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एक पिटता हुआ बछड़ा…..

File Photo

अंधाधुंध पिट रहा था वह बछड़ा एकदम कुनमुनाता मुनमुनाता
माह दो माह का नुनवा कि टुनवा
बिल्कुल चिरई चुनगुन

रात उसने अपने जाबे में से
मूं छुड़ाकर पी डाला था
अपनी माता का ढेर सारा दूध
फलतः अभी ग्वाले द्वारा
एक कसाई की निर्ममता के साथ
पीटा जा रहा था

दूध अभी भी
एक महीन लिसलिसी धार में
उसके थूथन से रिस रहा था
उसकी समूची देह पर उग आए थे
बेंत के लाल लाल निशान
एक आध पनेठी ग्वाले ने
गाय को भी लगाई थी हुमच कर

मुझे इस प्रकार देखता देखकर
वह झल्लाकर बोला
“तीसरी बार किया है इसने ऐसा!”
फिर और समझा कर
“अधिक पीने से इसीका पेट खराब होगा,
जान भी जा सकती है इसकी!”

मैं बिना कुछ बोले
अपनी मां का दूध पीने पर
पिट चुके उस बछड़े को देखता रहा
और उस दुस्साहसी गाय को

गाय अभी भी पेन्हाई हुई थी
गीले थे बछड़े के लोर से
उसके कसकते हुए थन
भरे हुए और भारी

वह गाय मुझे पकी हुई फसलों
और रसमसाते हुए फलों से लदी
धरती की तरह लगी

दूध पीकर तृप्त
उस बछड़े की थूथन पर
चिपका हुआ था
सावन के मेघो से भरा आसमान।

कविता– डॉ.आनन्द शंकरबहादुर
कुलसचिव, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय- रायपुर (छत्तीसगढ़)

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