित्र को हटाया जाता है।

4. कलर बैलेंस- फोटोशॉप तथा अन्य फोटो एडिट सॉफ्टवेयर में इस टूल्स का इस्तेमाल फोटो के रंगों को जरूरत के अनुरूप तेज या हल्का करने के लिए किया जाता है जिससे फोटो का रंग संयोजन जरूरत के अनुरूप किया जा सकता है।

5. ग्रे स्केल माड टूल- कई बार पत्रिका या अखबार में एक ही रंग की प्रिंटिंग की जाती है जो काले रंग की होती है इसे ब्लैक एंड व्हाइट प्रिंटिंग या मोनो कलर प्रिंटिंग कहते हैं लेकिन रंगीन फोटो के मामले में मोनोप्रिंटिंग से काम नहीं चलता यदि मोनोप्रिंटिंग में रंगीन फोटो का इस्तेमाल किया जाए तो फोटो के रंगीन हिस्से को एक ही रंग के विभिन्न स्तरों पर छापने से उसका ब्राइटनेस या कंट्रास्ट बदल जाता है।इसलिए मोनो कलर प्रिंटिंग में रंगीन फोटो को बिना किसी दिक्कत के छापने के लिए ग्रे स्केल माड यानी काले और स्लेटी रंग के विभिन्न स्तरों पर परिवर्तित करने की आवश्यकता होती है।जिससे फोटो को पहले ब्लैक एंड वाइट फोटो में बदला जाता है फिर उसमें ब्राइटनेस तथा कंट्रास्ट स्टे टूल्स से एडिटिंग करके फोटो को आकर्षक बनाया जाता है।

लेआउट तकनीक-

कई बार इस प्रकार के विज्ञापन भी आते हैं जो सामान्य विज्ञापन जैसे नहीं दिखते यह एक खबर के रूप में प्रकाशित किए जाते हैं।यह देखने में समाचार जैसे ही लगते हैं लेकिन फॉन्ट की विभिन्नता से या किसी विशेष स्थान पर प्रकाशित किए जाने के कारण उन्हें पहचाना जा सकता है कि- उक्त समाचार समाचार ना होकर किसी कंपनी का विज्ञापन है।इस तरह के विज्ञापनों को एडवोटोरियाल कहा जाता है।इसके लिए समान्यतः अखबारों में एक अलग स्थान निर्धारित कर दिया जाता है जिसकी डमी भी अलग से ही तैयार की जाती है।

विज्ञापनों की अधिकता के कारण अखबारों का लेआउट काफी प्रभावित होता है।समाचार पत्र के लिए यह चुनौती है कि कई बार अंतिम समय में विज्ञापन आने के के कारण कई खबरों के डस्टबिन में डालना पड़ता है क्योंकि वे खबर दूसरे दिन के लिए उपयोगी नहीं रह जाती। जिस कारण से लेआउट को कई बार बदलना पड़ता है आज विज्ञापनदाता कंपनी भी लेआउट और विषय वस्तु को लेकर संवेदनशील हो गई है और समाचार पत्र प्रबंधकों को उसकी बात माननी पड़ती है।

डिजाइनर को पेज का लेआउट बनाते समय विज्ञापन को भी ध्यान में रखना पड़ता है।इंटीरियर फैशन और लाइफ़स्टाइल पत्रिका में तो विज्ञापनदाता संपादकीय टीम को अपने हिसाब से मोल्ड करना चाहता है।वह डिजाइनर को अपने विज्ञापनों को मनचाही जगह पर लगाने के लिए बाध्य करता है।लेआउट के लिए तैयार किए गए प्रारूप को ग्रिल्ड कहा जाता है वही काला ग्रिल्ड समाचार पत्र का मुख्य हिस्सा होता है और इसके आधार पर ही डिजाइनिंग की जाती है ग्रिड बनाने के बाद ही कार्टून,खबरों,विज्ञापनों इत्यादि के लिए स्पेस निर्धारित किया जाता है।

कुछ विशेष प्रकार के लेआउट

1. सर्कस पेज लेआउट- जब साज सज्जा के सभी सिद्धांतों,नियमों और परंपराओं को दरकिनार कर मनमाने ढंग से पेज मेंकिंग की जाए तो इसे सर्कस लेआउट कहते हैं।इस तरह की पेज मेकिंग में समरूपता के बजाय विरोधाभास या कंट्रास्ट के माध्यम से संतुलन बनाया जाता है।

2. ब्रोकेन पेज लेआउट- इस प्रकार की पेज मेकिंग में किसी एक समाचार को महत्व देने की बजाय सभी समाचारों की तरफ पाठक का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जाती है।इस पेज मेकिंग में समाचार पत्र एक इकाई के रूप में न दिखकर अलग-अलग खंडों में बटा हुआ दिखता है।

3. टेबलाइट पेज लेआउट- इस प्रकार की पेज मेकिंग में मुख्य पृष्ठ पर कई प्रमुख समाचार एक साथ लगा दिए जाते हैं और उन समाचारों के शेष अंश अंदर के पृष्ठों पर दिए जाते हैं।

लेआउट बनाते वक्त कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए-

A. सभी महत्वपूर्ण समाचारों को उचित स्थान दिया जाए।
B. शीर्षकों में संतुलन रहे।
C. पृष्ठ का बाया भाग सुरुचिपूर्ण और सुंदर हो।
D. समाचार बहुत भरे भरे न लिखे हो।
E. शेषांश का इस्तेमाल कम से कम ही किया जाए।

पेज के लिए फोटो एडिटिंग और रंग समायोजन-

किसी भी अखबार के पेज पर छापने से पहले फोटो को एडिट करना बहुत जरूरी है क्योंकि हमारे पास उपलब्ध फोटो प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल किए जाने वाले रंग समायोजन अनुरूप ही हो ऐसा जरूरी नहीं।इसलिए फोटो को पेंटिंग के हिसाब से एडिट किया जाता है फोटो कितने बनी है इसका रिवॉल्यूशंस कितना है।उसका साइज बहुत ज़्यादा छोटा नहीं है या फिर वह कितने मेगापिक्सल की है इन सब बातों का ध्यान फोटो एडिट करते वक्त रखा जाना आवश्यक है।फोटो एडिटर स्पेशल इफ़ेक्ट के जरिए फ़ोटो को प्रिंटिंग के लायक बनाते हैं।कभी-कभी बहुत पुरानी फोटो का इस्तेमाल भी किया जाता है जो कि वर्तमान में उपलब्ध फोटो फॉर्मेट के अनुरूप नहीं होती ऐसी फोटो को जेपीजी पीएनजी आदि फॉर्मेट में पीडीएफ फॉर्मेट में बदलना जरूरी होता है ऐसा होने के बाद फोटो पेपर पर उसी रूप में छपती है जिस रूप में एडिटर उसको एडिट करता है।

फ़ोटो एडिटिंग के प्रमुख चरण इस प्रकार है-

1. फोटोग्राफर या एजेंसी के फोटोज को एडिटर कंप्यूटर के जरिए या कॉन्ट्रैक्ट सीट के जरिए देखता है।कॉन्ट्रैक्ट सीट फोटोग्राफरों या एजेंसी से आए फोटो की छोटे आकार की पट्टियां होती है।फोटो एडिटर इनमें से छापने योग्य फोटो को छाटता है।

2. जिन तस्वीरों को छोड़ा जाता है उन्हें जरूरत के मुताबिक बड़ा या छोटा करवाया जा सकता है।

3. फोटोस को उनके पहले के फॉर्मेट में बदलकर पीडीएफ फॉर्मेट में कन्वर्ट किया जाता है।

4. इसके बाद उसे प्रिंटिंग के लिए भेज दिया जाता है।

5. यदि फोटो डिजिटल है तो कांटेक्ट शीट के साथ उसका चयन क्रोपिंग, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से उसकी एडिटिंग, इनलारजमेंट करने के बाद फोटो प्रिंटिंग के लिए भेजी जाती है।

डिजिटल तकनीक एवं फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर की मदद से फोटो एडिटिंग बहुत आसान हो गई है आज भी किसी अखबार को पहचान दिलाने के लिए फोटोग्राफ्स का एक अलग ही स्थान है।

शीर्षक (Headline)

शीर्षक किसी समाचार का सार तत्व घोषित करता है इसकी परिभाषा निम्न है-

” किसी समाचार के लिए शीर्षक उस कांच की खिड़की के समान है जिसके भीतर रखे हुए सामान को देखकर किसी व्यक्ति अथवा पाठक का मन उसे पढ़ने अथवा खरीदने को मजबूर हो जाए” – रोलेल्ड ई ब्रलसली

“शीर्षक समाचार का प्राण और उसके सार का विज्ञापन है” – प्रेमलाल चतुर्वेदी

” शीर्षक विश्वसनीय पथ प्रदर्शक के समान है जो व्यस्तता से घिरे पाठक को समय के अपणय से बचाता है और किसी विषय की उचित जानकारी देता है।” – सी वाय चिंतामणी

इन सभी परिभाषाओं से यही स्पष्ट है कि शीर्षक समाचार का सार तत्व है जो समाचार को बहुआयामी बनाता है।

शीर्षक का उद्देश्य-

1. समाचार का विज्ञापन- किसी भी समाचार पत्र में समाचार को विज्ञापित करने में शीर्षक का सर्वोच्च स्थान है।वह बिना शुल्क के समाचार को विज्ञापित करता है खबर को ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े इसलिए जरूरी है कि खबर का शीर्षक इतना आकर्षक हो कि जो कोई उसे देखे खबर पढ़ने को मजबूर हो जाए।पहले के समाचार पत्र में शीर्षक के माध्यम से खबर का संक्षिप्त पहलू विवरण दिया जाता था ताकि पाठक से इसको जानने के लिए खबर पढ़ें।आज के संदर्भ में शीर्षक को आकर्षक बनाने के लिए खबर से संबंधित ज्यादातर जानकारी शीर्षक,उपशीर्षक के माध्यम से दी जाती है ताकि पाठक का समय बचे और वह ज्यादा से ज्यादा समाचार पढ़ सकें।

2. महत्वपूर्ण अंश का सार- शीर्षक समाचार में व्यक्त विचारों के महत्वपूर्ण अंशों का सार होता है।खबर का शेष विकरण आगे की जानकारी बताता है।

3. पृष्ठ का सौन्दर्यकरण- कोई भी शीर्षक समाचार पत्र की सज्जा को अच्छे तरीके से पेश करता है।यदि समाचार का शीर्षक संतुलित और आकर्षक है तो पाठकों में उसे पढ़ने की रुचि पैदा होती है।यदि शीर्षक अच्छा ना हो तो कई समाचार बिना पड़ेगी छोड़ दी जाती हैं।यही कारण है कि ब्रुलसलि ने कहा है- ” सफल एवं पूर्ण शीर्षक का लक्ष्य कथानन की बातों का सार देना,समाचार पत्र के रूप को आकर्षक बनाना तथा उसमें प्रकाशित सामग्री का विज्ञापन करना है।”

शीर्षक की विशेषता

1. स्पष्टता एवं अर्थपूर्णता- शीर्षक लगाते समय सबसे अधिक ध्यान इस बात का रखना चाहिए कि यह स्पष्ट हो तथा संपूर्ण कथन को एक अर्थ प्रदान करता हो यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि वह कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा जानकारी दें तथा पाठक को यह अनुभव कराएं कि उसे खबर का आशय तुरंत समझ में आ गया है।

2. प्रमुख तथ्य आधार – किसी भी शीर्षक को तथ्यों के आधार पर ही लिखा जाना चाहिए।समाचार में लिखे हुए तथ्य शीर्षक,उपशीर्षक में उभरकर अवश्य आने चाहिए यदि ऐसा नहीं होता है तो शीर्षक का उद्देश्य शून्य हो जाता है।

3. जीवंत शब्दों का प्रयोग- शीर्षक की शब्दावली समाचार में कही गई बातों के अनुरूप ही होनी चाहिए अर्थात इसमें जीवंत या लाइवलीनेस होनी चाहिए।

4. सारांश युक्त- शीर्षक में समाचार का उपयुक्त सारांश स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि शीर्षक का निर्धारण खबर के सारांश अथवा इंट्रो को पढ़ने के बाद ही किया जाता है।

स्वतः पूर्व कथन- ब्रूस वेस्टली ने शीर्षक की पांचवी विशेषता बताते हुए कहा है कि शीर्षक स्वतः पूर्ण कथन की अभिव्यक्ति करने वाला होना चाहिए अतः शीर्षक बनाते समय समाचार संपादक या उप संपादक को इस बात का ध्यान रखना है कि वह पूरा समाचार पढ़ने के बाद ही इंट्रो बनाए और उसके आधार पर शीर्षक का निर्धारण करें।

महत्पूर्ण अंशों का ज्ञापन- शीर्षक और उपशीर्षक में समाचार के सभी महत्वपूर्ण तथ्य आ जाने चाहिए ताकि पाठक केवल शीर्षक पढ़कर ही समाचार के वर्ग से परिचित हो सके शीर्षक समाचार को पढ़ने के लिए बाध्य तो करें लेकिन खबर के सभी तथ्यों को सूक्ष्म रूप से प्रकाशित भी करें।

तथ्यों और तस्वीरों के साथ संतुलन- शीर्षक में तथ्य और तस्वीरों के साथ संतुलन अति आवश्यक है।क्योंकि इससे पाठक को पूरी जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए कबड्डी मैच में दर्शकों में इतना उत्साह था कि मैच देखने पेड़ों पर चढ़ गया और शीर्षक उसी तरह का बना था लेकिन अब फोटो आई तो ना तो पेड़ दिखे और ना ही उस पर चढ़े हुए दर्शक।ऐसी स्थिति में शीर्षक के साथ तथ्यों और तस्वीरों का संतुलन नहीं हुआ।यही स्थिति निर्मित ना हो इसलिए तथ्यों और तस्वीरों के साथ संतुलन बनाता हुआ शीर्षक बनाना चाहिए तथ्य समायोजन पूर्ण रूप से होनी ही चाहिए क्योंकि बिना तथ्यों के खबर का अस्तित्व ही नहीं रह जाता।

इंट्रो लिखते वक्त कुछ महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना आवश्यक –

1. संवाद के कब,कहां,क्या,कैसे,क्यों,कौन का उत्तर मिल जाए।
2. समाचार के मूल तत्व का चयन।
3. महत्वपूर्ण सूचनाओं की संक्षिप्त प्रस्तुति।
4. न्यूज़ एंगल का निर्धारण करना।
5. इंट्रो पूर्ण और सुस्पष्ट हो।

इंट्रो के प्रकार

1. समरी इंट्रो- इसमें समाचार का मूल भाव संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है।

2. विस्तृत इंट्रो- इसमें किसी घटना से संबंधित सभी तथ्यों को शामिल किया जाता है। ये प्रायः दो-तीन पैराग्राफ्स में लिखा जाता है।

3. एक्सीडेंट इंट्रो- किसी भी घटना दुर्घटना संबंधी खबर से संबंधित व्यक्तियों के नाम और घटना का विवरण सविस्तार लिख दिया जाता है।

4. आश्चर्यजनक इंट्रो- बिना विस्मयादिबोधक चिन्ह का प्रयोग किए ही आश्चर्यजनक तथ्यों को बढ़ा चढ़ाकर लिखना इस प्रकार की इंट्रो में शामिल किया जाता है।

5. कॉन्ट्रेज इंट्रो- किसी बड़ी घटना को तीखी और पैने वाक्यों में लिखना इस प्रकार के इंट्रो में बिना कोई भूमिका बनाए सीधे वाक्यों में लिखा जाता है। इसका पहला पैराग्राफ प्रशिक्षक के समान दिखाई पड़ता है।

6. उद्धरण इंट्रो- इसमें प्रायः सभाओं और गोष्ठियों से प्राप्त वक्ताओं द्वारा कही गई बातों को आधार बनाकर खबर की शुरुआत की जाती है इसे उद्धरण इंट्रो कहते हैं।

7. फ़िगरेटिव इंट्रो- जब किसी खबर को काव्यात्मक रूप में लिखा जाए तथा उसमें अलंकारिक शब्दावली का प्रयोग हो तो इसे फ़िगरेटिव इंट्रो हैं।

8. सूक्ति इंट्रो- सार्वभौम सत्य को सूक्ति इंट्रो रूप में लिखा जाता है।

Body of News

किसी भी खबर में इंट्रो के बाद जो भी लिखा जाता उसे खबर का विस्तार या बॉडी कहते हैं।इसमें आमतौर पर खबरों के अति महत्वपूर्ण तथ्यों के अतिरिक्त तथ्यों को शामिल किया जाता है जो कि इंट्रो के पूरक होते हैं।बॉडी में चुकी इंट्रो से कम महत्वपूर्ण तथ्यों को शक्ति किया जाता है।इसमें शामिल तथ्यों को महत्व के घटते हुए क्रम में लिखा जाता है लेकिन,इसका यह अर्थ नहीं है कि खबर के महत्वहीन और अनावश्यक जानकारी भी शामिल कर दी जाए।बॉडी में भी खबर में संबंध रखने वाले तथ्यों को ही शामिल करना चाहिए।कोई भी खबर शुरू से अंत तक पाठक को तभी बांधे रख सकती है जब खबर की शुरुआत में इंट्रो से लेकर खबर के अंत बॉडी तक रोचक तरीके से खबर से संबंधित तथ्यों को भी शामिल किया गया है।

फीचर (Feature)

फीचर समाचारों के प्रस्तुतीकरण की एक विधा है लेकिन,समाचारों की तुलना में फीचर में गहन अध्ययन,चित्रों,शोध और साक्षात्कार के जरिए किसी भी विषय की विस्तृत व्याख्या की जाती है।साथ ही साथ सब इतने सहज और रोचक ढंग से किया जाता है कि पाठक उनसे बंधता चला जाता है।पत्रकारिता और साहित्य विशेषज्ञों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएं दी है।

“रोचक विषय का मनोरम प्रस्तुतीकरण ही फीचर है,इसमें दैनिक समाचार, सामायिक विषय और बहुसंख्य पाठकों की रुचि वाले विषयों को शामिल किया जाता है।”

“फीचर पत्रकारिता के मुख्य लक्ष्य-सूचना,शिक्षा और मनोरंजन तीनों की पूर्ति करता है।”


समाचार का काम तथ्य और विचार देकर खत्म हो जाता है जबकि फीचर का काम इससे आगे का होता है इसमें किसी समाचार की पृष्ठभूमि का खुलासा करते हुए विषय और घटना के जन्म और विकास का विवरण दिया जाता है। एक अच्छे फीचर की सार्थकता इसी बात में है कि वह पाठकों को मस्तिष्क पर कितना प्रभाव डालती है।फीचर कब,क्यों,कहां,कैसे,कौन का स्पष्ट करने वाला समाचार से आगे जाकर तत्व,कल्पना और विचारों की संतुलित प्रस्तुति पाठकों को देता है।

फीचर के प्रकार-

1. न्यूज़ फीचर- फीचर अथवा रूपक की सबसे प्रमुख श्रेणी न्यूज़ फीचर कहलाती है दैनिक समाचार पत्रों के साथ-साथ पत्रिकाओं के लिए भी इस तरह के पीछे एक अपरिहार्य जरूरत बन चुके हैं इस तरह के फीचर समाचार को विस्तार देकर पाठकों को पर्याप्त जानकारी देते हैं आजकल फीचर लेखन में ग्राफिक्स चित्र और रेखा चित्रों का खूब इस्तेमाल होने लगा है जिसमें फीचर का स्वरूप भी बदलने लगा है ।उदाहरण- किसी घटना का न्यूज़

2. घटनाओं पर आधारित फीचर- युद्ध,बाढ़,बम विस्फोट,हवाई दुर्घटना आदि से संबंधित खबर पर विशेष कवरेज देने के लिए फीचर्स बनाए जाते हैं।इस प्रकार की घटनाओं पर आधारित फीचर अखबार को विशिष्ट बना देते हैं अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में भी फीचर्स का इस्तेमाल किया जाने लगा है।उदाहरण- उरी घटना।

3. व्यक्तिपरक फीचर- किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के व्यक्तित्व या उसकी किसी सामयिक उपलब्धि पर आधारित पीछे श्रेणी में आते हैं।उदाहरण 2 अक्टूबर गांधी जी पर फीचर,साक्षी मालिक,पीवी सिंधु

4. खोजपरक फीचर-इस श्रेणी में वे फीचर रखे जाते हैं जिनके लेखन के लिए विशेष छानबीन की जाती है और तथ्य की खोज की जाती है और संबंधित लोगों से गहन पूछताछ की जाती है।

5. मनोरंजनात्मक और पारंपरिक फीचर- मनोरंजन और फिल्मों से जुड़े हुए फीचर इस श्रेणी में आते हैं।इसमें किसी फ़िल्म निर्माता,कलाकार आदि की जिंदगी पर भी फीचर लिखे जाते हैं।साथ ही साथ छोटे पर्दे पर प्रसारित होने वाले डेली शीट्स पर भी फीचर लिखे जा रहे हैं।कोई फिल्म अपने आप में फीचर का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है क्योंकि इसमें तथ्य,सूचना,मनोरंजन,शिक्षा सब कुछ होता है।

6. मानवीय रुचि फीचर- इस तरह की फीचर स्थानीय पाठक अथवा दर्शकों की रूचि को देखते हुए लिखा जाता है।स्थानीय समस्याओं महंगाई,बेरोजगारी, सड़के,स्वास्थ्य जैसी आम लोगों से जुड़ी समस्याओं पर इस प्रकार के फीचर लिखे जाते हैं।

7. विज्ञान और तकनीक फीचर- विज्ञान की उपलब्धियों, खगोलीय घटना, चिकित्सा जगत की नई खोज और इंटरनेट संचार क्रांति आदि पर केंद्रित फीचर इस श्रेणी में आते हैं।इस प्रकार के फीचर्स को लिखने के लिए संबंधित विषय में विशेषज्ञता होनी जरूरी है।

8. फ़ोटो फीचर- समाचारों में चित्रों के इस्तेमाल के जरिए किसी भी विषय को बहुत कम शब्दों में कहा जा सकता है।फोटो फीचर किसी एक ही विषय पर केंद्रित भी हो सकते हैं और विभिन्न विषयों के कोलाज के रूप में भी।

9. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया फीचर- रेडियो तथा टेलीविजन समाचारों में भी अब फीचर्स का इस्तेमाल होने लगा है।रेडियो फीचर तो पहले से ही काफी लोकप्रिय था लेकिन अब टेलीविजन समाचार में भी फीचर्स का खूब इस्तेमाल होता है।डिस्कवरी और नेशनल जियोग्राफी चैनल के फीचर्स तो दर्शकों को अंत तक बांधे रखते हैं।

फीचर की रचना और लेखन-

फीचर पत्रकारिता की एक ऐसी विधा है जिसमें लेखन को नियमों से नहीं बांधा जा सकता।विकसित देशों में पत्रकारिता की एक विधा के रूप में फीचर काफी लोकप्रिय है लेकिन,भारत में पत्रकारिता का जन्म और विकास राजनीति के साथ हुआ है।इसीलिए यहां फीचर की विकास यात्रा भी अपेक्षाकृत देर से शुरू हुई।आजादी के बाद के समय से विशेष रूप से आपातकाल के बाद हमारे देश पर फीचर लेखन की विशेष शैली विकसित हुई।

फीचर लिखने का मुख्य नियम यह है कि फीचर आकर्षक,तथ्यात्मक और मनोरंजक होनी चाहिए।आज कम से कम शब्दों में फीचर रचना को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।इसी प्रकार एक विषय पर एक बड़ी रचना के बजाय एक साथ छोटी-छोटी सूचनाओं को प्रस्तुत करके भी फीचर लिखने लगे है।

फीचर लेखन के मुख्य बिंदु-

1. तथ्यों का संग्रह
2. फीचर का उद्देश्य
3. प्रस्तुतिकरण
4. शीर्षक तथा आमुख
5. साज सज्जा आदि।

कॉपी- न्यूज़ डेस्क पर संपादन के लिए आने वाली सभी प्रकार की लिखित सामग्री जो कि विभिन्न स्रोतों जैसे न्यूज़ ब्यूरो,एजेंसी रिपोर्टर या संवाददाता अथवा विभिन्न संगठनों के प्रेस विज्ञप्ति यों के रूप में आती है कॉपी कहलाती है।यह कॉपी अपने मूल रूप से कंप्यूटर पर स्थानांतरित कर दी जाती है जहां पर सब एडिटर या उप संपादक उसका संपादन करता है।ये प्रक्रिया कॉपीएडिटिंग कहलाती है।

टीवी कार्यक्रम के लिए संपादन (Editing for tv programme)

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एडिटिंग एक ऐसी क्रिया है जिसमें रिकॉर्ड किए गए ऑडियो विसुअल को सुव्यवस्थित और तर्कसंगत रूप से क्रमबद्ध किया जाता है।इसके बाद दृश्यों और ध्वनियों को समायोजित किया जाता है।पहले के जमाने में रेडियो और टीवी कार्यक्रमों को क्रमबद्ध ढंग से रिकॉर्डिंग किया जाना बहुत जरूरी होता था लेकिन आज के समय में रिकॉर्डिंग के दौरान वीडियो शॉट्स और ध्वनियों को एक ही क्रम में रिकॉर्ड किया जाना जरूरी नहीं है।एडिटिंग किसी भी प्रोड्यूसर को इस बात की पूरी स्वतंत्रता देती है कि वह किसी भी क्रम शूटिंग या रिकॉर्डिंग कर ले और बाद में सभी ऑडियो विसुअल को इस तरह से सुव्यवस्थित करें कि उसका मैसेज और उद्देश्य दोनों पूर्ण हो जाए।और जो निर्माता इसमें पारंगत होता है वह एक सफल एडिटर होता है।

संपादन के लिए दिशानिर्देश

1. एडिटिंग से पहले ऑडियो और विसुअल को अच्छी प्रकार से देखना और सुनना चाहिए यह प्रक्रिया जितना अधिक बार होगी एडिटिंग उतना ही परफेक्ट होगी।

2. एक टेबल बनाकर उसमें रिकॉर्ड किए गए साउंड और वीडियो शॉट का पूरा विवरण लिया गया हो।इसमें मुख्य रूप से किसी भी शार्ट या ध्वनि के बारे में पूरा वितरण दिया जाना चाहिए कि वह दृश्य ध्वनि कितने समय की है? किस प्रकार की है? इसकी क्वालिटी कैसी है।यह सारी चीजें टेबल में शामिल कर लेनी चाहिए ताकि जब आप एडिटिंग करें तब आपको दृश्य और ध्वनियों को जोड़ते वक्त परेशानी ना हो।

3. पूरे ऑडियो और विसुअल को अच्छी तरह से देखने के बाद संबंधित व्यक्तियों से उस पर विमर्श करें इस दौरान कार्यक्रम के केंद्र बिंदु उसके उद्देश्य तथा उसमें किस प्रकार का साउंड इफेक्ट है।म्यूजिक डाला जा सकता है इस बात का संपूर्ण ढांचा कार्यक्रम के आरंभ से अंत तक का तैयार कर देना चाहिए।

4. एडिटिंग से पहले ही यह निश्चित कर ले कि कौन-कौन से दृश्य प्रोग्राम में शामिल किए जाने है।कौन सा दृश्य महत्वपूर्ण है और कौन से काम का नहीं है या पहले से ही निर्धारित होने पर एडिटिंग के वक्त में परेशानी नहीं होगी

टीवी समाचार निर्माण (Televisions news productions)

टेलीविजन न्यूज़ प्रोडक्शन की पूरी प्रक्रिया एक टीम वर्क है।इस टीमों में रिपोर्टर,एंकर्स के अलावा कार्पोरेट ऑफिस में बैठे अन्य मीडियाकर्मी भी सहयोग करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ प्रोडक्शन से जुड़ी टीम को दो भागों में बांटा जा सकता है-

1. इनपुट
2.आउटपुट

1. इनपुट-इस प्रभाग द्वारा समाचारों का संकलन किया जाता है।

2. आउट पुट में कई लोगों की टीम काम करती है।

एडिटर इन चीफ
मैनेजिंग एडिटर
डिप्टी मैनेजिंग एडिटर
सीनियर एक्सक्लूसिव प्रोडूसर
एग्जेक्युटिव प्रोड्यूसर
डिप्टी एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर
एसोसिएट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर
सीनियर प्रोड्यूसर
प्रोड्यूसर
डिप्टी प्रोड्यूसर
एसोसिएट प्रोड्यूसर

एडिटर- एडिटर न्यूज बुलिटिन तैयार करने वाली टीम का हेड रोता है न्यूज़ एडिटर स्क्रिप्ट को इस प्रकार से एडिट करता है कि विजुअल और स्क्रिप्ट के बीच कोऑर्डिनेशन रहे। एक अच्छे एडिटर के लिए यह जरूरी है कि उसको टीवी समाचार बुलेटिन के समाचार प्रेजेंटेशन पूरी जानकारी हो उसे यह मालूम हो कि समाचारों को विश्वास को माध्यम से कैसे ज्यादा इफेक्टिव बनाया जा सकता है।एक एडिटर ही समाचारों का ब्लू प्रिंट तैयार करता है।

प्रोड्यूसर- टीवी का समाचार अखबारों की तुलना में ज्यादा कठिन है अखबारों में डायरेक्टर के प्रोड्यूसर जैसे कोई पद नहीं है लेकिन टीवी में न्यूज़ प्रोड्यूसर डायरेक्टर एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है।उसे न्यू शो के जहाज का कैप्टन भी कहा जाता है क्योंकि किसी भी लाइव शो में आने वाली जानकारी के निश्चित श्रोत उसके ही इशारों पर काम करते हैं।प्रोड्यूसर कार्यों एवं दायित्वों के अनुसार कई प्रकार के होते हैं-

1. बुलेटिन प्रोड्यूसर
2.पैनल प्रोड्यूसर
3. पैकेज प्रोडूसर

एंकर – टीवी बुलेटिन का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति एंकर होता है।एंकर विभिन्न रिपोर्टर्स की तैयारी की हुई रिपोर्ट को दर्शकों के सामने पर्दे पर प्रस्तुत करते हैं।एंकर को घटनास्थल पर मौजूद किसी रिपोर्टर,प्रत्यक्षदर्शी संबंधित व्यक्ति का लाइव साक्षात्कार भी करना होता है।

प्रस्तुति सहायक- बुलेटिन में सहायक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ये एडिटर और एंकर के साथ मिलकर प्रेजेंटेशन की रूपरेखा तैयार करते हैं।बुलेटिन में तैयार की जाने वाली न्यूज़ और सभी का ब्यौरा रखते हैं।इनके लिए भी पत्रकारिता और प्रस्तुतीकरण का ज्ञान होना आवश्यक है।

संपादकीय सहायक- विभिन्न समाचारों का अनुवाद करने तथा बाहर से आने वाले रिपोर्टस को देखने,उनका विवरण एडिटर तक पहुंचाने के अलावा अन्य प्रकार की सामग्री प्रस्तुतकर्ता से प्राप्त कर एडिटर को पहुंचाते हैं।

कैमरा पर्सन- कैमरा पर्सन वीडियो जर्नलिस्ट।अखबारों में फोटोग्राफर सिर्फ स्टील फोटोग्राफी करते है।उन्हें ने घटनास्थल पर चल रही तकरार वाद-विवाद या साक्षात्कार से कोई लेना देना नहीं होता।लेकिन टीवी न्यूज़ में कैमरा पर्सन की भूमिका अलग होती है उसे घटनाओं को रिकॉर्ड करना पड़ता है और कई बार तो उसे रिपोर्टिंग तक करनी पड़ती है कभी-कभी घटनास्थल पर खुद एडिटर भी होता है और डायरेक्टर भी वह खुद ही निर्णय लेता है कि किस चीज को एडिट करना है और किस चीज को रिकॉर्ड नही करना है।

वीडियो एडिटर- कैमरा पर्सन जिन गतिविधियों को कैमरे में कैद करता है। वीडियो एडिटर उसे न्यूज़ एडिटर,रिपोर्टर और एंकर के निर्देश अनुसार एक हम एडिट कर विसुअल और ऑडियो सेट करता है।चुकी आजकल वीडियो editing techniques बहुत आसान हो गई है इसलिए रिपोर्टर,एंकर भी खुद से ही वीडियो एडिटिंग करने लगे हैं।

ग्राफ़िक्स आर्टिस्ट- समाचार पत्र में चित्र,नक्से,चार्ट और नाम पट्टिका बनाने के लिए कुछ आर्टिस्ट काम करते हैं इसके अलावा कुछ ऐसी घटनाएं होने पर जिनकी विजुअल से फोटोग्राफ्स उपलब्ध करने हो तो उन घटनाओं को graphics और पिक्टोरियल प्रेजेंटेशन के माध्यम से दिखाया जाता है यह सारा काम आर्टिस्ट या ग्राफिक आर्टिस्ट का होता है इसके लिए अलग-अलग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है।इन सब लोगों के अलावा समाचार चैनल में ट्रांसलेटर पर्दे के पीछे रिकॉर्डिंग तथा डबिंग करने वाले आर्टिस्ट,वीओ आर्टिस्ट तथा संबंधित लोगों तक जानकारी पहुंचाने के लिए मैसेंजर या प्यून भी रखे जाते हैं।।

न्यूज़ स्टूडियो- समाचार कक्ष का सबसे महत्वपूर्ण अंग न्यूज़ स्टुडियो होता है इसे ब्रॉडकास्टिंग रूम भी कहते हैं।न्यूज़ स्टूडियो में केवल एंकर ही नहीं होता। छायाकार,फ्लोर मैनेजर,मंच सहायक,डॉली मैन मौजूद रहते हैं।

स्टूडियो- स्टूडियो एक एयर कंडीशन रूम होता है।आमतौर पर स्टूडियो में तीन चार कैमरे लगाए जाते हैं जिनका इस्तेमाल समाचार वाचको को दिखाने के अलावा स्टूडियो में पैनल डिस्कशन के लिए आने वाले विशेषज्ञ और दर्शकों को दिखाने के लिए किया जाता है इन्हें ऑपरेट करने वाले कैमरामैन, एंकर या निर्देशक की कहने के अनुसार शार्ट देते हैं।हालांकि अब नई तकनीक के आने से स्टूडियो में कैमरामैन के रहना भी बीते समय की कहानी बन जाएगा क्योंकि रोबोटिक्स कैमरों के चलन से दूर बैठकर भी मन चाहे शॉर्ट्स लिए जा सकेंगे।

O B van (outdoor bradcasting van)

OC (ON CAMERA)

COLOR BAR- टीवी कार्यक्रम प्रोडक्शन में पर्दे के ऊपर नीचे सीधी खड़ी अलग-अलग रंग की पट्टियां जो प्रायोगिक संकेतों के रूप में कार्य करती है

Clousp- सर से सीने तक शॉर्ट
Close- किसी स्टोरी का अंतिम शार्ट
कवाटर कैम- एक चौथाई इंच के वीडियो टेप रिकॉर्डिंग करने वाले कैमरे
Q light- कैमरे के ऊपर लाल रंग की छोटी लाइट जिसके जलने पर एंकर को पता चल जाता है कि कैमरा लाइव है

FX- साउंड इफ़ेक्ट के लिए उपयोग होने वाला संक्षिप्त शब्द है

ENG (Electronic News Gathering)
SNG (Satelight News Gathering)
LS (Long Short)
SOT (Sound on Tap)
NTSC (National Television standard commety)


फ्लोर मैनेजर- समाचार को प्रसारित करने वाले स्टुडियो का कुछ भाग पीछे होता है और कुछ भाग टीवी पर दिखाई देता है।स्टूडियो का जितना भाग टीवी पर दिखाई जाता है उसे फ्लोर या मंच कहते हैं।और इसका प्रबंध करने वाले व्यक्ति को मंच सहायक या फ्लोर मैनेजर कहते हैं।क्योंकि स्टुडियो में बात करना मना होता है इसलिए फ्लोर मैनेजर कुछ निर्धारित संकेतों के माध्यम से निर्देशक या प्रस्तुतकर्ता के निर्देश समाचार वाचक तक पहुंचाता है वही समाचार प्रस्तुतकर्ता से निर्देश प्राप्त करने के लिए अपने कान से एक हेडफोन लगा रहता है इसके अलावा फ्लोर मैनेजर मंच पर चलने वाली सभी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होता है।

वर्चुअल स्टूडियो-भारत में इस तकनीक का प्रयोग 1999 में दूरदर्शन में पहली बार किया गया।इस तकनीक की विशेषता यह है कि वास्तविकता में स्टुडियो में बैठे व्यक्ति के पीछे एक सादा बैकग्राउंड होता है लेकिन दर्शकों को ऐसा आभास होता है कि प्रतिभागियों के पीछे एक विशाल सेटअप लगा हुआ है जिसमें कई सारी टीवी सेट शामिल है। इस तकनीकों को कंप्यूटर की मदद से रोज नए आयाम दिए जाते हैं इससे एक फायदा यह भी है कि भारी भरकम सेट लगाने के कारण मानव शक्ति अनावश्यक पैसा खर्च नहीं होता।

मेकअप- स्टूडियो में कैमरे के सामने आने से पहले मेकअप बहुत जरूरी है क्योंकि यदि बिना मेकअप के कैमरा फेश किया जाएगा तो कैमरे की लाइटिंग के कारण वह भद्दा दिखेगा।क्योंकि टीवी का कैमरा बहुत हाई डेफिनेशन कैमरा होता है और चेहरे के छोटे-छोटे दाग धब्बों को भी उभार देते हैं इसी कमी को दूर करने के लिए हर चैनल में एक मेकअप आर्टिस्ट और एक मेकअप मैन होता है।न्यूज़ एंकर को हमेशा भारी-भरकम मेकअप में रहना चाहिए।

वीडियो लाइब्रेरी- वीडियो लाइब्रेरी में विभिन्न प्रकार की वीडियो कैसेट्स रखे जाते हैं जिसमें महत्वपूर्ण लोगों की पुरानी विसुअल, घटना,मुकदमा, स्थानों, खेलो,अंतरराष्ट्रीय आयोजनों तथा मुख्य और शांति समझौते पर प्रसारित की जा चुकी या प्रसारित ना हो उसे की घटनाओं को संग्रहित किया जाता है ताकि बाद में आवश्यकता पड़ने पर उनका प्रयोग किया जा सके जब भी ऐसा किया जाता है तो विसुअल पर फाइल लाइब्रेरी लिख दिया जाता है ताकि दर्शकों में भ्रम ना पैदा हो।

प्रोग्राम एडिटिंग- सामान्यतः टीवी पत्रकारिता में वीडियो एडिटिंग की विधियां है-

1. एसेंबल एडिटिंग
2. इंसर्ट एडिटिंग
3. ऑनलाइन एडिटिंग
4. ऑफलाइन
5. नॉन लीनियर एडिटिंग
6. लीनियर एडिटिंग


1. एसेंबल एडिटिंग- पहले वीडियो टेप की एडिटिंग एसेंबल सिस्टम से होती थी जिसमें एडिटिंग करते वक्त वीडियो और ऑडियो साथ-साथ एडिट होते थे जिसमें जब हम वीडियो से फेरबदल करना चाहते थे लेकिन हमारा ऑडियो ठीक होता था वीडियो एडिटिंग के बाद ऑडियो भी बदल जाता था यही इस सिस्टम की सबसे बड़ी कमी थी जो हम नहीं चाहते थे वह भी हो जाता था साथ ही इसमें एक एडिटिंग प्रिंट आउट आउट पर ट्रैक टूट जाता था जिसमें मास्टर टेप में वीडियोजेटर की समस्या आ जाती थी।इसलिए यह पद्धति पूरी तरह से चलन से बाहर हो गई है।

2. इंसर्ट एडिटिंग- यह एडिटिंग की सबसे ज्यादा लोकप्रिय तकनीक है।इसकी गुणवत्ता अच्छी तथा त्वरित संपादन करने हेतु उपयुक्त है।इंसर्ट एडिटिंग में एडिटर को पूरी स्वतंत्रता है कि वह रिकॉर्डिंग के किस अंश में परिवर्तन करना चाहता है तब उस हिस्से के अलावा सामग्री अपरिवर्तित रहेगी।यदि एडिटर दोनों को एक साथ भी एडिट करना चाहते हैं तो वह भी इंसर्ट एडिटिंग में संभव है इंसर्ट एडिटिंग में ट्रैक एक बार कैसेट बन जाने के बाद एडिटिंग में कहीं भी टूटता नहीं है इसी कारण से इंसर्ट एडिटिंग तकनीक में उच्च गुणवत्ता वाली समरसता दृश्य तथा आवाज हमें दिखाई और सुनाई पड़ते हैं।

3. ऑनलाइन एडिटिंग- वीडियो एडिटिंग में जिस वीडियो ट्रैक पर हमें रिकॉर्डिंग करते हैं और एडिटिंग भी उसी वीडियो टेप फॉर्मेट के उपकरणों तथा कैसेट पर करते हैं तो उसे हम ऑनलाइन एडिटिंग कहते हैं।सामान्यतः यह लाइव प्रसारण में किया जाता है।जिसमें वीडियो कैमरे की रिकॉर्डिंग के साथ उसी टाइप फॉर्मेट पर एडिटिंग भी समानांतर हो जाती है और ऑन एयर लाइव टेलीकास्ट दर्शकों तक पहुंचता है।

लीनियर एडिटिंग में कैसेट को फ़ास्ट फारवर्ड, फर्स्ट बैकवर्ड करने से वंचित है उसको ढूंढने में समय की बर्बादी होती है साथ ही बार बार फॉरवर्ड और बैकवर्ड करने से ऑडियो और वीडियो के क्वालिटी भी खराब होती थी जबकि नान लीनीयर एडिटिंग में सारा इंटेंट डीजी साइड फॉर्म के क्रम में अंकों के अनुसार स्टोर रहता है।जिस कारण से वांछित कंटेंट तक जाने के लिए हमें पूरा टेप नहीं देखना पड़ता।नान लीनीयर एडिटिंग में कहानी की आवश्यकता अनुसार तथ्यों को जोड़ना अथवा घटाना या एडिटिंग के दौरान पूरे कंटेंट को करना बहुत आसानी से होता है जो कि लीनियर एडिटिंग में संभव नहीं है।

लाइट अरेंजमेंट- स्टूडियो में लाइट के बगैर शूटिंग संभव नहीं है दिन हो या रात लाइट की जरूरत पड़ती है आउटडोर शूटिंग के दौरान प्राकृतिक लाइट मौजूद रहती है लेकिन सीन के अनुसार लाइट को कम ज्यादा करने के लिए कई उपकरणों के माध्यम से प्रकाश को नियंत्रित किया जाता है। स्टूडियो में मुख्यतः तीन प्रकार की लाइट होती है-

1. कि लाइट -की लाइट ऑब्जेक्ट के सामने रहती है
2. बैक लाइट लाइट – ऑब्जेक्ट के पीछे रहती है
3. फील लाइट- दोनों लाइट का सामंजस्य करती है।दिखता नही सिर्फ फील होता है।

शूटिंग एंगल- हमारी आंख में कौन सी वस्तु,व्यक्ति या दृश्य कैसा नजर आता है यह सभी स्थान पर निर्भर करता है।जहां पर हम उसे देख रहे होते हैं यह शूटिंग एंगल कहलाता है।सड़क पर चलते चलते एक व्यक्ति के लिए ऊंची बिल्डिंग में खड़ी एक लड़की का दृश्य उस लड़की से भिन्न होता है जो सामने से बस स्टॉप पर खड़ी होगी।आंखों के इसी फर्क कौ शूटिंग एंगल कहते हैं।किसी चीज को ऊपर से शूट करने को हाइ टॉप शॉर्ट और नीचे से शूट करने को डाउन या लो एंगल शॉट कहते हैं।सामने से लिए गए शार्ट को फॉन्ट शॉट और अपोज़िट डायरेक्शन से से लिये गए शॉट को रिवलशन शॉट कहते है।

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