Anand Shankar Bahadur

आदिम भूदृश्य- लुईस ग्लक

Anand Shankar Bahadur,Anand Shankar Bahadur

Anand Shankar Bahadur

तुम अपने पिता के ऊपर खड़ी हो, मेरी मां बोली,और सचमुच मैं घास की एक परत के बिल्कुल बीचोबीच खड़ी थी,
जिसे इतने करीने से काट-छांट किया गया था
कि वह मेरे पिता की कब्र हो सकती थी।
हालांकि वहां कोई पत्थर नहीं था जिस पर ऐसा लिखा हो
तुम अपने पिता के ऊपर खड़ी हो, उसने इस बार और जोर से दोहराया,
जो मुझे अजीब लगने लगा,
क्योंकि वह खुद मृत थी, यहां तक की डॉक्टर ने भी यह मान लिया था।
मैं थोड़ा सा बगल हट गई, उस जगह जहां मेरे पिता समाप्त होते थे और मेरी मां शुरू।

कब्रिस्तान खामोश था।
हवा पेड़ों के बीच से बह रही थी,
मैं सुन सकती थी, कई कतारों परे की, रोने की धीमी आवाजें,
और उसके परे एक कुत्ते की रुलाई।
आखिर ये आवाजें खत्म हुईं।
मेरे मन में यह ख्याल आया, कि वहां पर जबरन लाए जाने की कोई यादाश्त मेरे पास नहीं थी
वह जगह जो अब एक कब्रिस्तान लग रही थी,हालांकि हो सकता था,
कि वह कब्रिस्तान केवल मेरे दिमाग में हो,
शायद वह एक पार्क था, और पार्क नहीं, तो एक बगीचा या सुगंधित कुंज,
अब मैंने महसूस किया, गुलाबों की खुशबू से— जीवन की सुन्दरता हवा में समाती हुई
जीवन की मिठास, जैसी कहावत है।
किसी बिंदु पर, मुझे ऐसा लगा कि मैं अकेली हूं।
दूसरे कहां चले गए होंगे, मेरी बहन और चचेरी बहन कैटलाइनन और ऐबिगेल?

अब तक रोशनी धुंधली पड़ने लगी थी
कार कहां थी, जो हमें घर ले जाने के लिए इंतजार कर रही थी?
फिर मैंने कोई विकल्प ढूंढना शुरू किया
मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर एक अधैर्य बढ़ रहा था,
जो धीरे-धीरे, मैं कहूंगी, चिंता में बदलता जा रहा था

आखिरकार दूर एक छोटी ट्रेन दिखी
जो शायद कुछ पेड़ पौधों के पीछे, रुकी हुई थी
उसके एक दरवाजे की चौखट से टिककर, कंडक्टर सिगरेट पी रहा था

मुझे छोड़ मत देना, अब मैं दौड़ते हुए चिल्लाई
अनेक मांओं और पिताओं और जमीनों के ऊपर भागती हुई—
मुझे छोड़ मत देना, अंत में जब मैं उसके पास पहुंची, तो चिल्लाई
मैडम, उसने रेल की पटरियों की ओर इशारा करते हुए कहा,
निश्चय ही आप मानेंगीं कि यह अंत है।पटरियां इससे आगे नहीं जातीं उसके शब्द कठोर थे पर उसकी आंखें दयालु थीं।

इस से प्रोत्साहित होकर मैंने अपनी याचना और अधिक मजबूत तरीके से सामने रखी
लेकिन ये पीछे की ओर तो जाते हैं, मैंने कहा,और इनके पुख्तेपन से पता चलता है, कि अभी कितनी ही वापसियां इनके पास हैं।

आप जानती हैं, उसने कहा, हमारा काम कठिन है:
हमें अत्यधिक दुख और निराशा का सामना करना पड़ता है।

वह मेरी ओर और ज्यादा बेझिझक होकर देखने लगा
कभी मैं भी तुम्हारे जैसा था, उसने कहा उथलपुथल से प्रेम में।

अब मैंने, मानो एक पुराने दोस्त को, सम्बोधित किया
और आपका क्या ख्याल है? मैंने पूछा, क्योंकि वह जाने के लिए स्वतंत्र था
आपको घर जाने की इच्छा नहीं है, और शहर को फिर से देखने की?

यह मेरा घर है, उसने कहा
शहर— शहर वह जगह है जहां मैं गायब हो जाता हूं।

✍️ अनुवाद- आनंद शंकर बहादुर
कुलसचिव-कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विश्वविद्यालय-
काठाड़ीह -रायपुर (छ.ग)

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