पुस्तकें सिखाती हैं कि कैसे जिएं- प्रो. बल्देव भाई शर्मा

WorldBookDay : भारत ज्ञानपिपासु देश है।ऐसा ज्ञान जो मनुष्यता का विस्तार करें,शांति- सद्भाव और लोक कल्याण का मार्ग दिखाए।ऐसे शाश्वत ज्ञान का न केवल भारत में ऋषियों ने सृजन किया,बल्कि आह्वान भी किया- आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः। यानी दुनिया में किसी भी कोने से ज्ञान प्राप्त हो,उसे बाहें फैलाकर ग्रहण करो।मन के सारे दुराग्रहों और संकीर्णताओं को त्याग कर ज्ञानार्जन का संस्कार देने वाली यह भारत भूमि इसलिए विश्व गुरु कहलाई कि यहां मानव हित में साहित्य लेखन व पढ़ने-पढ़ाने की परंपरा सबसे पहले विकसित हुई।आश्रम और गुरुकुल इसका केंद्र बने और कालांतर में नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्व के अग्रणी और श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई जहां दुनियाभर के लोग शिक्षा प्राप्त करने आते थे।शिक्षा जो कोरा जानकारी पढ़ाने वाला ज्ञान नहीं,मानव हित का बोध कराने वाला ज्ञान जो सद्गुण सदाचार से युक्त हो।

ऋग्वेद जिसे यूनेस्को ने मानव जाति की प्रथम पुस्तकों में माना है,मानव संस्कृति का गान है।उपनिषदों व ब्राह्मण – आरण्यक ग्रंथों में वेद ज्ञान का ही विस्तार है।ये ग्रंथ वैदिक वाड्मय में का ही अंग है।ईशावास्योपनिषद में मानवता, त्याग व दूसरों के हित संरक्षण का जो पाठ है,वह आज दुनियावी भोग-विलास से उत्पन्न गला-काट होड़ में नष्ट हो रही परस्पर शांति-सौहार्द की भावना को बचाए रखने व उसे दृढ़ करने की प्रेरणा है- ‘ ईशावास्यमिदं सर्वं यक्तिञि्चद् जगत्यांजगत्/तेन् त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्य इस्य स्विद्धनम्।’ यानी जगत के कण-कण में ईश्वर का वास है ,इसलिए उसका भाग छोड़कर ही उपभोग करो और दूसरों के धन का लालच मत करो।जीवन जीने की कला (आर्ट आफ लिविंग) इससे बेहतर क्या हो सकती है? यह वेद और उपनिषदों की वाणी कालांतर में अलग-अलग रूपों में साहित्य में उल्लिखित हुई।जयशंकर प्रसाद ने जब कामायनी महाकाव्य की रचना की तो उसमें मनुष्यता का नाद ही गुंजरती हुआ- ‘अपने सुख को विस्तृत कर लो/जग को सुखी बनाओ’

हमारे ऋषियों का दिया मानवता का यह दर्शन ही विश्व की सुख शांति का मार्ग है,न कि पाश्चात्य दर्शन जिसमें- ‘सरवाइल ऑफ फिटैस्ट’ जैसा संघर्ष-टकराव पैदा करने का रास्ता दिखाया गया और कहा गया ‘ईट ड्रिंक एंड बी मैरी’ यानी खाओ,पीओ और मौज करो। यह पश्चिम का व्यक्तिवादी चिंतन है इसमें सामाजिकता और वैश्विकता का कोई स्थान नहीं है जो व्यक्ति को निजता या सिर्फ अपने सुख के लिए ही तरक्की करने और आगे बढ़ने का भाव जगाता है।इसमें मानवता के संरक्षण व उसके हितों की चिंता कहीं प्रकट नहीं होती है।

दरअसल त्याग अपने पास होने को छोड़ना भर नहीं है, बल्कि यह सब ईश्वर का है,मेरे पास जो है वह अपनी जरूरत के लिए उपभोग कर बाकी दूसरों के लिए है,यह ‘ट्रस्टीशिप’ की भावना ही त्याग है। यह भावना ही परस्पर प्रेम और सामंजस्य जगाती है।इसके मूल में ऋग्वेद का उद्घोष ही है- सर्वे भवंतु सुखिनः/सर्वे संतु निरामया/सर्वे भद्राणि पश्यंतु/मा कश्चिद् दुख भाग्भवेत।यानी सब सुखी हों, सब निरोग हों,सब एक-दूसरे का भला देखें-सोचें,करें और कोई किसी के दुख का कारण न बने। इसलिए प्रख्यात मार्क्सवादी चिंतक रामविलास शर्मा ने लिखा है कि- ऋग्वेद में मानव चिंतन की प्राचीनतम अवस्था में दर्शन और विज्ञान का जन्म व विकास देख सकते हैं।

आज यदि ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायन्बी भी अपनी पुस्तक ‘ए स्टडी आफ हिस्ट्री’ में लिखते हैं कि- इस परमाणु युग की विनाशकारी समस्याओं का समाधान भारत के चिंतन में है,तो निश्चय ही हमारे ऋषियों व शास्त्रों की ज्ञान संपदा उनके संज्ञान में रही होगी।आज आदमी ‘मोर एंड मोर’ की चाहत में जब अपनों की भी परवाह नहीं करता और अपने सुख के लिए उनका गला काटने में भी उसे संकोच नहीं होता तब राम याद आते हैं।महर्षि वाल्मीकि ने राम को रामायण में ‘ रामो विग्रहवान धर्मः’ कहा है यानी राम साक्षात धर्म का रूप है अर्थात त्याग व कर्तव्य बोध के प्रतीक है।मैथिलीशरण गुप्त ने अपने महाकाव्य ‘साकेत’ में 14 वर्ष बाद वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे राम और भरत के बीच संवाद का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है।जब भरत श्रीराम को राज्यसिंहासन सौपते हैं तो राम की आंखें भर आती है।भरत विचलित होकर पूछते हैं कि आपकी आंखों में आंसू क्यों ? राम कहते हैं- ‘खो कर रोये सभी,भरत में पाकर रोया’ खोकर तो सभी रोते हैं,दुखी होते हैं लेकिन राज्यसिंहासन प्राप्त करके भी कोई रोयेगा? जिसे पाने के लिए आज दुनिया भर के छल-प्रपंच होते हैं,खून खराबा होता है।राम कहते हैं अब तुम्हारे जैसे धर्मनिष्ठ राजा से प्रजा वंचित हो जाएगी,यह दुख मुझे रुला रहा है।यह जीवन दर्शन ही सुख व शांति का मार्ग दिखाता है।

शायद इसलिए पुस्तकों को मनुष्य का सच्चा मित्र कहा गया है और शायद इसलिए कोई किताब आदमी की जिंदगी बदल देने की ताकत रखती है क्योंकि वह जिंदगी जीने का सही रास्ता दिखाती है।मित्र के बारे में कहा गया है- ‘यः त्रायते सः मित्रः’ यानी जो हमें हमारी बुराइयों से,दुखों से मुक्ति दिलाए वह मित्र हैं।हमारे मनोविकार,बुराइयां या गलत आदतें ही हमारे दुख का मूल कारण होती है इनकी तरफ से हम सदा आंखें मूंदे रहते हैं और अपने दुख के लिए दूसरों को कोसते रहते हैं।श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि- व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र है और खुद ही शत्रु- बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः / अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्। जिसने स्वयं को जीत लिया यानी अपनी कमजोरियों,बुराइयों पर जीत हासिल कर ली तो हम खुद के मित्र हैं अन्यथा हम खुद ही अपने शत्रु हैं क्योंकि आखिरकार में बुराइयां ही हमें ले डूबेगी।

इस तरह गीता जैसा ग्रंथ हमें जीने का सही मार्ग दिखाता है।पुस्तकें जीवन को संवारने के लिए कितनी जरूरी और उपयोगी हैं,यह लोकमान्य तिलक द्वारा मांडले जेल में लिखे गीता रहस्य ग्रंथ के बारे में गांधीजी की टिप्पणी है कि ‘यह ग्रंथ तिलक का शाश्वत स्मारक है’ से प्रकट होता है। यह उचित ही है कि आज के प्रतिस्पर्धी दौर में अच्छे से अच्छा करियर बनाने के लिए हमारे नौजवान कड़ी मेहनत करते हैं दिन-रात पाठ्यपुस्तक की पुस्तकें पढ़कर परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा परसेंट लाने में जुटे रहते हैं ताकि किसी से पिछड़ ना जाये लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि कैरियर की दौड़ में आगे निकलने की होड़ के चलते कहीं हम जिंदगी जीने में न पिछड़ जाए। यानी बहुत कुछ पाने की लालसा में इंसानियत ही हमारे हाथ से न खिसक जाए।

पाठ्यक्रम की पुस्तक के हमें बड़ा नामी इंजीनियर,डॉक्टर, टेक्नोक्रेट या उद्योगपति तो बना सकती है,लेकिन अच्छा इंसान बनने का जज्बा तो उन्हीं किताबों को पढ़ने में जागता है जो जीवन मूल्यों,सामाजिक सरोकार और राष्ट्रीय हितों और मानव कल्याण के प्रति हमें जागरूक करती हैं।

अगर अच्छे इंसान नहीं बन सके तो बाकी सब बनना बेमानी है क्योंकि तब हम बहुत कुछ पाकर भी आखिरकार ठगे से खड़े रह जाते हैं और तनाव अवसाद व टकराव में ही जिंदगी बीत जाती है।डॉ.अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया विजन 2020’ में सबके लिए अहम सवाल छोड़ा है कि आखिर हम अपने बच्चों के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जाना चाहते हैं? जाहिर है हर माता-पिता अपनी संतान का भविष्य सुखी देखना चाहते हैं लेकिन उन्हें सच्चा सुख व शांति पूर्ण-तनाव रहित जीवन तभी मिलेगा जब हम उनकी दोस्ती जीवन की प्रेरणा जगाने वाली अच्छी किताबों से कराएं।बहुत जरूरी है कि बच्चों को जन्मदिन पर उन्हें कीमती उपहार देने के साथ-साथ एक मनोरंजक और प्रेरणास्पद पुस्तक भी भेट करें।वास्तव में इस प्रयास को एक आंदोलन बनाने की जरूरत है।

✍️ लेख- प्रो. बल्देव भाई शर्मा

कुलपति,कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय- रायपुर (छत्तीसगढ़) व पूर्व अध्यक्ष,नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया।

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