डॉ.आनंद बहादुर के गजल संग्रह सीपियाँ का हुआ विमोचन,देश के ख्यातिलब्ध कवि एवं साहित्यकार हुए शामिल

रायपुर MyNews36 – प्रख्यात लेखक व कवि डॉ. आनंद शंकर बहादुर द्वारा लिखित गजल संग्रह “सीपियाँ” का ऑनलाइन विमोचन किया गया।यह कार्यक्रम नॉटनल के फेसबुक पेज पर लाइव प्रसारित किया गया।

इस अवसर पर देश के ख्यातिलब्ध कवि एवं साहित्यकारों ने गज़ल संग्रह सीपियाँ की आधुनिक काव्य में प्रासंगिता पर चर्चा की तथा सामाज में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया।कार्यक्रम की शुरुआत लेखक आनंद बहादुर ने अपनी गजलें सुनाकर की।

”पपीहा इस क़दर प्यासा कहाँ है।
वो प्यासा है, मगर मुझ सा कहाँ है।
मुखौटों के नगर में ढूढ़ता हूं।
जो चेहरा था, मेरा चेहरा कहाँ है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता के रूप में कवि एवं साहित्यकार सत्यनारायण ने कहा कि आनंद बहादुर गजल को समर्पित कवि है।वे चुस्त और सलीके से गजल लिखते हैं और गजल कहते भी हैं। गजल बहुत नाजुक विधा है।मैं उनके रचना कर्म की प्रसंसा करता हूँ।

वरिष्ठ साहित्यकार गौहर रजा ने कहा कि मैं आनंद बहादुर को इस ग़ज़ल संग्रह के लिए बधाई देता हूं। गजल का सफर लंबा सफर है। हमने इसको नया आयाम दिया है। नए तरीके से परखा है। गजल में आज लगभग 52 बहरें हैं। लेकिन 7 बहरें ही प्रमुखता से उपयोग में लाई जाती हैं। गजल के अंदर खूबसूरती होती है।तकनीक और ख़्याल का ध्यान रखते हुए गजल का लेखन करें तो बेहतर होगा।आनंद सहाब ने अपनी गजलों में बड़ी हिम्मत के साथ रदीफ़ और काफिया का इस्तेमाल किया है।मिले जुले अल्फ़ाज़ों का उपयोग किया है, जो दिल को तसल्ली देते हैं।

जया जादवानी ने कहा कि कहते हैं किताब तन्हा भी करती है और तन्हाई से भी बचाती है। गजल शुरू से लोकप्रिय विधा रही है। गजल पढ़ने और सुनने में जितनी सरल दिखती है। लिखने में उतनी ही कठिन है। आनंद बहादुर की गजल संग्रह सीपियाँ बहुत बढ़िया कृति है। उन्होंने सरल भाषा का प्रयोग किया है।बातों को सरलता से समझाने का प्रयास किया है।

प्रभुनारायण वर्मा ने कहा कि शायर के लिए तो पूरी दुनिया है। आनंद बहादुर एक आधुनिक शायर हैं। गजल बहुत नाजुक विधा है। आनंद बहादुर जोखिम उठाते हुए शायरी करते हैं। आनंद की शायरी में पारंपरिक चीज़ बहुत कम है। आनंद बहादुर सुनने व सुनाने वाले शायर ही नहीं पढ़ने वाले शायर भी हैं

युवा शायर मयंक चतुर्वेदी ने कहा कि शब्द, संवेदना और नजरिया ये तीनों चीज़ हमारे लेखन में होनी चाहिए। आनंद जी की गजलों में प्रयोगवादी रवईया दिखाई देता है। गजलों में शब्दों का बेबाकी से प्रयोग किया गया है, जो आम शायर नहीं कर सकता।आनंद जी की गजलों में अगर अंग्रेजी शब्दों का भी उपयोग होगा तो यह आश्चर्य की बात नहीं होगी। वह एक नया प्रयोग होगा। आनंद जी की गजलें सभी वर्गों को साध कर रखती हैं। हर व्यक्ति गजल से जुड़ जाता है।

लेखक डॉ. आनंद शंकर बहादुर ने कहा कि जब हमें कोई रेखांकित करता है तो वह एक सीख बन जाती है।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि महेश वर्मा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन नीलाभ ने किया। कार्यक्रम में साहित्य के कई श्रोतागण भी उपस्थित हुए।

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