छत्तीसगढ़ बस्तर संभाग

दीपिका ने की लोगों से दिवाली में कुम्हार के घरों को रौशन करने की अपील

तोंगपाल MyNews36- सुकमा जिले की अधिवक्ता व समाज सेविका दीपिका शोरी ने इस दीपावली पर कुम्हारों के द्वारा निर्मित मिट्टी के दिए जलाने हेतु सुकमा जिले के समस्त निवासियों से अपील करते हुए कहा कि सुकमा जिले के गरीबी से जूझते दियों के कारीगर कुम्हारों का कभी उत्सवों की शान समझे जाने वाले दीयों का व्यवसाय आज संकट के दौर से गुजर रहा है,और दीपावली में मिट्टी के दियों से लोगों का घर रौशन करने वाले कुम्हार आज दो वक्त की रोटी के लिए भी तरस रहे हैं। कुम्हार के चाक से बने खास दीपक दीपावली में चार चांद लगाते हैं लेकिन बदलती जीवन शैली और आधुनिक परिवेश में मिट्टी को आकार देने वाला कलाकार आज के व्यस्त जीवनशैली एवं आधुनिकता की चकाचौंध मे लुप्त होता जा रहा है। लाखों घरों को रोशनी से जगमग करने वाले कुम्हारों की जिंदगी मे आज भी अंधेरा ही अंधेरा है। बाजारों में दीयों की जगह आधुनिक तरह की तमाम रंग-बिरंगी बिजली की झालरों ने ले लिया हैे।

मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने समस्या ही समस्या खड़ी हैे। यदि कोरोना काल की बात करें तो जिले के कुम्हार अपने मिट्टी के बर्तनों को विक्रय कम हो जाने के कारण दूसरे प्रांत भी ले जा रहे हैं जिसमे उन्हें बहुत ही परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है,हम इस दीपावली में मिट्टी के दिये से घर रोशन करने के संकल्प से उनकी अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक मदद भी कर सकते हैं।

हुनर लुप्त की कगार पर

उन्होंने कहा कि कुम्हारों की अंगुलियों मे जो कला है वह दूसरे लोगों में शायद ही हो। घूमते चाक पर मिट्टी के दीये बनाने वाले इन कुम्हारों की याद दीपावली आने से पहले हर शख्स को आ जाती है। तालाबों से मिट्टी लाकर उन्हें सुखाना, सूखी मिट्टी को बारीक कर उसे छनना और उसके बाद गीली कर चाक पर रख तरह तरह के वस्तुओं को आकार देना। इन कुम्हारों की जिंदगी का अहम काम है।

इसी हुनर के चलते कुम्हारों के परिवार का भरण पोषण होता है। कुम्हार समाज की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। चाक चलाने का काम पुरुष करते हैं तो दूसरी ओर मिट्टी को भिगोने साफ करने और तैयार करने का काम महिलाएं करती हैं। परन्तु उचित आमदनी के अभाव के कारण अब कुम्हारों के बच्चे इस व्यवसाय से दूरी बना रहे हैं जिससे अब यह व्यवसाय लुप्त की कगार पर खड़ा है।

अंत मे उन्होंने कहा कि दीपावली का वास्तविक अर्थ दूसरों के साथ अपनी खुशियां बांटना होता है हम यदि मिट्टी के दिए के स्थान पर चाइनीज झालर का इश्तेमाल करेंगे तो हम अपने घरों को तो रोशन कर लेंगे परन्तु हमारे ही एक भाई के घर मे अंधियारा रहेगा जिसके बाद शायद हमारे लिए दीपावली का कोई अर्थ ही नहीं रह जायेगा।

MyNews36 प्रतिनिधि ताराचंद जैन की रिपोर्ट

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