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Design and Graphics Notes in Hindi : डिजाइन और ग्राफिक्स नोट्स हिंदी में

Design and Graphics

Unit-1

(Elements of Design and graphics,Visualisation,Convergence and divergence)

डिजाइन (Design)- जब हम पहले से दिए हुए आकृतियों की मदद से कोई आकार बनाते हैं,तो उसे हम आकार या डिज़ाइन कहते हैं।

जैसे- वृत्त, त्रिभुज, वर्ग आदि।

ग्राफ़िक्स (Graphics)- जब हमारे पास व्यक्ति,वस्तु,घटना और स्थिति की मूल तस्वीर नहीं होती है तो हम रेखाओं की मदद से उसका जो चित्र बनाते हैं उसे ही रेखाचित्र या ग्राफिक्स कहते हैं।

ग्राफ़िक्स और डिज़ाइन के मूल तत्व (Basic Elements of Design and graphics)

सुंदर डिजाइन बनाना प्रेरणा या एक महान विचार से अधिक है, यह विषय के मूल सिद्धांतों को समझने के बारे में है। यद्यपि डिजाइन की बारीकियों का अध्ययन करने में वर्षों का खर्च करना संभव है और कई भिन्नताएं इस पर सफल होने के लिए लेती हैं, बुनियादी तत्वों में से एक मुट्ठी भर, या दो हैं, जो किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले हर डिजाइनर को पता होना चाहिए। यहां तक ​​कि क्षेत्र में शौकीन लोग जो व्यक्तिगत ब्लॉग बनाए रखते हैं या केवल इसका शौक रखते हैं, वे पेशेवर दिखने वाले टुकड़ों को बनाने के लिए इन दस युक्तियों का उपयोग कर सकते हैं, और जो कोई भी प्रयास से पैसा कमाने का इरादा रखता है, उन्हें पता होना चाहिए। नियमों को तोड़ने के लिए बनाया गया था, ज़ाहिर है, लेकिन आपको यह जानना होगा कि वे पहले क्या हैं।
1. रेखा (Line) : डिजाइन का पहला और सबसे बुनियादी तत्व लाइन है। ड्राइंग में, एक लिनेन पेन या पेंसिल का स्ट्रोक होता है, लेकिन ग्राफिक डिज़ाइन में, यह किसी भी दो जुड़े हुए बिंदु होते हैं। अंतरिक्ष को विभाजित करने और एक विशिष्ट स्थान पर आंख को आकर्षित करने के लिए लाइनें उपयोगी होती हैं। उदाहरण के लिए, इस बारे में सोचें कि एक पत्रिका अलग सामग्री, हेडलाइंस और साइड पैनल के लिए लाइनों का उपयोग कैसे करती है।
2.रंग (Color): उपयोगकर्ता और डिजाइनर दोनों के लिए रंग डिजाइन के सबसे स्पष्ट तत्वों में से एक है।यह अकेले खड़ा हो सकता है, एक पृष्ठभूमि के रूप में,या अन्य तत्वों पर लागू किया जा सकता है,जैसे लाइनें,आकार,बनावट या टाइपोग्राफी।रंग टुकड़े के भीतर एक मूड बनाता है और ब्रांड के बारे में एक कहानी बताता है।हर रंग कुछ अलग कहता है और संयोजन उस छाप को और बदल सकते हैं।
3. आकृति (Shape) : आकृतियाँ, ज्यामितीय या कार्बनिक,ब्याज जोड़ें।आकृतियों को सीमाओं द्वारा परिभाषित किया जाता है, जैसे कि एक रेखा या रंग, और उन्हें अक्सर पृष्ठ के एक हिस्से पर जोर देने के लिए उपयोग किया जाता है। सब कुछ अंततः एक आकृति है, इसलिए आपको हमेशा इस बात के बारे में सोचना चाहिए कि आपके डिज़ाइन के विभिन्न तत्व किस तरह से आकृतियाँ बना रहे हैं, और उन आकृतियों को कैसे परस्पर क्रिया कर रहे हैं।
4. दूरिया या खाली स्थान (Space) : नकारात्मक स्थान पृष्ठ के लिए डिजाइनिंग के सबसे सामान्य रूप से कम और गलत समझा पहलुओं में से एक है। साइट के कुछ हिस्सों को खाली छोड़ दिया गया है, चाहे वह सफेद हो या कोई अन्य रंग, समग्र छवि बनाने में मदद करता है। किसी अन्य तत्व के रूप में आकृतियाँ बनाने के लिए नकारात्मक स्थान का उपयोग करें।
5. बनावट (Texture) : बनावट के बारे में सोचने के लिए यह सहज है कि जब टुकड़ा कभी छुआ नहीं जाएगा। वेबसाइट और ग्राफिक डिज़ाइन, स्क्रीन पर बनावट के रूप और प्रभाव पर निर्भर करते हैं। बनावट इस द्वि-आयामी सतह पर अधिक त्रि-आयामी उपस्थिति बना सकती है। यह एक अमर दुनिया बनाने में भी मदद करता है।
6. टाइपोग्राफी (Typography) : शायद ग्राफिक और वेब डिज़ाइन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा टाइपोग्राफी है। रंग, बनावट और आकृतियों की तरह, आपके द्वारा उपयोग किए जाने वाले फॉन्ट पाठकों को बताते हैं कि आप एक गंभीर ऑनलाइन समाचार पत्रिका, एक चंचल भोजन ब्लॉग या एक पुरानी चाय की दुकान हैं। शब्द महत्वपूर्ण हैं, लेकिन शब्दों की शैली भी उतनी ही आवश्यक है।
7. स्केल (Scale) : अपनी वस्तुओं, आकृतियों, प्रकार और अन्य तत्वों के पैमाने और आकार के साथ खेलना रुचि और जोर को जोड़ता है। सभी समान आकार (scale) के अवयवों के साथ एक सममित वेबसाइट कितनी उबाऊ होगी? बहुत। लेकिन भिन्नता की मात्रा भीतर की सामग्री पर बहुत अधिक निर्भर करेगी। सूक्ष्म अंतर पेशेवर सामग्री को सूट करता है, जबकि बोल्ड वाले रचनात्मक उद्यमों को पसंद करते हैं।
8. प्रभुत्व और जोर (Dominance and Emphasis) : जब आप एक चीज या किसी अन्य पर जोर देने के बारे में बात कर सकते हैं, तो जोर का तत्व एक वस्तु, रंग या शैली के विपरीत एक दूसरे पर हावी होने के लिए अधिक होता है। कंट्रास्ट पेचीदा है, और यह एक केंद्र बिंदु बनाता है।
9. संतुलन (Balance) : संतुलन के दो स्कूल हैं: समरूपता और विषमता। जबकि अधिकांश डिजाइनर, कलाकार, और रचनात्मक लोग अपनी आंख को पकड़ने वाली प्रकृति के लिए विषमता पसंद करते हैं, समरूपता के लिए अपनी जगह है।
10. सद्भाव (Harmony): हार्मनी “ग्राफिक डिज़ाइन का मुख्य लक्ष्य”, “द एलिमेंट्स ऑफ़ ग्राफिक डिज़ाइन” के लेखक एलेक्स व्हाइट के अनुसार, इसलिए, आप जानते हैं कि यह महत्वपूर्ण होना चाहिए। सद्भाव वह है जो आपको मिलता है जब सभी टुकड़े एक साथ काम करते हैं। कुछ भी सतही नहीं होना चाहिए। महान डिजाइन बस पर्याप्त है और बहुत ज्यादा कभी नहीं। प्रोजेक्ट पूरा होने से पहले सभी विवरण एक दूसरे के साथ सुनिश्चित करें।

Design and Graphics

दृश्य के रूप में सोचना (Visualisation)

जब हम किसी भी कल्पना या विचार के साथ अपने मस्तिष्क में उसका चित्र भी बना लेते हैं तो उसे ही चित्र या दृश्य के रूप में सोचना या विजुलाइजेशंस कहते है।

विज़ुअलाइज़ेशन कैसे अवधारणा डिजाइन को सुविधाजनक बना सकता है।यह इस पर ध्यान केंद्रित करता है कि कैसे डिजाइनर एक विशिष्ट संज्ञानात्मक प्रक्रिया का उपयोग करते हैं, विज़ुअलाइज़ेशन, डिजाइन अवधारणाओं के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। कागज एक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत करता है जो दृश्य प्रक्रिया के प्रकार (स्मृति बनाम कल्पना) और विज़ुअलाइज़ेशन की सामग्री (अंतिम उपयोगकर्ता का समावेश) को डिज़ाइन प्रक्रिया की प्रकृति और डिज़ाइन परिणाम की प्रकृति, अर्थात इसकी मौलिकता, उपयोगिता से जोड़ता है। , और ग्राहक अपील। दो प्रयोग प्रस्तुत किए गए हैं जो प्रस्तावित मॉडल से आने वाले प्रस्तावों का परीक्षण करते हैं। परिणामों से संकेत मिलता है कि डिज़ाइन प्रक्रिया में डिज़ाइनर का अनुभव उत्पाद और सूचना मूल्य को डिजाइन करने में अनुभव की गई कठिनाई के संदर्भ में सुधार करता है, क्योंकि कल्पनाशील विज़ुअलाइज़ेशन का उपयोग किया जाता है, और क्या अंतिम उपयोगकर्ता विज़ुअलाइज़ेशन में शामिल है या नहीं, इसके एक फ़ंक्शन के रूप में। इसके अतिरिक्त, डिजाइनर द्वारा विज़ुअलाइज़ेशन, जिसमें अंतिम उपयोगकर्ता की कल्पना और छवियां दोनों शामिल हैं, डिजाइन में परिणाम जो अंत उपयोगकर्ता द्वारा अधिक उपयोगी माना जाता है। हालाँकि, यह प्रभाव तब महसूस नहीं होता है जब मेमोरी विज़ुअलाइज़ेशन और अंतिम उपयोगकर्ता के चित्र संयुक्त होते हैं। अंत में, और सबसे महत्वपूर्ण, कल्पना-आधारित विज़ुअलाइज़ेशन के साथ संयोजन में अंतिम उपयोगकर्ता की कल्पना ने उन डिजाइनों को जन्म दिया जो ग्राहक को काफी अधिक आकर्षित कर रहे थे।

अभिसारिता या अभिसरण (Convergence) – जब एक ही विषय वस्तु को अनेक माध्यमों में देखा,सुना और पढ़ा जा सके तो उसे अभिसारिता या मीडिया कन्वर्जेंस कहते हैं।

उदाहरण- विभिन्न पत्रकारों द्वारा किसी एक व्यक्ति के भाषण पर केंद्रित होना।

जब बहुत से सूचनाएं,चित्र,ध्वनि विभिन्न माध्यमों से गुजर कर किसी एक निश्चित बिंदु पर एकत्रित होती है,इस क्रिया को अभिसरण कहते हैं।

जब कोई सूचना का स्रोत या सूचना केंद्र से निकलकर बाहर की ओर निकलती है या फैलती है इस क्रिया को अभिसरण कहते हैं।

जब एक की सूचना विभिन्न माध्यमों से हमें प्राप्त होती है तो हमारे लिए अति आवश्यक है जिसे हम अपने आसपास हरदम सुरक्षित रखना चाहते हैं जो लंबे समय तक सुरक्षित रखी जाती है वह सूचना ना तो खराब होती है ना परिवर्तित होती है।इस क्रिया को अभिसरण कहते हैं।पूर्व में इसे मीडिया का कन्वर्जेंस कहते हैं।

उदाहरण- 1. उपग्रह या सेटेलाइट चैनल- जिसके माध्यम से समस्त प्रसारण या संचार के विभिन्न स्रोतों को एक ही समय में कई स्थानों तक विभाजित किया जाता है।

2. क्षेत्रीय केबल- इसके अंतर्गत किसी की स्थान पर एक कंट्रोल रूम बना दिया जाता है जहां से सभी इनपुट डिवाइस जोड़कर सभी कनेक्शन प्रसारण व्यवस्था प्रारंभ हो जाती है।

अभिसरण का महत्व (Important of Convergence)

1. वर्तमान समय में मीडिया के अनेक रुप है।प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज हमारे सामने आ गया है।इन सभी माध्यमों की आवश्यकता अभिसरण के द्वारा पूर्ण होती है।

2. वर्तमान समय में छोटी सी जानकारियां सूचना या फ़िल्म टेलीविजन सहित खेल जगत आदि चीजों को सुरक्षित रखना और ध्वनि और छाया चित्र के माध्यम से इनका उपयोग किया जाता है।उसमें अभिसरण की क्रिया महत्वपूर्ण होती है।

3. पेन ड्राइव या मेमोरी कार्ड की उपयोगिता बहुत बढ़ गई है। 2GB से लेकर 256 GB तक वर्तमान समय में प्रयोग में लाई जा रही है।

4. इसके अलावा किसी कंप्यूटर को कई वर्षों की पुरानी फाइल को एक जगह सुरक्षित रखना हो तो मोबाइल फोन आकार में छोटा होने के साथ सभी डाटा को सुरक्षित रख सकता है।

5. एक हार्ड डिस्क की क्षमता 500GB से लेकर 5000 जीबी तक हो सकती है।

6. समय के साथ-साथ टेक्नोलॉजी के माध्यम से नए माध्यम सामने आ रहे हैं जो मीडिया अभिसरण के काम को आसान बना देते हैं।

7. इंटरनेट सोशल मीडिया का बड़ी से बड़ी फाइल को सुरक्षित रखने के लिए वर्तमान समय में कुछ नए माध्यमों का प्रयोग हो रहा है जैसे- गूगल ड्राइव, सेंडस्पेस,ड्राप बॉक्स आदि।

8. भविष्य में टेक्नोलॉजी के माध्यम निश्चित तौर से हमारे सामने आएंगे ऐसे में वितरण की प्रक्रिया बहुत सरल हो जाएगी

अपसारिता (Divergence)- एक ही जगह से अपने संदेश को अनेक माध्यमों तक पहुंचाना अपसारिता या Divergence कहलाता है।

उदाहरण- किसी एक व्यक्ति द्वारा अपने संदेश को फैलाना।

1. जब भी की सूचनाएं विभिन्न माध्यमों से चाहे वह प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में संचार की कोई भी साधन हो उस माध्यम से देश दुनिया में दिखाई जाने में या बताई जाने वाली सूचनाएं डायवर्जेंस कहलाती है।

2. वास्तव में जो सूचना किसी मेन पावर सप्लाई से निकलकर बाहर की ओर आती है यही डायवर्जेंस है।उदाहरण- किसी भी देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति किसी विशेष समारोह में शामिल होते हैं उनकी रिपोर्टिंग करने के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के अनेक संवाददाता एकत्रित होते हैं यहां से समझना जरूरी है कि कार्यक्रम एक है लेकिन उस कार्यक्रम की रिपोर्टिंग करने के लिए माध्यम अलग-अलग है।माध्यम बदलने के कारण रिपोर्टिंग प्रस्तुतीकरण शैली में अलग-अलग तरह की भिन्नता दिखाई देती है।

3. इसके बावजूद सभी लोग उस एक कार्यक्रम को अलग-अलग ढंग से देखते हैं।

4. अपसारिता (Divergence) का अर्थ यह हुआ कि किसी कार्यक्रम के अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग तरह के रिपोर्टिंग की जाती है।

5. अपसारिता (Divergence) में रिपोर्टिंग का मूल विषय वही होता है प्रस्तुतीकरण का ढंग बदल जाता है।

6. हो सकता है कि अखबार में राष्ट्रपति के जिस बात को पहले लिखा हो उस बात को टीवी रिपोर्टर आखिरी में बताना चाह रहे हो।

निष्कर्ष- ये ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हर माध्यम के पाठक की पसंद अलग अलग होती है और देखने का नजरिया भी अलग अलग होता है यह उदाहरण भी अपसारिता (Divergence) का एक उदाहरण है।

Unit- 2

Conceptualization,Functions and significances, Fundamentals of creativity in art logic,style, value,tools of art, illustration, graphs.

अवधारणा/धारणा/समझ/बोध (Conceptualization)

किसी भी वस्तु,घटना या इस स्थिति को समझने के लिए हम जो भी जानकारी हासिल करते हैं उसे ही अवधारणा/धारणा/समझ या बोध और अंग्रेजी में कांसेप्ट कहते हैं।

उदाहरण- तुलसीदास द्वारा रत्नावली के पास पहुंचने के लिए रस्सी का सहारा लेना।लेकिन वह वास्तव में अजगर था।

अमेरिका की गायिका महिला जिसके पास 6000 करोड़ की संपत्ति थी लेकिन नशे की आदी होने के कारण वह बर्बाद हो गई।

कार्य और महत्व (Functions and significances)

उदाहरण-किताबे- कार्य-शिक्षा, सूचना, मनोरंजन साथ ही हर क्षेत्र का ज्ञान देती है।
पेन,सायकिल,रंग,चित्र

महत्व- 1. जिंदगी भर साथ देती है।
2. नए रास्ते की तस्वीर दिखाती है।

दुनिया मे सभी चीजों का कार्य और महत्व है।

हममें से हर कोई अपने जन्म से लेकर आखिरी सांस तक हर सेकंड केवल धारणा बनाने का काम ही करते रहते है सच तो यह है कि बिना धारणा बनाए हम कुछ नहीं कर सकते। हम अपने जीवन में सुबह से लेकर रात तक जिन लोगों में मिलते हैं और जिन समानों का इस्तेमाल करते हैं।जिन घटनाओं से गुजरते हैं हम उन सभी के प्रति कोई ना कोई धारणा जरूर बनाते हैं।यह धारणा सही और गलत या अच्छी और बुरी हो सकती है लेकिन इसका पता हमें बाद में चलता है।जब धारणा का नतीजा सामने आता है।किसी भी व्यक्ति, वस्तु,घटनाएं व स्थिति के बारे में हम जो भी धारणा बनाते हैं वह हमारे अनुभव के आधार पर बनता है,यदि हमारा अनुभव गलत हो तो हमारी धारणा भी गलत हो जाती है इसलिए कोई भी धारणा बनाने से पहले हमारे पास किसी व्यक्ति, वस्तु,घटना व स्थिति के बारे में सही अनुभव का होना जरूरी है।इसी आधार पर हम सही धारणा बना सकते हैं।

धारणा के कार्य

1. किसी भी व्यक्ति, वस्तु, घटना या स्थिति को समझना।
2. किसी भी व्यक्ति, वस्तु, घटना या स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
3. जानकारी के आधार पर व्यक्ति से व्यवहार करना,वस्तुओं का उपयोग करना तथा घटना और स्थिति से तालमेल करना।
4. अपनी धारणा को लगातार और सही तथा बेहतर बनाए रखना।

धारणा का महत्व

1. व्यक्ति, वस्तु, घटना या स्थिति को समझने का आधार।
2. हमारे कार्य और व्यवहार का सबसे अहम हिस्सा।
3. हमारी हर सफलता और असफलता के पीछे हमारी धारणा ही होती है।
4. जीवन जीने के लिए सबसे ज़रूरी तत्व।
5. हमारी आजीविका का सबसे बड़ा साधन।

कला में रचनात्मकता के बुनियादी सिद्धांत (Fundamentals of creativity in art: logic,style and value)

किसी भी कला में रचनात्मकता या सृजनात्मकता पैदा करने के लिए कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है।इन बातों के बिना कोई भी कला ना तो सुंदर होती है और ना ही पसंद की जाती है।इन बुनियादी तत्वों को ही कला में रचनात्मकता का बुनियादी सिद्धांत कहते हैं।यह सिद्धांत इस प्रकार है-

1. लॉजिक (logic)- तर्क या संतुलन
2. स्टाइल (style)-यानी शैली या विधि
3. वैल्यू (value) – यानी मूल्य या अहमियत


1. संतुलन या तर्क (Logic) – किसी भी कला में निर्माण में संतुलन बहुत महत्वपूर्ण होता है इसके बिना कोई भी कला श्रेष्ठ नहीं बन पाती। सच तो यह है कि संतुलन के कारण ही कला में आने वाले दोष और कमियां भी दूर किया जाता है।

उदाहरण के लिए- यदि किसी देवी देवता की मूर्ति बनाते समय एक तरफ के कान मुड़े हुए हो तो दूसरी तरफ के कान को भी उतना ही गोल और मुड़ा हुआ बनाना पड़ेगा।यदि दुर्गा की प्रतिमा बनाते समय एक तरफ चार हाथ बना रहे हैं तो दूसरी तरफ भी चार हाथ बनाना जरूरी है।हम अपनी मर्जी के एक तरफ पांच और दूसरी तरफ तीन हाथ नहीं बना सकते।किसी कला के संतुलन को परखने के लिए उसमें बीचो-बीच ऑडी और खड़ी काल्पनिक रेखा बनानी पड़ती है।इस काल्पनिक रेखा के चारों तरफ जो भी आकृति बनी है उनमें समानता और समरूपता होनी चाहिए।

उदाहरण के लिए यदि काल्पनिक रेखा के एक तरफ त्रिभुज बना हो तो दूसरी तरफ भी त्रिभुज होना चाहिए और यदि एक तरफ वृत्त बना हो तो दूसरी तरफ भी वृत्त होना चाहिए।

संतुलन का अर्थ है यह भी है कि किसी भी कला के निर्माण के समय उसके सभी कोण और दिशाएं बराबर होनी चाहिए यदि कोई कला विषम आकृति की हो तब भी उसका गुरुत्व केंद्र संतुलित होना चाहिए।कला के साथ-साथ विज्ञान में भी तर्क और संतुलन अनिवार्य होता है चाहे वह हवाई जहाज बनाने में हो या मोटरकार या रेलगाड़ी।

2. शैली या विधि (Style)- हर कला के निर्माण में कोई ना कोई शैली या विधि जरूर होती है जैसे संगीत सीखने की एक विधि है,उसी तरह चित्र बनाने की भी एक निश्चित विधि होती है।इसी प्रकार मूर्ति हो या कोई अन्य कलावस्तु उसे बनाने के लिए हमें एक निश्चित शैली का इस्तेमाल करना पड़ता है।किसी भी कला को देखकर यह समझा जा सकता है कि उसमें कोई ना कोई विधि जरूर होगी, यदि हम किसी कला की विधि को पूरा नहीं तो थोड़ा बहुत ही समझ लेते हैं तो हम उस कला का ज्यादा आनंद ले पाते हैं।

जैसे एक सामान्य व्यक्ति किसी संगीत को सुनकर सामान्य रूप से खुश हो सकता है लेकिन संगीत सीखा हुआ यह संगीत का जानकार व्यक्ति जब उसी गीत को सुनता है तो उसमें सामान्य व्यक्ति से बहुत ज्यादा आनंद ले पाता है।

हर कला की कुछ निश्चित शैलियां होती है जैसे संगीत में हिंदुस्तानी संगीत, शास्त्री संगीत, दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत, सुगम संगीत, लोक संगीत, पाश्चात्य या पश्चिमी संगीत।

इसी तरह नृत्य में भी कुछ प्रमुख सहेलियां इस प्रकार है- कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, कथकली, लोक नृत्य, पाश्चात्य नृत्य

चित्रकला में निम्नलिखित शैलियां चर्चित है-
पारंपरिक चित्रकला,आधुनिक चित्रकला,राजस्थानी चित्रकला,मराठी चित्रकला,लोकशैली आदि।

साहित्य की शैली- कविता/गीत,कहानी, नाटक,उपन्यास ,धारावाहिक फिल्म

इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवन के विभिन्न क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की शैली होती है किसी भी कार्य को सबसे सुंदर ढंग से करने की विधि कला बन जाती है।इस प्रकार हम देखते हैं कि अपने दैनिक जीवन में जो भी काम करते हैं उसका उपयोग तो होता ही है साथ ही उसमें एक सुंदरता भी होती है यही सुंदरता हमारे काम की कला और शैली है।

3. मूल्य, महत्व या अहमियत (Value)- किसी भी कला के निर्माण में यह जरूर देखा जाता है कि उस कला का बाजार में कोई मूल्य कीमत अवश्य हो तभी कोई कलाकार अपनी कला से तैयार वस्तुओं को बेचकर अपने घर का खर्चा चला सकता है। लेकिन यह भी सच है कि कोई भी कला वस्तु जितने मूल्य में बेची जाती है केवल उतना ही उसका मूल्य नहीं होता बल्कि उससे बहुत ज्यादा होता है क्योंकि कलाकार ने उस कला वस्तु को बनाने के लिए अपने जीवन का अनमोल समय खर्च किया है।

उदाहरण के लिए 3 से 4 महीने तक जब तीन या चार कलाकार 8 से 10 घंटे काम करते हैं तब किसी देवी देवता की मूर्ति तैयार हो पाती है लेकिन बाजार में उस मूर्ति को 50000 से ₹100000 के अंतर की कीमत देकर खरीद लिया जाता है इस पैसे से उन तीन चार कलाकारों को 1 महीने का दो- तीन हज़ार रुपये ही पगार मिल पाता है जो कि बहुत कम है इस उदाहरण से हम मूर्तिकला की कीमत और उसके महत्व को समझ सकते हैं।

कला के उपकरण (Tools of Art)

कार्य-
1. माप या नाप को सटीक रखता है।
2. कला वस्तु के निर्माण में संतुलन रखता है।
3. कला वस्तु के निर्माण को सरल बनाता है।
4. कला वस्तु के निर्माण को सुंदर बनाता है।

1. माप या नाप को सटीक बनाता है- किसी भी कला वस्तु को बनाते समय यदि हमारे पास नाप लेने के उपकरण या साधन हो तो हमारे लिए उस कला वस्तु को बनाना सरल हो जाता है इसके अलावा हम अपनी कला वस्तु के हर हिस्से की नाप सटीक रख सकते हैं यदि कोई कला वस्तु नाप में सटीक हो तो उसे दर्शक भी पसंद करते हैं सच तो यह है कि यदि किसी कला वस्तु को बनाते समय उसके सभी हिस्से की नाप सटीक ना हो तो उसे कला वस्तु भी नहीं माना जा सकता तब वह सिर्फ एक सामान्य वस्तु बनकर रह जाती है।

2. संतुलन रखता है- कला वस्तु के निर्माण में हमें इस बात का ध्यान हमेशा रखना पड़ता है कि कला वस्तु चाहे किसी भी प्रकार की हो उसके बीचो-बीच ऑडी और खड़ी काल्पनिक रेखा खींचकर संतुलन के लिए एक आधार बनाया जाता है।इस काल्पनिक रेखा के चारों तरफ जो भी आकृति बनाई जाती है उसमें इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि संतुलन कायम रहे। सच्चाई यह है कि संतुलन के बिना कोई भी कला वस्तु आकर्षक नहीं बन पाती इस संतुलन के लिए स्केल और धागे सहित अन्य उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

3. सरल बनाता है- कला वस्तु के निर्माण में हम जिन उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं उनके सहारे कला वस्तु को बनाना बहुत सरल हो जाता है यदि यह उपकरण हमारे पास ना हो तो कला वस्तु का निर्माण करना बहुत कठिन हो जाएगा।साथ ही उसमें संतुलन और आकर्षण भी बहुत अच्छी तरह से नहीं दिखाई देगा।उपकरण हमें इसी बात की मदद करता है कि इसकी सहायता से हमें गोल,त्रिभुज,वर्ग,आयत,शंकु और बेलन जैसी अनेक आकृतियां सटीक नाप के आधार पर कला वस्तु का निर्माण भी बहुत कम समय में और काफी सरलता से किया जा सकता है।

4. सुंदर बनाता है- चूंकि उपकरणों की मदद से जब हम किसी कला वस्तु का निर्माण करते हैं तो इसलिए उसका आकार और नाप हर दिशा से समरूप और समान होता है इसी समरूपता और समानता के कारण कला वस्तु में सुंदरता आती है इसके अलावा विभिन्न उपकरणों और साधनों की मदद से कला वस्तु के निर्माण को और अधिक सुंदर बनाया जा सकता है।ये उपकरण किसी कला वस्तु के आकार और प्रकार के आधार पर चुने जाते हैं।

निष्कर्ष- इस तरह हम देखते हैं कि कला वस्तु के निर्माण में विभिन्न उपकरणों और साधनों का उपयोग कितना अनिवार्य हो गया है कुछ वर्षों पहले जब इतने अधिक अवजार और उपकरण उपलब्ध नहीं होते थे तब छोटी से छोटी कला वस्तु को बनाने में महीनों और कुछ सालों का समय लग जाता था लेकिन अब जो निर्माण कार्य कई महीनों में होता था वह उपकरणों और साधनों की मदद से कुछ घंटों में ही बन जाता है।इस तरह यह निश्चित है कि कला वस्तु के निर्माण में उपकरणों और साधनों की बहुत विशेष भूमिका होती है।

रेखांकन (illustration)

रेखांकन क्या है ?

“किसी भी व्यक्ति,वस्तु,जीव-जंतु या अन्य सामग्री का मूल चित्र जब हम इस्तेमाल नहीं करते और केवल रेखाओं की मदद से उसका प्रतीक बना देते हैं तो इस प्रतीक को ही रेखांकन या अंग्रेजी में illustration कहते हैं।”

यह प्रतीक रेखाचित्र ग्राफिक्स नहीं होता क्योंकि इसमें केवल चित्र का संकेत होता है पूरा चित्र नहीं होता जबकि रेखा चित्र में पूरा चेहरा यानी आंख,कान बनाने पड़ते हैं।

रेखांकन का उपयोग

आमतौर पर कार्टून या पाठ्यपुस्तकों में विषय से संबंधित चित्रों के लिए रेखांकन बहुत काम आता है इसी तरह कविता,शायरी,उपन्यास की पुस्तकों में भी कुछ पात्रों के प्रतिक को दिखाने के लिए रेखांकन किया जाता है।

रेखांकन का महत्व

रेखांकन को मीडिया और साहित्य के विभिन्न कार्यों में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है हम देखते हैं कि कई बार मीडिया और साहित्य के कुछ विशेष लेखन में कोई चित्र शामिल करना ज्यादा प्रभाव नहीं पैदा करता लेकिन इसके बदले यदि कोई रेखांकन उस लेख के साथ शामिल कर लिया जाए तो वह पाठक को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब हम किसी लेख की तस्वीर को ही ले लेते हैं उसमें पाठक को कोई कोतुहल या हैरानी पैदा नहीं होती लेकिन रेखांकन करते समय क्योंकि केवल संबंधित व्यक्ति या वस्तु का केवल प्रतिक ही बनाया जाता है इसलिए उसे देखकर हमारे मन में हैरानी जरूर पैदा होती है और इसलिए हम उसे चित्र की तुलना में ज्यादा ध्यान से देखते हैं।

चुकी रेखांकन को बनाने के लिए कम से कम रेखाओं का इस्तेमाल किया जाता है इसीलिए वह ज्यादा ध्यान खींचता है हम सभी के मन में यह बात होती है कि यदि कोई व्यक्ति हमारे सामने अपनी किसी भी प्रतिभा या कला को ज्यादा से ज्यादा दिखाने की कोशिश करें तो हम एक समय के बाद उस पर ध्यान देना बंद कर देते हैं लेकिन यदि कोई कलाकार बहुत तरह की प्रतिभाएं रखने के बावजूद केवल थोड़ा बहुत ही प्रदर्शित करें तो हम ऐसे कलाकार को ज्यादा पसंद करते हैं और उसे ज्यादा ध्यान से देखते हैं।रेखांकन के साथ भी यही नियम लागू होता है जितनी कम रेखाओं का इस्तेमाल होगा उस रेखांकन पर दर्शक का उतने ही ज्यादा ध्यान जाएगा।

ग्राफ (graph)

पत्रकारिता में हमें बहुत से विषयों का अध्ययन करना पड़ता है इस दौरान हम विभिन्न प्रकार के आंकड़ों का विश्लेषण करके किसी विषय को समझने का प्रयास करते हैं इस विश्लेषण के कई तरीके हैं कभी तालिका बनाकर तो कभी चित्र बनाकर विश्लेषण किया जाता है इसी तरह ग्राफ का इस्तेमाल भी किसी विषय के विश्लेषण के लिए किया जाता है ग्राफ की मदद से हम दो तरह के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।

इस आधार पर हम यह समझ सकते हैं कि किसी विषय या घटना के उतार-चढ़ाव कैसे हो रहा है। उदाहरण के लिए व्यापार से संबंधित समाचारों में हम देखते हैं कि शेयर मार्केट में उतार-चढ़ाव सोने चांदी की कीमत में बदलाव का समाचार ग्राफ के साथ छापा जाता है इसी तरह त्यौहार के समय मोटरसाइकिल कार और अन्य उपकरणों की बिक्री का समाचार भी तेज हो जाता है लोग बड़ी संख्या में खरीदारी करते हैं इसलिए मीडिया में ऐसा लिखा जाता है कि त्योहारों के कारण विभिन्न सामानों की बिक्री बढ़ी या बिक्री का ग्राफ ऊपर उठा ग्राफ का बढ़ना सफलता का संकेत है इस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्राफ का इस्तेमाल और ग्राफ शब्द का इस्तेमाल सफलता और विधि को दर्शाने के लिए किया जाता है।

Unit-3

(Basic Elements and principles of graphics ,Design lay-out and production; Principal of good Typography:spacing, Measurements,Point system)

ग्राफ़िक्स के सिद्धांत (Basic Elements and principles of graphics)-

ग्राफिक्स को बनाने के लिए हमें कुछ निश्चित नियमों का पालन करना पड़ता है तभी हम ग्राफिक्स का अधिकतम उपयोग और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पाते हैं इन नियमों को ही ग्राफिस के सिद्धांत कहते हैं जो कि इस प्रकार है-

1. लय (Harmony)
2. संतुलन (Balance)
3. विरोधाभास (Contrast)
4. अनुपात (Prapotion)
5. रंग संयोजन (color balance combination)
6. तालमेल (Coordination)


1. लय (Harmony)- ग्राफिक्स को बनाते समय हम विभिन्न जानकारियों को अपनी सुविधा के अनुसार खड़ी और आड़ी लाइन में देखते हैं इन जानकारियों के आधार पर हम एक खंड के लिए हम एक बिंदु बनाते हैं फिर उन बिंदुओं को रेखा की मदद से जोड़ देते हैं विभिन्न बिंदुओं से बनाई गई रेखा में एक निश्चित है हमें दिखाई देती है इस तरह हम कोई रेखाचित्र बनाते हैं।तो उसमें भी हमें चेहरा,आंख,पैर या किसी घटना का रेखा चित्र बनाते समय वहां के विवरण को इस सरलता से दिखाना होता है कि उसके सभी हिस्सों में एक लय बनी रहे यदि ऐसा नहीं होगा तो ग्राफिक्स को देखने से उसमें कोई अर्थ स्पष्ट नहीं होगा।

2. संतुलन (Balance)- रेखा चित्र बनाते समय हमें उसके बीचो बीच एक खड़ी काल्पनिक रेखा बनानी पड़ती है और सही आकृतियां इस काल्पनिक रेखा के दोनों और एक समान होनी चाहिए तभी इसे संतुलित रेखाचित्र कहा जाएगा

3. विरोधाभास (Contrast)- रेखा चित्र को देखते समय कई बार हमें लंबाई चौड़ाई के साथ मोटाई का भी एहसास होता है इस प्रकार जो विवरण या जानकारी उस चित्र में होती है उसे भी हमें रेखा चित्र में दिखाना पड़ता है जबकि रेखा चित्र केवल के शम होता है अर्थात उसमें केवल लंबाई और चौड़ाई होती है इस तरह हम केवल कुछ रेखाओं की मदद से उसकी गहराइयां,मोटाई भी दिखा देते हैं यही विरोधाभास है।

4. अनुपात (Prapotion)- रेखा चित्र बनाते समय हम उसके बीचो बीच एक खड़ी और आड़ी काल्पनिक रेखा बनाते हैं यह रेखा भले ही कहीं दिखाई ना दे लेकिन हमारे दिमाग में जरूर बनी रहती है।इस आड़ी और खड़ी रेखा के बीच में हम किसी भी रेखा चित्र को चार भागों में देख सकते हैं ।अब आजू-बाजू के दोनों भाग यदि एक समान दिखाई दे तो हम यह कह सकते हैं कि इस रेखा चित्र में अनुपात बराबर है।रेखा चित्र को सही तभी माना जाएगा जब उसके सभी हिस्सों में एक निश्चित अनुपात होगा।

5. रंग संयोजन (color balance combination)- यूं तो रेखा चित्र ज्यादातर एक ही रंग से बनाया जाता है जैसे सामान्य भाषा में ब्लैक एंड वाइट कहते हैं लेकिन कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर हम रंगीन रेखाचित्र भी बनाते हैं इसमें उजाले और गहरे हिस्से को दिखाने के लिए अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।उजाले हिस्से के लिए फीका रंग और गहरे हिस्से के लिए गाढ़ा रंग लगाया जाता है लेकिन जहां दोनों रंग मिलते हैं या दोनों रंग जहा जुड़ते हैं वहाँ रंगों का बदलाव इतनी सफाई से होना चाहिए कि अंतर पता ही ना चल सके इसे ही रंग संयोजन कहते हैं।

6. तालमेल (Coordination)- रेखा चित्र बनाते समय उसके विभिन्न हिस्सों का आकार इस तरह होना चाहिए कि उनमें एक तालमेल या समन्वय दिखाई दे जैसे दोनों आंखें,दोनों हाथ,दोनों कंधे,दोनों कान और दोनों पैर आपस में एक समान होने चाहिए।ऐसा होने पर हम कह सकते हैं कि इस रेखा चित्र में तालमेल पूरी तरह से सही है।

निष्कर्ष- रेखा चित्र को बनाने में हमें विभिन्न बातों का ध्यान रखना पड़ता है सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जिस व्यक्ति या घटना को रेखाचित्र के जरिए दिखाना चाहते हैं,वह ठीक तरह से दिखाई दे इसलिए रेखाचित्र के कुछ सिद्धांत बनाए गए हैं।इन सिद्धांतों का पालन करने से हम रेखाचित्र का बहुत देर से भी हासिल कर सकते हैं जिसके लिए हमने उसे बनाया है।

आकर/आकृति रूपरेखा और प्रस्तुति (Design Layout and Productions)

“कम जगह का सबसे अच्छा इस्तेमाल लेआउट या रूपरेखा कहलाता है।”

किसी भी कार्य को करने से पहले उसकी रूपरेखा या लेआउट बनाना जरूरी होता है चाहे वह मकान हो,चाहे मंदिर या कोई सामान या कोई कला।उसके निर्माण से पहले रूपरेखा बनाने से हम निश्चित हो जाते हैं कि हमें किस काम को कहां पर और कैसे शुरू करना है।किसी भी निर्माण में शुरू और अंत का पता होना बहुत आवश्यक है।इसके बाद शुरू और अंत के बीच में क्या-क्या काम और करने होते हैं यह भी रूपरेखा में भी मालूम होता है।रूपरेखा बनाने के लिए सबसे पहले हमें किसी भी निर्माण का बाहरी रूप बनाना पड़ता है इसके बाद इस बाहरी रूप के अंदर की जानकारी को रेखाओं की मदद से दिखाया जाता है।

जैसे किसी मकान को बनाने के लिए सबसे पहले उसके बाहरी क्षेत्रफल को लंबाई और चौड़ाई की रेखा खींच कर दिखाया जाता है इससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी जमीन कहां से कहां तक है।लंबाई और चौड़ाई की रेखा बनाने को सरकारी भाषा में सीमांकन कहते हैं।यह दो शब्दों से मिलकर बना है सीमा + अंकन यानी सीमा पर रेखा खींचना सीमांकन या बाहरी रूप बन जाने के बाद हम अपनी जमीन के भीतर की जानकारी को रेखाओं की मदद से दिखाते हैं जैसे बैठक का कमरा कितना बड़ा होगा।सीढ़ी कहां बनेगी और रसोईघर या शौचालय कहां बनेगा और कितना बड़ा होगा बैठक का कहां होगा और कितना बड़ा होगा।इसके अलावा सभी कमरों में दरवाजे खिड़कियां कहां कहां लगेगी यह तो घर की रूपरेखा है इसी तरह किसी कलावस्तु के निर्माण के लिए भी रूपरेखा बनाने की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए- गणेश और दुर्गा की मूर्तियां बनाने वाले कलाकार के काम काज को समझा जा सकता है।

लेआउट या बाहरी रूपरेखा बनाने के बाद हमें किसी भी वस्तु या कला वस्तु या किसी इमारत को बनाने से पहले उसकी छोटी आकृति कागज पर बनानी पड़ती है।जिसमें आकृति के भीतर की हर जानकारी को सही नाप के अनुसार दिखाया जाता है।

उदाहरण के लिए हमने किसी आवासीय या आवासीय बस्ती की रूपरेखा में 50 मकानों को छोटे-छोटे डिब्बों वर्ग के आकार में बनाया है तो हर वर्ग के अंदर जो मकान बनाया जाना है उसकी आकृति और आकार को विस्तार बनाना होता है इस आकार या आकृति को देखकर ही इंजीनियर मकान का वास्तविक रूप में निर्माण करता है।

निर्माण या रचना (Deaign production)- लेआउट और डिजाइन बनाने के बाद हम जिस वस्तु या कला वस्तु का निर्माण करना चाहते हैं उसकी पूरी रूपरेखा हमारे दिमाग में पहले से ही बन जाती है। दिमाग में बनी हुई इस रूपरेखा की मदद से ही हम उस वस्तु या कला वस्तु का अपनी इच्छा के अनुसार बना पाते हैं।

उदाहरण के लिए- यदि हमें मिट्टी के दीपक बनाना हो तो उस दिए को बनाने से पहले ही हम उसका कल्पना कर लेते हैं।इस कल्पना में हम दिए की मोटाई, गोलाई और ऊंचाई तीनों तय कर लेते हैं और फिर उसी कल्पना के आधार पर हम दिया बनाते हैं।यही बात मिट्टी का खिलौने और मूर्तियां बनाने पर भी लागू होती है।इसी तरह मोटरसाइकिल,कार और अन्य सभी मशीनों को बनाने से पहले उसकी रूपरेखा बनाई जाती है और मोटरसाइकिल,कार या सभी मशीनों में लगने वाले सामानों का खाँचा बनाया जाता है।इसी आधार पर उन मशीनों को तैयार किया जाता है।

निष्कर्ष- रूपरेखा और नक्शे के आधार पर जब कोई निर्माण किया जाता है तो वह हमारी कल्पना के अनुसार ही होता है लेकिन,यह भी सच है कि हर बार हम अपनी कल्पना के अनुसार जैसा निर्माण चाहते हैं वैसा नहीं हो पाता, क्योंकि कई बार साधन कम होते हैं तो कभी तकनीकी रूप से हमारी कल्पना सही नहीं रह पाती।लेकिन,तब भी हर निर्माण से पहले कल्पना करना या रूपरेखा बनाना जरूरी होता है।

टाइपोग्राफी (Typography)

जब किसी भी विषय की जानकारी कागज या कंप्यूटर पर लिखने के लिए अक्षरों और मात्राओं को कलम या चाक या कीबोर्ड की मदद से लिखा जाता है इस कार्य को मुद्रण कहते हैं।

आज से हजारों साल पहले वैदिक काल में भोजपत्र पर मोर पंख के नुकीले हिस्से से अक्षरों का मुद्रण किया जाता था।बाद में पत्थरों पर नुकीले पत्थर या अवजारों से खोद कर या खरोच कर अक्षरों को लिखा जाता था।उसके बाद तांबे की पट्टी का भी अक्षरों से मुद्रण और लेखन का दौर आया।इस तरह हम देखते हैं कि टाइपोग्राफी अक्षरों को मुद्रित करने या लिखने की कला बहुत पुरानी है।टाइपोग्राफी के कुछ निश्चित सिद्धांत है जिसका पालन करके मुद्रण या लेखन कला बहुत अच्छी तरह से दिखाई देती है।इन सिद्धांतों का पालन करने से लिखे हुए अक्षरों को पढ़ना भी आसान होता है।

1. अंतराल/खाली जगह (Spacing) – दो अक्षरों को लिखते समय इनकी बीच में कोई जगह नहीं छोड़ी जाती लेकिन दो शब्दों को लिखते समय छोटी सी खाली जगह जरूर छोड़ी जाती है इस खाली जगह को अंतराल कहते हैं।

अंतरिक्ष में भी हमारी आंख और चांद सितारों के बीच बहुत बड़ी अंतराल है इस अंतराल की वजह से ही हम किसी व्यक्ति या वस्तु को देख सकते हैं।

2. नाप या माप (Measurment) – किसी भी अक्षर को लिखते या मुद्रित करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होता है कि इसका आकार बहुत बड़ा या बहुत छोटा नहीं होना चाहिए इसके साथ जब हम कोई शीर्षक बनाते हैं तो उसके अक्षर या आकार समान लिखावट के अक्षरों से कुछ बड़ा होना चाहिए। हम किताबों को पढ़ते समय भी देखते हैं कि किसी पार्टी या शीर्षक मोटे अक्षरों में लिखा जाता है।जबकि पाठ के अंदर का अक्षर सामान्य रूप से कितना छोटा होता है कि वह डेढ़ से दो फीट की दूरी रखने पर पढ़ा जा सकता है।

इसी तरह दुकान या शोरूम और रेलवे स्टेशन या बस स्टेशन में विभिन्न प्रकार के नाम या जानकारियां लिखी जाती है उन अक्षरों के आकार बहुत बड़े होते हैं ऐसा इसलिए होता है ताकि गाड़ी चलाते समय बहुत तेज गति होने के बावजूद वहां से गुजरने वाला व्यक्ति उस अक्षर को आसानी से पढ़ सके।जब हम ट्रेन में सफर करते हैं तो कई बार छोटे स्टेशनों पर एक्सप्रेस,बड़ी गाड़ियां नहीं रुकती है तो ऐसे में हमें स्टेशन का नाम देखना है तो खिड़की से झांककर बड़े अक्षरों वाले शब्द की तलाश करते हैं ताकि उन्हीं में अगर स्टेशन का नाम दिखा दिया जाए तो हम उसे आसानी से पढ़ लेंगे।इतना ही नहीं अगर हमें शहर या गांव के पूरे नाम के बदले शुरू में केवल दो या तीन अक्षर भी दिख जाए तो हम उस स्टेशन के नाम का पता लगा सकते हैं।

3. अक्षर का आकार (Point System)- अक्षरों के लेखन या मुद्रण में हमें एक और महत्वपूर्ण बात का ध्यान रखना पड़ता है कि उसका आकार बड़ा या छोटा करने के लिए हम एक निश्चित अंक या संख्या के अक्षर का आकार तय करते हैं।कंप्यूटर में किसी अक्षर को टाइप करने के बाद उस माउस को क्लिक किया जाता है तो ऊपर के कोने में कुछ अक्षर के आकार की संख्या दिखाई देने लगती है।आमतौर पर किसी पुस्तक में पाठ के अंदर के अक्षर 9 या 10 पॉइंट के होते हैं जबकि पाठक का शीर्षक 20 से 30 पॉइंट के आकार का होता है।इसी तरह पाठ के अंदर लिखे जाने वाले अक्षर का आकार 14 से 18 पॉइंट के बीच का होता है।

विभिन्न प्रकार के बैनर,पोस्टर और होर्डिंग्स में जो मुख्य अक्षर होते हैं उनका आकार सबसे ज्यादा पॉइंट का होता है उसके नीचे कार्यक्रम की विषय को लिखा जाता है इसका कारण मुख्य अक्षर से थोड़ा छोटा होता है इसी तरह कार्यक्रम की स्थान और दिनांक को बैनर में सबसे छोटा रखा जाता है।इसके साथ ही इन तीनों के बीच पर्याप्त जगह छोड़ी जाती है।

निष्कर्ष- टाइपोग्राफी के जो भी सिद्धांत बताए गए हैं उनका पालन करते हुए हम विभिन्न शब्दों को बड़ा लिखते हैं इन सिद्धांतों को मानने से हमारे अक्षरों और शब्दों को सही आकार में लिखना संभव हो पाता इसलिए हर प्रकार के लेखन में टाइपोग्राफी के सिद्धांतों का बहुत महत्व है।

Unit- 4

Use of Multimedia

मल्टीमीडिया/ बहुमाध्यम (Multimedia) –

” जब एक ही माध्यम से लिखना,बोलना,पढ़ना देखना और सुनना हो सके तो इस माध्यम को बहुमाध्यम या मल्टीमीडिया कहते हैं। “

सामान्य तौर पर टीवीमोबाइल,कंप्यूटर को मल्टीमीडिया का अच्छा उदाहरण माना जाता है, क्योंकि इन तीनों ही माध्यमों से लिखना,बोलना, पढ़ना,देखना और सुनना संभव है।सच तो यह है कि मोबाइल फोन की दुनिया में सबसे स्मार्ट फोन यानी टच स्क्रीन फोन आया है तब से उसका उपयोग मल्टीमीडिया साधन के रूप में भी किया जाता है।

अब मोबाइल फोन से कॉल करने का समय काफी कम होता है जबकि व्हाट्सएप पर ऑडियो और वीडियो भेजना या पूरा समाचार भेजना ज्यादा होता है।इसी तरह कंप्यूटर से भी हम सोशल मीडिया और विभिन्न प्रकार की वेबसाइट को देखकर उससे समाचार,आलेख या ऑडियो,वीडियो दुनिया के किसी भी कोने से भेज सकते हैं।ठीक इसी तरह टीवी संचार का बहुत प्रभावशाली माध्यम है।इसकी मदद से लिखना,बोलना,पढ़ना,देखना और सुनना सभी संभव है।कहने का अर्थ यह है कि कोई भी बहु माध्यम यानी मल्टीमीडिया समय के साथ अपने साथ नई-नई तकनीकों को जोड़कर लोगों के लिए उपयोगी बना रह सकता है।

मल्टीमीडिया के उपयोग-

मोबाइल फोन
टीवी
कंप्यूटर


किसी भी अच्छे बहु माध्यम को तभी सफल और उपयोगी माना जाता है जब उससे पाठक के दर्शक की प्रतिक्रिया भी बोलने और देखने वाले तक पहुंच सके।इसलिए मोबाइल फोन पर व्हाट्सएप का सॉफ्टवेयर बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है क्योंकि इसमें किसी भी देखे हुए सामग्रियां ऑडियो,वीडियो सामग्री को भेजने पर पाने वाले की प्रतिज्ञा तुरंत दिखाई देती है।जैसे ही हमारी भेजी हुई सामग्री कोने पर पहुंची सही (right) के दो निशान नीले रंग के दिखने लगते हैं तो हम समझ जाते हैं कि हमारी भेजी गई सामग्री को पाने वाले व्यक्ति ने देख लिया है।अब वह झूठ भी नहीं बोल सकता लेकिन टीवी पर कोई कार्यक्रम देखते समय,कंप्यूटर से ईमेल करते समय हमें पाठक की प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती है।

Unit- 5

(Printing Methods: Plaster Cylindrical,Gravure,Screen,Offset,Plate Making,Types Of Papers,Magazine lau-out; Pagination: Designing and printing of cover pages; Safety measures in Printing Press)

प्रिंटिंग प्रेस में छपाई के दौरान किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिए?

प्रिंटिंग प्रेस में काम करते समय सावधानी रखना जरूरी होता है क्योंकि प्रेस के पूरे काम में बिजली का इस्तेमाल होता है साथ ही प्रिंटिंग मशीन के सभी हिस्से लोहे के बने होते हैं इसलिए इसमें करंट आ जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है।यही वजह है कि प्रिंटिंग में काम के दौरान सभी कर्मचारियों को अधिक से अधिक सावधानी रखने को कहा जाता है।प्रिंटिंग की कार्य के दौरान प्रमुख सावधानिया इस प्रकार है-

1. सभी कर्मचारियों को चप्पल के बदले जूते मोजे पहनकर काम करना चाहिए क्योंकि प्रिंटिंग मशीन में के ऊपर लगे कागज को ठीक करते समय सीढ़ी और प्लेटफार्म चलकर काम करना पड़ता है।ऐसे में चप्पल पहनने से दुर्घटना की आशंका रहती है।

2. हाथ में प्लास्टिक या रैग्जीन का दस्तान या मोजा पहन कर काम करना चाहिए क्योंकि मशीन का पूरा हिस्सा लोहे का होता है और उसमें कभी भी कहीं भी करंट आ सकता है।

3. प्रिंटिंग मशीन में कागज चढ़ाते समय दो से तीन लोगों की मदद लेनी चाहिए क्योंकि कागज का रोल बहुत भारी होता है इसलिए उसमें दबने से हाथ पैर या शरीर का कोई हिस्सा घायल हो सकता है।

4. प्रिंटिंग मशीन को चालू करने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि स्विच में वोल्टेज पूरा है या नहीं इसकी जानकारी स्टेबलाइजर से मिलती है स्टेबलाइजर को देखने के बाद ही मशीन चालू करना चाहिए।

5. मशीन चालू करने के बाद शुरू में उसकी रफ्तार बहुत कम रखनी चाहिए क्योंकि शुरू के करीब 100 से 200 अखबार की प्रतियां खराब निकलती है उससे सही कम ज्यादा भी होती है इसे मिलाने के लिए कम से कम ₹200 की छपाई करनी पड़ती है तब जाकर सही अखबार छपना शुरू होता है।

6. अगर कागज का रोल छोटा हो या बीच से फट जाए तो मशीन को रोककर फिर से नया रोल लगाना पड़ता है इसमें भी बहुत सावधानी की जरूरत होती है।

7. दिन की छपाई में अखबार की स्याही का रंग स्पष्ट दिखाई देता है लेकिन रात के समय में ही ज्यादातर अखबारों की छपाई होती है इसलिए प्रिंटिंग की जगह में सफेद रंग की बड़ी-बड़ी लाइट लगाई जाती है इन लाइटों से ही रंगीन छपाई का वास्तविक रंग देखा जा सकता है।

8. प्रिंटिंग का काम करने वाले कर्मचारियों को आमतौर पर रात 11:00 से 4:00 बजे तक काम करना पड़ता है ऐसे में इन कर्मचारियों को दिन के समय अपनी नींद पूरी कर लेनी चाहिए वरना रात को काम करते समय अचानक नींद आ जाना या झपकी आ जाने पर दुर्घटना हो सकती है इसलिए नींद आने पर चाय पीना पसंद करते हैं।

9. रात में काम करते समय कर्मचारियों को अपने पास प्राथमिक उपचार के समान भी अवश्य रखनी चाहिए।

10. छपाई का काम बंद होने पर सारे स्विच ध्यानपूर्वक बंद कर देना चाहिए ताकि मशीन में करंट आने की आशंका नहीं रहे।

निष्कर्ष- इन सावधानियों के अलावा भी अन्य सावधानियां हो सकती है जैसे गीले कपड़े नहीं पहनना,हाथ में घड़ी नहीं पहनना,चश्मा सावधानीपूर्वक पहनना,सिर में टोपी लगा कर रखना जैसी अन्य सावधानियां का भी ध्यान रखना चाहिए।इसके अलावा आने वाले समय में प्रिंटिंग मशीन की टेक्नोलॉजी है तकनीक लगातार बदलती जाएगी इससे प्रेस के कर्मचारियों को हर नई मशीन का प्रशिक्षण लेते रहना चाहिए और नई-नई सावधानियों का भी ध्यान रखना चाहिए।

कागज (Paper) – कागज एक पतला पदार्थ है जिस पर लिखने या छपने का कार्य किया जाता है।कागज का उपयोग विभिन्न प्रकार की वस्तुओं को बंद (पै करने के लिए किया जाता है।आमतौर पर लकड़ी या बॉस के टुकड़े की लुगदी से कागज बनाया जाता है।रसायन शास्त्र की भाषा में या प्राकृतिक रूप से प्राप्त सेल्युलोज के रेशों से भी कागज बनता है।कहने का अर्थ यह है कि जिस तत्व में सेल्युलोज की मात्रा अधिक होती है उसमें रेशे भी अधिक होती है।इन्हीं रेशों से अच्छा कागज बनता है।आजकल भारत में कागज बनाने के लिए अनुपयोगी सामानों के टुकड़े,पुराने पेपर की लुगदी,बांस और पेड़ों की छाल और घास के इस्तेमाल से कागज बनाने की प्रक्रिया 3 तरह से पूरी होती है-

1. सेल्युलोज या विभिन्न रेशों की लुगदी बनाना।
2. लुगदी को निरंजन करना, महीन कोमल बनाना।
3. लुगदी को पतली चादर के रूप में तैयार करना।


कागज का इतिहास

कागज का सबसे पहला निर्माण 105 ईसवी में चीन में किया गया।या तब शहतूत,भांग और अन्य पेड़ों की छाल से पहली बार कागज बनाया गया था।

इसके बाद दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी कागज निर्माण की खबर फैलने लगी। चीन के बाद भारत में सिंधु घाटी की सभ्यता के समय कागज बनाने के संकेत मिलते हैं।भारत में मुगल काल के समय के विद्वान अलबरूनी ने अपने दस्तावेज में लिखा है कि कागज का निर्माण चीन के राजाओं ने ही किया था और उसका पहला लेनदेन भारत में 671 ईसवी में हुआ था।

भारत में कागज उपयोग का शुभारंभ मुगल काल में कश्मीर के सुल्तान जैनुलाबुद्दीन ने 1450 के आसपास किया था।इस समय से 600 से अधिक कागज बनाने के कारखाने हैं।

ग्रावुरी मुद्रण (Gravure printing)

ग्रावुरी मुद्रण उत्कृष्ट मुद्रण गुणवत्ता और उच्च मुद्रण गति की विशेषता है। इसके आगे के फायदे हैं कि इसमें एक साधारण मुद्रण प्रक्रिया, सटीक स्याही का उपयोग, और प्रिंटिंग मशीन संरचनाओं का लचीलापन शामिल है। कई तकनीकी नवाचारों के कारण ग्रेव प्रिंटिंग, अब नवीन तकनीकों से संबंधित है। पैकेजिंग सामग्री का बाजार ग्रेव प्रिंटिंग का सबसे बड़ा खंड है, और एक और वृद्धि पूर्वानुमान है। इस अध्याय में, गुरुत्वाकर्षण मुद्रण प्रक्रिया के आधार (स्याही हस्तांतरण, सुखाने, गुरुत्वाकर्षण सिलेंडर, डॉक्टर ब्लेड, छाप सिलेंडर, प्रिंट की विशेषताएं) और गुरुत्वाकर्षण मुद्रण स्याही की विशेषताओं को प्रस्तुत किया गया है। गुरुत्वाकर्षण सिलेंडर उत्पादन की अप-टू-डेट विधियां और गुरुत्वाकर्षण छपाई मशीनों की संरचना की विशेषताओं को स्पर्श किया जाता है, और अंत में गुरुत्वाकर्षण मुद्रण के विकास के क्षेत्रों से निपटा जाता है।

स्क्रीन प्रिंटिंग (screen printing)

स्क्रीन प्रिंटिंग एक जाल सतह, स्याही और एक निचोड़ का उपयोग करके एक सपाट सतह पर स्टेंसिल डिज़ाइन को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया है। फैब्रिक और पेपर सबसे अधिक स्क्रीन-मुद्रित सतहों हैं, लेकिन विशेष स्याही के साथ लकड़ी, धातु, प्लास्टिक और यहां तक ​​कि ग्लास पर भी प्रिंट करना संभव है। मूल विधि में एक महीन जाली वाली स्क्रीन पर एक स्टैंसिल बनाना और फिर नीचे की सतह पर अपने डिज़ाइन की एक छाप बनाने के लिए स्याही (या पेंट, कलाकृति और पोस्टर के मामले में) को शामिल करना शामिल है।

इस प्रक्रिया को कभी-कभी ‘सिल्क स्क्रीनिंग’ या ‘सिल्क स्क्रीन प्रिंटिंग’ कहा जाता है और जबकि वास्तविक प्रिंटिंग प्रक्रिया हमेशा काफी समान होती है, जिस तरह से स्टेंसिल बनाया जाता है वह भिन्न हो सकती है, जो उपयोग की गई सामग्रियों के आधार पर हो सकती है। विभिन्न स्टैंसिलिंग तकनीकों में शामिल हैं:

स्क्रीन के वांछित क्षेत्रों को कवर करने के लिए मास्किंग टेप या विनाइल का उपयोग करना।
गोंद या लाख जैसे ‘स्क्रीन ब्लॉकर्स’ का उपयोग करके मेष पर स्टेंसिल को चित्रित करना।
एक स्टैंसिल बनाने के लिए एक प्रकाश-संवेदनशील इमल्शन का उपयोग करना, जिसे तब एक तस्वीर के समान तरीके से विकसित किया जाता है
स्क्रीन प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग करके बनाए गए डिजाइन स्याही की केवल एक छाया, या कई का उपयोग कर सकते हैं। बहुरंगी वस्तुओं के मामले में, रंगों को अलग-अलग परतों में लागू किया जाना चाहिए, प्रत्येक स्याही के लिए अलग स्टेंसिल का उपयोग करना चाहिए।

ऑफसेट प्रिंटिंग (Offset printing)

ऑफसेट प्रिंटिंग एक प्रिंटिंग तकनीक है जिसमें प्राप्त मीडिया, आमतौर पर पेपर पर मुद्रित होने से पहले एक धातु की प्लेट से एक रबर कंबल या रोलर्स में छवि को स्थानांतरित करना शामिल है।इस पद्धति में, पेपर धातु प्लेटों के सीधे संपर्क में नहीं आता है।ऑफसेट प्रिंटिंग को ऑफसेट लिथोग्राफी के रूप में भी जाना जाता है।

ऑफसेट प्रिंटिंग कपड़े या लकड़ी जैसी सतहों पर उच्च-गुणवत्ता वाले प्रिंटिंग उत्पादन करने में मदद करती है। रबड़ किसी न किसी सतह पर बहुत अच्छा प्रिंट छोड़ती है, जिससे प्रक्रिया प्रभावी हो जाती है। यह प्रक्रिया मुद्रण के छोटे, मध्यम और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए समान रूप से कुशल है,इसकी उच्च गुणवत्ता, अक्षमता और सुसंगत परिणामों के कारण।

प्रकाशन उद्योग थोक मुद्रण के लिए मुद्रण तकनीकों के दो मुख्य प्रकारों का उपयोग करता है। एक शीट-फेड ऑफसेट प्रिंटिंग विधि है, जहां प्रत्येक शीट को मशीन में व्यक्तिगत रूप से खिलाया जाता है, और वे मुद्रण प्रक्रिया से पहले कट जाते हैं। अन्य प्रक्रिया, वेब ऑफसेट प्रिंटिंग, कागज के रोल में ले जाती है और उस पर प्रिंट करती है। पृष्ठों को छंटनी और बाद में इकट्ठा किया जाता है। इस पद्धति का उपयोग मीडिया के थोक मुद्रण के लिए किया जाता है, जिसकी सामग्री नियमित रूप से बदलती रहती है, जैसे कि समाचार पत्र, क्योंकि यह एक लागत प्रभावी तरीका है।

प्लेट मेकिंग (Plate Making)

प्रिंटिंग प्लेटें पतली होती हैं, धातु की सपाट चादरें जो आमतौर पर एल्यूमीनियम से बनाई जाती हैं। इनका उपयोग प्रिंटिंग उत्पादों जैसे बिजनेस कार्ड, कैटलॉग और ब्रोशर में किया जाता है।

ऑफसेट प्रिंटिंग में प्रिंटिंग प्लेट्स

“प्रिंटिंग प्लेट” शब्द का अक्सर ऑफसेट प्रिंटिंग के रूप में एक ही सांस में उल्लेख किया जाता है। डिजिटल प्रिंटर के जन्म से पहले ऑफसेट प्रिंटिंग मानक था – और कुछ आज तक ऑफसेट प्रिंटिंग पसंद करते हैं। हमारे यहां PrintRunner में व्यवसाय कार्ड, ब्रोशर, लिफाफे और कैटलॉग जैसे अधिकांश उत्पादों को ऑफसेट प्रिंटिंग के माध्यम से छापा जाता है।

ऑफसेट प्रिंटिंग एक धातु शीट पर एक छवि को स्थानांतरित करके काम करता है जिसे प्रिंटिंग प्लेटों के रूप में जाना जाता है जो एक फोटोमैकेनिकल या फोटोकैमिकल प्रक्रिया के माध्यम से होता है। आमतौर पर, डिज़ाइन किए जाने वाले हर रंग की एक प्लेट होती है। एक बार हो जाने के बाद, प्लेटों को बेलनाकार प्लेट धारकों से जोड़ा जाता है जहां स्याही और पानी लगाया जाता है क्योंकि कागज सामग्री गुजरती है।ऑफसेट प्रिंटिंग कागज पर अपने डिजाइन को स्थानांतरित करने के लिए मुद्रण प्लेटों के उपयोग पर निर्भर करती है।

CMYK में प्रिंटिंग प्लेट्स

ऑफसेट प्रिंटिंग के माध्यम से मुद्रित होने वाली रंगीन डिज़ाइन फ़ाइलें CMYK प्रारूप में बदल जाती हैं जो सियान, मैजेंटा, पीला और कुंजी (काला) के लिए खड़ी होती हैं। इस तरह आप छपाई के दौरान प्रत्येक रंग का प्रतिनिधित्व करने के लिए चार प्लेट लगा सकते हैं।

क्यों मुद्रण प्लेट्स ब्लू हैं?

तो क्यों प्लेटों का रंग नीला है? क्या मेरे डिजाइन पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा? नहीं, तब तक चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि अंतिम उत्पाद तब तक नीला नहीं होगा जब तक कि वह होना नहीं चाहिए। आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस कुछ CTP (कंप्यूटर-टू-प्लेट) मशीनों का उपयोग करते हैं। ये मुद्रण प्लेटों पर डिज़ाइनों को खोदने के लिए लेजर तकनीक का उपयोग करते हैं। नीले खंड हुक करते हैं जहां स्याही को जमीन पर उतारना चाहिए क्योंकि सिलेंडर कागज से संपर्क बनाते हैं।

मुद्रण प्लेटों के उत्पादन का बोझ प्रिंटर पर पड़ता है।ग्राहकों को केवल यह सुनिश्चित करने के बाद कि वे छवि संकल्प और सही ब्लीड सेटअप जैसी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी डिजिटल फाइलें जमा करने की आवश्यकता होगी।

कागज के प्रकार-

वैसे तो कागज के विभिन्न प्रकार होते है, आमतौर पर पांच या छः प्रकार के कागजों का इस्तेमाल होता है-

लुगदी कागज
गत्ते का कागज
अखबारी कागज
चिकना कागज (बांड पेपर)
रंगीन कागज
हाथी दांत से बना कागज

पत्रिका लेआउट (Magazine Layout)

पत्रिका लेआउट उन चीजों में से एक है जो अन्य प्रकाशनों के अलावा एक पत्रिका सेट करती है। पत्रिकाएं पढ़ने के लिए होती हैं, लेकिन वे एक दृश्य अनुभव भी होती हैं।

आप एक पत्रिका लेआउट बनाने में जाने वाले सभी कार्यों को नहीं देख सकते हैं जो शानदार दिखता है, लेकिन यदि आप इसे खराब तरीके से करते हैं तो आप निश्चित रूप से नोटिस करेंगे। आखिरी चीज जो आप चाहते हैं वह पाठकों को खोना है क्योंकि आपका डिज़ाइन बराबर नहीं है।

पत्रिका लेआउट कैसे बनाते हैं जो कार्यात्मक, नेत्रहीन दिलचस्प और बनाने में आसान है? पत्रिका लेआउट बनाने के लिए अपने चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका इस प्रकार है-

अपना कॉन्टेंट प्लान करें (PLAN YOUR CONTENT)- कंप्यूटर को छूने से पहले आपको अपनी पत्रिका की सामग्री की योजना बना लेनी चाहिए। यदि आप नहीं जानते कि आप क्या प्रकाशित करने जा रहे हैं, तो आप अपने लेआउट की ठीक से योजना नहीं बना सकते।आप किन कहानियों को मुद्दे में शामिल करने जा रहे हैं? क्या आपके पास फोटोग्राफी फैल जाएगी? क्या यह पाठ-भारी होगा या मीडिया और पाठ का संतुलित मिश्रण होगा?आपको अपनी पत्रिका डिज़ाइन करने से पहले ही इन सभी सवालों के जवाब देने चाहिए।यदि आपके पास एक संपादकीय कर्मचारी है, तो अंतिम सामग्री पर निर्णय लेने के लिए उनके साथ काम करें जो इसे पत्रिका में बना देगा।एक बार जब आप जान लेंगे कि आपकी पत्रिका में क्या शामिल होगा, तो आप अपना लेआउट बनाने की शुरुआत कर सकते हैं।

मास्टर पेजेज बनाएं (CREATE MASTER PAGES)- बहुत सारे पृष्ठ हैं जो एक पत्रिका में जाते हैं, और उनमें से प्रत्येक को एक-एक करके डिजाइन करना आपके समय पर एक नाली होगा।इसके बजाय,मास्टर पृष्ठ बनाएं जो आपके समग्र लेआउट और पत्रिका के अनुभव को निर्धारित करने में मदद करेंगे।आप केवल एक मास्टर पेज नहीं बनाना चाहते हैं क्योंकि तब आपकी पत्रिका हर पृष्ठ पर समान दिखाई देगी।आप एकता और सामंजस्य चाहते हैं, लेकिन यह बहुत समान नहीं होना चाहिए या यह देखने के लिए उबाऊ होगा।इसके बजाय, आप कई मास्टर पेज बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी विशेषता के पहले पृष्ठ के लिए एक मास्टर पृष्ठ और बीच में पाठ-पृष्ठों के लिए एक मास्टर पृष्ठ बनाएँ।

आपके मास्टर पृष्ठों में आपके पृष्ठ संख्या, आपके द्वारा उपयोग की जाने वाली पृष्ठभूमि, और आपके पृष्ठों के किनारों पर कोई सीमा या डिज़ाइन जैसी चीज़ें शामिल होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित करने में भी मदद मिलती है कि आपकी पत्रिका में कोई विसंगतियाँ नहीं हैं – आप शुरुआत में पेज नंबर को पेज की तुलना में पेज नंबर से अलग स्थान पर होना चाहते हैं।

रंग के साथ खेलते हैं (PLAY WITH COLOR)- एक बार जब आप अपने मास्टर पेज सेट कर लेते हैं, तो आप उन्हें और अधिक आकर्षक बनाने के लिए शुरू कर सकते हैं।सुविधा स्टोर की शेल्फ पर किसी भी पत्रिका के बारे में सोचें। यदि आप यादृच्छिक पर एक उठाते हैं और इसके माध्यम से फ्लिप करते हैं, तो क्या आप ज्यादातर सफेद दिखेंगे या आपको रंग के फटने के साथ स्वागत किया जाएगा?

आपकी पत्रिका के रंग और रूप पर रंग का बड़ा प्रभाव है। यह आपके द्वारा प्रत्येक अंक में शामिल किए गए विशिष्ट लेखों के स्वर को निर्धारित करने में भी मदद कर सकता है। जैसा कि आप अपने पत्रिका लेआउट को डिज़ाइन करते हैं, सुनिश्चित करें कि आप उन विभिन्न तरीकों के बारे में सोच रहे हैं जिन्हें आप रंग का उपयोग कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, आपके पृष्ठ की सभी पृष्ठभूमि सफेद नहीं होनी चाहिए। हो सकता है कि फीचर पृष्ठ में कुछ दृश्य रुचि जोड़ने के लिए एक पैटर्न पृष्ठभूमि या उसके पीछे एक तस्वीर हो।

आप विभिन्न तरीकों से रंग भी जोड़ सकते हैं। हेडलाइन टेक्स्ट को शरीर की तुलना में एक अलग रंग बनाने पर विचार करें, या ओवररिंग थीम को फिट करने के लिए तस्वीरों के बॉर्डर रंगों को बदल दें।

ADD CONTRAST – मैगजीन लेआउट में कंट्रास्ट जोड़ने से उन्हें बहुत उबाऊ या घबराहट के बजाय नेत्रहीन दिलचस्प बनाने में मदद मिलती है।

कंट्रास्ट कई अलग-अलग रूपों में आ सकता है। आप जान सकते हैं कि आप लेखों के मुख्य भाग के लिए अपनी पत्रिका में एक ही फ़ॉन्ट का उपयोग करना चाहते हैं, लेकिन आप एक शीर्षक फ़ॉन्ट कैसे चुनते हैं?आप एक ही का उपयोग नहीं करना चाहते हैं – कुंजी उन फोंट को ढूंढ रही है जो एक-दूसरे को अच्छी तरह से सेट करते हैं लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वे पृष्ठ पर अंतरिक्ष के लिए लड़ रहे हैं। इसके विपरीत महत्वपूर्ण है।

आप रंग के साथ विपरीत भी जोड़ सकते हैं। एक फीचर पेज के लिए एक बैकग्राउंड कलर का चयन करना जो आर्टिकल पेज सिग्नल से रीडर के लिए खड़ा होता है कि फीचर पेज महत्वपूर्ण है। एक अलग रंग में एक साइडबार जोड़ने से उस जानकारी को आंख खींचती है जिसे आप साझा करना चाहते हैं।ऐसे कई तरीके हैं जो आप इस के साथ खेल सकते हैं।

सम्मिलित मल्टीमीडिया (INCLUDE MULTIMEDIA) –चाहे आपकी पत्रिका प्रिंट, डिजिटल, या दोनों हो, आपको हमेशा अपनी पत्रिका में मल्टीमीडिया को शामिल करना चाहिए।ऐसी पत्रिका के लिए जो कड़ाई से प्रिंट करती है, यह फोटोग्राफी, इन्फोग्राफिक्स, चित्र या ग्राफ़ की तरह दिख सकती है जो उन कहानियों पर निर्माण करने में मदद करती हैं जो आप बता रहे हैं। “एक तस्वीर एक हजार शब्दों के लायक है” कहावत क्लिच हो सकती है, लेकिन यह सही भी है। मीडिया को जोड़े बिना आपकी पत्रिका समाप्त नहीं हुई है।

आप ऊपर उल्लिखित मीडिया को डिजिटल संस्करणों में भी शामिल कर सकते हैं, लेकिन आपको डिजिटल मुद्दे के साथ अधिक करने के लिए स्वतंत्र महसूस करना चाहिए। डिजिटल पत्रिकाएं आपको वीडियो, इंटरैक्टिव क्विज़, ऑडियो और GIF जैसी चीज़ों को शामिल करने की अनुमति देती हैं। यदि आप केवल मीडिया को शामिल करते हैं जो पारंपरिक रूप से प्रिंट में दिखाई देता है, तो आप डिजिटल प्रकाशन की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर रहे हैं।

अपने काम की जाँच करें (CHECK YOUR WORK)- अंत में, इससे पहले कि आपके पत्रिका लेआउट को समाप्त कहा जाए, आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप सब कुछ पढ़ लें और अपने काम की जांच करें। यह आपको सभी पृष्ठों को प्रिंट करने और उन्हें आपके सामने रखने में मदद कर सकता है ताकि आप देख सकें कि प्रत्येक पृष्ठ के डिज़ाइन एक साथ कैसे काम करते हैं – या नहीं।यह देखने का एक अवसर है कि क्या आपका पत्रिका लेख लेआउट सामंजस्यपूर्ण है, या इसे पाठकों को भेजने से पहले भी काम करने की आवश्यकता है।अगर सब कुछ अच्छा लगता है, बधाई। आपने सफलतापूर्वक एक पत्रिका लेआउट बनाया है!पत्रिका के साथ अपनी पत्रिका बनाएँअब आप एक शानदार पत्रिका लेआउट बनाने के लिए तैयार हैं जो प्रिंट और डिजिटल प्रकाशनों के लिए तैयार है।

अपने डिजाइन कौशल को अभ्यास में लाने के लिए तैयार हैं? खरोंच से एक डिजिटल पत्रिका बनाने के लिए मैगलॉफ्ट का उपयोग करें, कोई कोडिंग अनुभव की आवश्यकता नहीं है। चाहे आप पहले से ही एक अलग सॉफ्टवेयर पर अपनी पत्रिका का निर्माण कर चुके हों या शुरू करने का कोई रास्ता खोज रहे हों, मैगलेट डिजिटल पत्रिकाओं को सस्ती और आसान बनाता है।

पृष्ठांकन (Pagination)

“पृष्ठांकन असतत पृष्ठों में प्रिंट या डिजिटल सामग्री को अलग करने की प्रक्रिया है।” प्रिंट दस्तावेजों और कुछ ऑनलाइन सामग्री के लिए, पृष्ठांकन क्रमिक संख्याओं को जोड़ने के लिए पृष्ठों की अनुक्रमिक क्रम की पहचान करने की स्वचालित प्रक्रिया को भी संदर्भित करता है। कुछ प्रकार की वेबसाइट सामग्री को अलग-अलग पृष्ठों में विभाजित करके उन्हें अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने में लाभ होता है, जैसे कि खोज इंजन परिणाम पृष्ठ (SERP), ब्लॉग और चर्चा फ़ोरम।

सामग्री को तोड़ने के लिए कभी-कभी ऑनलाइन लेखों को देखा जाता है। पाठक की सहायता के लिए लंबे लेखों को कई पृष्ठों में व्यवस्थित करने का कुछ औचित्य है। हालाँकि, यहां तक ​​कि अपेक्षाकृत संक्षिप्त लेखों को भी अक्सर पृष्ठांकित किया जाता है ताकि एक पृष्ठ में एक ही अनुच्छेद हो और एक आगंतुक को पूरा पाठ पढ़ने के लिए दस या अधिक पृष्ठों पर क्लिक करना पड़े। उद्देश्य पृष्ठ के विचारों को बढ़ाना है और इसके परिणामस्वरूप, विज्ञापन छापें – किसी वेबसाइट आगंतुक द्वारा दिए गए विज्ञापन को जितनी बार देखा जाता है। हालाँकि, क्योंकि अधिकांश पाठक बहु-पृष्ठ लेखों को पूरा नहीं करते हैं, इसलिए एक लंबे समय के बजाय कई छोटे पृष्ठों की प्रस्तुति वास्तव में कम विज्ञापन छापों का परिणाम हो सकती है।

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