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रायपुर- कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर।मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे,जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं,बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की।वे भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं,लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं।राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था।

स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे।वे बार-बार कहते थे कि-भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद 21वीं सदी के भारत का निर्माण है।अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की,जिनमें संचार क्रांति और कम्प्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार,18 साल के युवाओं को मताधिकार,पंचायती राज आदि शामिल हैं।

वे देश की कम्प्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं।वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे।उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे।उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है।आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है।

40 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं,जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है।उनकी मां भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री-इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में 8 साल बड़ी थीं।उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे,जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली।

देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था।अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे।अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया।दुःखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया।

महीनेभर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से वे रूबरू हुए।उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं।

सत्तर करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है।यह इसलिए भी बेहद ख़ास है,क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे,जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी।इसके बावजूद राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे इसीलिए वे सियासत में देर से आए।

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था।वे सिर्फ़ तीन साल के थे,जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए।उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने,जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की।

राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया,जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया।वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए,लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया।वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही।बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे।स्कूल से निकलने के बाद राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए,लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए। उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।

उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन,राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं।हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी।उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था।उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था।हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था।इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया।इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए।

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी,जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं। उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली।वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में इंदिरा गांधी के निवास पर रहे।वे ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदलकर रख दिए।उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया।फिर कई अंदरुनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं।पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए।

उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तरप्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा,जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई।इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए।उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई,जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया।साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया।

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ।वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे,लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा।

उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए,जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना,असम समझौता,पंजाब समझौता,मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं।इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए।नतीजतन,श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए।

साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वे कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे।वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए,जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई।देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी।राजीव गांधी की देशसेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारतरत्न से सम्मानित किया जिसे सोनिया गांधी ने 6 जुलाई 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया।

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे। साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई,तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया।उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि-अगर वे विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं,तो वे एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे,क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वे ज़िन्दा हैं।

उन्होंने भावुक होकर कहा कि-जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे,तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है।उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वे उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे।मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं।

फिर वाजपेयी बहुत भाव-विह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं,तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता।मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं,जो उन्होंने मेरे लिए किया।ग़ौरतलब है कि-राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था।

राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था।राजीव गांधी की मौत से अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था। उन्होंने स्व। राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था,’मृत्यु शरीर का धर्म है।जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है।लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती,प्राकृतिक नहीं होती, ‘जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती,जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है,जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है,एक षड्यंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें।’

राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है।एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है।शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा,जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो। लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा,जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो।यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए।

आज़ाद भारत स्व.राजीव के महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा।स्व.राजीव गांधी की जयंती ‘सद्भावना दिवस’ और ‘अक्षय ऊर्जा दिवस’ के तौर पर मनाई जाती है,जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है।

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